क्षितिज की अंतीम रेखा

तुम रूको
कि मैं तुम्हारी छाँव में
थोड़ा-सा विश्राम कर लूँ
क्योंकि थकान से चूर मेरी ऊनींदी आँखें
एक डेग भी बढ़ने में असमर्थ है

तुम रूको
कि अब प्यास से
छटपटा रही है मेरी जीभ
और मैं अपने जीभ को ऐंंठते हुए
अंगुलियों से
ज़मीन पर लिख देता हूँ पानी

तुम रूको
कि अब हवाओं का वेग थोड़ा तेज हुआ है
और इससे पहले कि
शुन्य हो जाये यह सभ्यता
या बचें हीं ना मेरा अस्तित्व
मैं तुम्हारी आँचल की ओट में छुपकर
खड़ी कर देना चाहता हूँ एक दीवार

बस एक बार रूक जाओ
कि समय
अपनी गति से चलता जा रहा है
मैं वक्त और साँसों के बीच
एक लक़ीर खींच दूँ
सीधी-एकदम सीधी
जो पार कर सके
क्षितिज की अंतीम रेखा...!


मरी हुई सभ्यता

मैं मर गए लोगों की देह पर
एक निशान बनाता हूं
और उनकी हड्डियों में भर देता हूं
अपना खौलता हुआ खून

ऐ! मरे हुए लोगों
जरा हड़प्पा की खिड़की से
झांक कर देख लो एक बार

मैं तुम्हारी भोगी हुई देह पर
फेंक देना चाहता हूं
मुट्ठी भर रेत
और थोड़ा-सा नमक

मैं तुम्हारे हाथ के फफोलों में
चुभो दूंगा एक सुई
और मिटा दूंगा तुम्हारे हाथ की लकीरों को

लेकिन इससे पहले
एक बार ही सही
तुम्हें अपनी आंखे खोलकर
मेरी आंखों की पुतलियों से रोशनी लेकर
देखनी होगी
इस मरी हुई सभ्यता को
जिसके पीछे
एक आदमखोरों की दुनिया
सांस ले रही है धीरे - धीरे...


दुःख से समझौता

ऐ दुःख!
जब सब सो जाएं
अपनी - अपनी नींद में
तब आना तुम मेरे पास
अकेले! सिर्फ और सिर्फ अकेले
मै हर समझौता करूंगा तुम्हारे साथ

तुम्हारे असमय आ जाने से
असमय छोड़ गए हमारे पिता
मेरी मां रोटियां तवे पर छोड़कर
आ जाती हैं तुम्हारे आते ही
और मेरा भाई
डरा - डरा सा रहता है आजकल

तुम यकीन करो
सचमुच इस दुनिया में
मां और भाई के सिवा
कोई नहीं है मेरा

हां! कुछ कविताएं हैं
जो उदास रहती हैं आजकल...


खोए हुए शब्द

साफ
बिल्कुल साफ हो चुका है आसमान
लगता है कम हो चुका है
अँधेरों का कब्जा
अपनी पूरी रोशनी लिए
जाग चुका है चाँद

प्रिय! ज़रा उठो
तनिक ढूंढ कर लाओ
मेरे शब्द
देखो, यहीं कहीं छुपी होगी
खोजो
तुम्हारे माथे की बिन्दी के प्रकाश में
मिल जाएंगे मेरे शब्द

देखो ना!
कितनी बेचैन लग रही हैं
मेरी कविताएं

प्रिय! तनिक ध्यान से सुनो
मेरे शब्दों के सिसकने की आवाज़
यहीं कहीं से आ रही है

सचमुच मैं उठ नहीं सकता
अतः मेरी विनती है तुमसे
जल्दी ढूंढ कर दो
मेरे शब्द
बहुत देर से बुला रही है
मेरी कविताएं....


चिखेगा आसमान

मत सोचो कि स्त्रियाँ
तुम्हारा अत्याचार सहते-सहते
हार जाएंगी अपनी ज़िन्दगी से
या डूब जाएंगी अपने आँशुओं में
या उजबूजा कर मर जाएंगी

वे बनाएंगी ऐसा समुन्द्र
उगलेंगी ऐसी आग
जिसमें तुम डूब या
जल जाओगे...

वे अपने कदमों से
नाप लेंगी धरती और अकाश
तोड़ लेंगी चाँद और तारों को
समेट लेंगी अपने आँचल में
सुर्य को भी....

और अगर ज़रूरत पड़ी तो
ऐ अत्याचार करने वालों!
तुम देखना अपनी आँखो से
एक दिन स्त्रियाँ
निगल जाएंगी तुम्हें
इस धरती के साथ-साथ...


दंगों में शामिल है कवि

एक दिन कविता
कवि से पुछ बैठी -
तुम कहाँ थे
जब तुम्हारे मुहल्ले में
दंगे हो रहे थे
लाशें बिछ रही थीं
सड़कों पर
कर्फ्यू लगा था
तो तुम कवि होने के नाते
चुप क्यों थे..?

क्या तुम्हारे कलम में...
अरे! तुम्हारे कलम में
स्याही की जगह खून कैसा
कहीं तुम सृजन छोड़ कर
ख़ुद दंगों में

शामिल तो नहीं हो गये!


दहसत

मैंने उसे चुप कराया
कि चुप हो जाओ
तुम्हारी माँ जिंदा हैं
वह रोता रहा

मैंने उसे समझाया
कि तुम्हारी बहन मंदिर गई है
उसने समझने का प्रयास नहीं किया

मैने उसे स्लेट दिखाया
कि तुम्हारा भाई
विद्यालय गया है
उसने स्लेट को तोड़ना चाहा

वह सिसकने लगा
फिर ज़ोर से रोते हुए बोला -
चाचा! तुम झूठ बोलते हो
कह दो कि तुम झूठे हो

अगर वे सचमुच जिंदा हैं
तो घर के फ़र्श पर
कमरे की दीवारों पर
और...
और तुम्हारे कमीज पर
खून के छींटे कैसे हैं!


कोयला

मुझे कोयला बहुत पसंद है
हालांकि मैंने कोयले की खान नहीं देखी
कोयले की खदान में
जन्मा भी नहीं हूं मैं

असल में मैंने बहुत दिनों तक
कोयले की आग पर
लिट्टियां सेंकी है,
चाय बनाया है...
इसलिए मैं कोयले की आग की गर्मी से
भलीभांति परिचित हूं

मैंने कोयला तोड़ा है
अपने हाथ के फफोलों में
सूई चुभो
सेंका है मैने कोयले पर

मैंने सबसे ख़राब दिनों में
कोयले की पुजा की है
रोटी खाया है कोयले का
कई बार ढोया है कोयला अपने कंधों पर

मित्रों! मै आभारी हूं
छः इंच की कलम का
जिसका पीछा करते-करते
आज़ाद हुआ हूं मैं
कोयले की दुनिया से...


खेतों में

वर्षों से आ रहा हूं इन खेतों में
हर वर्ष की तरह
इस वर्ष भी
बर्बाद हो चुकी है फ़सल
थोड़े दिन बाद थोड़ी उम्मीद लिए
फिर आना होगा खेतों में

मैं क्या
मेरे पूर्वज
मेरे दादा-परदादा भी आते थे खेतों में
बहुत दिनों तक पिताजी भी आए
अब नहीं आते
थककर चले गए भगवान के पास
आते - आते खेतों में

अब मैं आता हूं
कंधे पर कुदाल और बीज लेकर झोले में
हो सकता है मेरे बच्चे भी आएं
और शायद उनके बच्चे भी

जब तक रहेगी सृष्टि
आते रहेगा किसान
और सींचते रहेगा खेतों को
अपने खून और पसीने से

हमें आना ही होगा
इस दो बीत्ते ज़मीन पर
हरियाली लाने के लिए
और पेट की आग बुझाने के लिए....

- राजू कुमार विद्यार्थी


राजू कुमार विद्यार्थी

युवा कवि। साहित्य अमृत, किरण-वर्ता, संवदिया, दैनिक हिंदुस्तान, अहा! जिंदगी सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।
स्थायी पता - लहेर छपरा, मदारपुर, जिला- सारण (छपरा)- 841311 बिहार।
राजू कुमार विद्यार्थी से उनके मोबाइल नंबर +918757922941 पर बात की जा सकती है।