कहाँ है प्रेम

वह काफ़िर था
उससे कुछ भी पूछो,
उल्टा ही जवाब देता था
मैंने उससे पूछा-
'सेक्स' क्या है
वह बोला-
बन्द कमरे के अंदर किया गया प्रेम

मैं चौंका,
और इसी रौ में पूछ लिया,
'तो फिर कमरे के बाहर किया गया प्रेम क्या है?'

वह हँसा और बोला-
फूहड़ता
अब मैं चौंका नहीं,
बस चिंतित हो गया
चिंतित इसलिए कि फूहड़ता और नग्नता के प्रत्ययों के बीच
प्रेम कहाँ है? (है भी कि नहीं)

थक कर मैंने पूछ लिया उससे
तो फिर प्रेम कहाँ है?
कमरे की दहलीज़ पर?
वह हँसते हुए बोला-
नहीं! प्रेम किताबों में है!
जिसे तथाकथित संस्कृति-संरक्षक रूपी दीमक,
चाटे जा रहे हैं...

इतना सुनते ही,
मेरे मुँह से निकला
स्साला काफ़िर!


उसने कहा

उसने कहा-
जाओ सबसे अंतिम पायदान पर खड़े हो जाओ
मैं चुपचाप उठा और नियत स्थान पर खड़ा हो गया

उसने कहा-
तुम सेवाप्रदाता हो, सबकी सेवा करो
मैं चुपचाप उठा और सबके पैर दबाने लगा

उसने कहा-
तुम व्रात्य हो! यह कतार तुम्हारे लिए नहीं है
मैं चुपचाप उठा और उस कतार से बाहर निकल आया

उसने कहा-
पठन मेरा धर्म नहीं है!
मैंने अज्ञानता की भट्ठी में पीढ़ियाँ झोंक दीं

यही कोई तीन हजार (संभवतः उससे कहीं अधिक) वर्षों तक
सिर्फ़ सुनने के बाद एक दिन
मेरे 'मैं' से जब एक मैं खड़ा हुआ और बोला- सुनो!

इतना कहना था कि सृष्टि आक्रांत हो गई,
धर्म ख़तरे में पड़ गया,
देवता क्रुद्ध हो गए,
मठ-मंदिर हिल गए...

और तब मैंने जाना
बोलना क्या कर सकता है!
बोलना हमें स्वयं से
अन्य से
सबसे आज़ाद करता है
बोलना हमें मनुष्य बनाता है

क्या तुम भी डरते हो बोलने से?
क्या तुम ज़रूरी होने पर भी नहीं बोलते?
यदि हां! तो तुम अभी गुलाम हो 
या फिर ग़ुलाम बनने की प्रक्रिया में हो!


अपराध

मैं विरोधियों से घिरा हुआ हूँ
हर विरोधी के हृदय में एक आग है और
हाथ में लाठी, तलवार या पिस्तौल

नहीं! नहीं!
मैंने कोई अपराध नहीं किया है,
अपराध तो उस ईश्वर से हुआ था
जिसने मुझे एक तथाकथित निम्न जाति के घर भेजा था
और उसे भी संचित कर्मों के परिणाम की आड़ में डिफेंड किया

मेरा पैदा होना उतनी बड़ी मुसीबत नहीं थी
जितनी बड़ी मुसीबत मेरा तर्कशील होना था
इधर मैं एक अक्षर पढ़ता था उधर एक लाठी तैयार होती थी
इधर मैं एक सवाल पूछता था उधर एक तलवार पैनी होती थी
इधर मैं अधिकार माँगता था उधर से एक गोली मिलती थी

मेरे बाप मेरे घर की नींव में एक ईंट रखते थे
और उधर उनकी क़ब्र के लिए एक ईंट सेंकी जाती थी
मेरी माँ मेरे परिवार के लिए एक कपड़ा सिलती थीं
और उधर उन्हें द्रौपदी बनाने की योजना बुनी जाती थी

मैं, मेरी माँ और मेरा बाप तीनों इस बात से परेशान हैं
कि अंततः हमारा अपराध क्या है
घर बनाना, घर संवारना या घर में रौशनी लाना

कोई है जो हमें हमारा अपराध बता सके!


- अजय शर्मा 'दुर्ज्ञेय'

अजय शर्मा 'दुर्ज्ञेय'

युवा कवि.  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. सीहपुर, कन्नौज (उत्तरप्रदेश) में निवास. अजय शर्मा 'दुर्ज्ञेय' से उनके मोबाइल नंबर 09119845665 पर बात की जा सकती है.