नींद में कविताएं
१.
कुछ कविताएँ नींद में बुनी जाती हैं
उनका अस्तित्व आँखों के सोए रहने में है
उनकी पूर्णता
हमारी सतही दुनिया से निरपेक्ष
सपनों की दुनिया में बने रहने में है
तभी तो आँखों के खुलते ही
भाप हो जाती हैं वो
दोपहर की नींद में गर्दन पर उभर आए
पसीने की तरह
सपनों की एक अलग दुनिया होती है
और दुनिया कोई भी हो
कविताओं की ज़रूरत हर जहाँ को है।
२.
कितना अजीब होता होगा
तुम्हारी सर्वश्रेष्ठ कविता का नींद में लिखा जाना
और नींद के खुलते ही उसका भूल जाना
कहाँ जाती होंगी वो कविताएँ
जो शायद क्रांति साबित हो सकती थीं
तुम्हारे समय की?
जो शायद विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जातीं
पीढ़ियों को?
जिनकी भरपाई की नाकाम कोशिश-भर होती हैं
ये लिखी जा रहीं कविताएँ?
हो सकता है स्वप्न-जगत को ज़्यादा ज़रूरत होगी
तुम्हारी कविताओं की
शायद वहाँ कोई बच्चा कर रहा होगा इंतज़ार
तुम्हारी कविताओं का
स्कूल से भागकर, पटरी किनारे, कमर पर हाथ धरे।
मैं क्यों लिखता हूँ?
१.
मैं लिख रहा हूँ
क्योंकि
मैं लिखता हूँ
मैं लिखता हूँ जब
मैं बहुत ख़ुश होता हूँ
गाँव के अंतिम छोर पर खड़े
उस पीपल को जिसने
पतझड़ के बाद देखा है
अभी-अभी वसंत
मैं लिखता हूँ जब
मैं दुःखी होता हूँ
स्टेशन के बाहर बैठे
उस मोची को जिसने
दिनभर में जोड़ी हैं
केवल दो चप्पलें
मैं लिखता हूँ जब
अवसाद बढ़ता है
उस कुतिया को
जिसके सामने
ट्रक ने कुचल दिया है
उसके तीन बच्चों को
मैं लिखता हूँ जब
बेबस महसूस करता हूँ
खूँटे से बँधी
उस गाय को
जो देख रही है अपने बछड़े को
कसाई के साथ जाते
मैं लिखता हूँ जब
कुंठित होता हूँ
मिल से आटा-घट्ठा लादे लौटते
उस साइकिल को
जिसकी चेन उतर आती है
बार-बार
मैं लिखता हूँ जब
थक जाता हूँ
संसार की सबसे सुंदर स्त्री को
जो घास छिल रही है
अपने बच्चे को
खेत की मेड़ पर लिटाकर।
२.
मैं लिखता हूँ
क्योंकि
मैं सोचता हूँ अच्छा है लिखा जाए
किसी की बातों की यादों के चरखे में
सूत-सा कतने से अच्छा है लिखा जाए
किसी और के कंधे पर रोते वादों के
आँसू पोछने की ख़्वाहिश रखने से अच्छा है लिखा जाए
संबंधों की दरक चुकी पुरानी बाल्टी में
टेप साटने से अच्छा है लिखा जाए
जानबूझकर जिसने मूँद रखी हैं ऑंखें
उसे आईना दिखाने से अच्छा है लिखा जाए
एक दिन लोग खुद ढूँढ कर सुनेंगे
अभी चीख़ने से अच्छा है लिखा जाए
सबके अपने तरीके हैं जीने के
मेरे लिए सबसे अच्छा है लिखा जाए।
हमसफ़र
यूँ ही अचानक
साल भर बाद
मेरे पते पर
तुम्हारा खत पहुँचना
जैसे सोती रात में
नीरव खड़े तालाब में
हवा को चीरता गिर आया हो
कोई उल्का पिंड
वो पता
जो कभी सही था
जो जानता था तुम्हारी आहटों को
पहचानता था तुम्हारी पाज़ेब को
जिसने जिया है तुम्हारी ख़ामोशी को
जो अब चश्मा ढूँढता है
तुम्हारी लिखावट
पहचानने को
मेरे लिए
आसान कभी नहीं रहा
पढ़ना!
तुम्हारा लिखा हुआ
तुम नहीं जानती
कितनी ऊर्जा भरनी होती है
फेंफड़ों में
ताकि साँसे चलती रहे
अपनी नियत गति से
ताकि बचाया जा सके खुद को
उस भय से
जो साँसों के चढ़ने
और उतरने के मध्य
आते ठहराव में मुझे रोक लेना चाहता है
ताकि बुझाया जा सके
उस सुलगते उल्का पिंड को
और शांत किया जा सके
उस हलचल को
जिसने छीन लिया है
रात से उसका एकांत
•••
यहाँ से लौट पाना
अब ना तो संभव है
ना ही सही
चलते रहना
नियम है प्रकृति का
और
व्यर्थ है रुककर
इंतज़ार करना भी
क्योंकि
अलग रास्तों पर चलने वाले कभी हमसफ़र नहीं हो सकते।
अभिव्यक्ति
मैंने पढ़ा
फिर सोचा
उसे लिखा
और आखिर में बोला
लेकिन जैसा पढ़ा
वैसा सोच नहीं पाया
जैसा सोचा
वैसा लिख नहीं पाया
और जैसा लिखा
वैसा बोल नहीं पाया
मुझे ज्ञात हुआ
अभिव्यक्ति संसार की सबसे कठिन प्रक्रिया है।
प्रेम कहानियाँ
सोचता हूँ क्या
होती होंगी
उन फूलों की भी
प्रेम कहानियाँ जो
तोड़ लिए जाते हैं
खिलने से पहले और
टाँग दिए जाते हैं
धर्म की वेदी पर
पवित्रता का रंग चढ़ाकर?
क्या इंतज़ार में होती होंगी
उनकी प्रेमिकाएँ और
चूसने देती होंगी
भँवरे को
अपने प्राण निर्विरोध
इस उम्मीद में कि
वो आएगा एक दिन
उनके प्रेमी का
संदेशा लेकर?
वो प्रेमी जो
पड़ा होता है किसी
कचरे के ढेर में
निढाल हो
अंतिम साँस के
छूटने तक!
नींद खुल नहीं रही
कुछ कहना है
शब्द कंठ की मांसपेशियों में उलझ जा रहे हैं
कुछ देखना है
नज़ारे भूत हो चुके हैं
कुछ सुनना है
आवाज़ें आभासी हो चुकी हैं
कुछ पढ़ना है
स्याही भाप बन चुकी है
कुछ लिखना है
कलम का रिसाव सूख गया है
कुछ और सोचना है
माथा बंद पड़ा है
मुस्कुराना है
होंठ रूठे बैठे हैं
रोना है
आँसू सफर पूरा नहीं कर रहे
एक तस्वीर है
अवचेतन मन में धँसे जाती है
एक सपना है
जो टूट चुका है
एक सपना है
जो तोड़ना चाहता हूँ
नींद खुल नहीं रही।
सच की खासियत
कुछ आवाज़ें
कभी नहीं सुनी जातीं!
वो बोली जाती हैं
बंद होंठों से
चढ़े दाँतों के बीच
जबड़े में फँसे
छटपटाते ज़बान से
मुट्ठियाँ भींचकर
बंद होंठ
सलामत रखते हैं
सारे रिश्ते
पूरा घर
जो जल सकते हैं
उसकी धाह मात्र से
उन्हें बचाने
जलाना पड़ता है
खुद को
तलवे से माथे तक
आँखें बंद किये
मुट्ठियाँ भींचकर
सच की खासियत है
वो दब जाती हैं!
- कुमार दिव्यांशु 'शेखर'



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