डरो कि...


डरो कि

मेहतर 

जिस टोकरी में उठाता है 

सड़ांध कूड़ा 

एक दिन 

दफ़ना देगा 

उसी टोकरी में 

सड़ी गली बास मारती 

पूंजीवादी व्यवस्था को 

जिसमें टोकरी भर भी स्थान नहीं है

उस मेहतर के लिए



डरो कि 

बंकिया डोम

जला देता है 

अनगिनत मूर्दे श्मशान पर 

एक दिन 

जला देगा 

तिजोरियों में मृतप्राय

सोने के सिक्कों और नोटो को 



डरो कि 

लोहार 

बनाता है

मजबूत लोहे का दरवाजा 

भवनों और राजमहलों के लिए 

एक दिन 

बनाने लगेगा लोहे की बंदूके और तलवारें



डरो कि

बुढ़ा किसान 

जोत देता है 

सैकड़ों एकड़ भूमि

सींचता है पसीने से और लहलहा उठती हैं फसलें

एक दिन 

जोत देगा

इन्हीं लहलहाती फसलों को 



डरो 

उन सभी कामगारों से 

जो तुमसे डरना छोड़ 

लड़ना शुरू कर देंगे 

तो क्या होगा?



अगर तुम सोचते हो


अगर तुम सोचते हो कि

शब्द कविता बनते हैं

तो तुम गलत हो 

शब्द नहीं ध्वनियां करती है 

कविताओं का सृजन


पहली प्रेम कविता 

तब लिखी गई जब एक प्रेमी ने

अपनी महबूब की धड़कन सुनी

इस प्रकार कंपित ध्वनि

बनी एक अमर प्रेम कविता


यह कविता मेरी नहीं थी 

मैंने कंपित ध्वनि सिर्फ रेलगाड़ियों

के गुज़रते वक्त महसूस की थी

दुत्कार, डांट, गाली और बद्दुआ 

ये सब इनाम था मेरा 

किसी सेठ का जूता 

पॉलिश करते वक्त 

ट्रेन में झाड़ू लगाते हुए

तुम सोचते हो 

दुत्कार और गाली की ध्वनि थी  

मेरी पहली कविता 

तो तुम गलत हो 

मैंने पहली कविता लिखी 

इन नर्क की बेड़ियों को तोड़ने के बाद 

उत्पन्न हुई ध्वनि से 

इसके बाद मैं लिखता गया 

उन सारी आवाजों पर कविताएं 

जो किसी कोनें में घुट रही थी

पर अवसर के साथ 

उन ध्वनियों ने गुर्राना सीखा

और ये गुर्राहट ही मेरी कविताएं बनीं।



खेती (चिपको आंदोलन से प्रेरित)


मुझे अलार्म की 

टिनटिनाती आवाज में नहीं,

पक्षियों का कलरव सुनकर 

जगना था


भरी दोपहरी में 

खेत से लौटते हुए 

मुझे सुस्ताना था 

महुआ और पलाश की बाहों में


क्रीड़ा करते मृगशावकों 

के बच्चों की मखमली पीठ पर

गुदगुदाना था अंगुलियों से 

अपने सूकून के लिए,

शावकों के मनोरंजन के लिए


हताशा में गिलहरी से 

लेनी थी प्रेरणा 

फुनगी को कदमों में करने की 

शाम को नदी के सिरहाने बैठकर 

लिखनी थी इक कविता 

और पूछना था नदी से 

चांद के साथ विचरते रहने का राज


रात को झिंगुरों की आवाजों

से निचोड़ना था संगीत

टिमटिमाते तारों को जोड़कर

बनाना था एक चेहरा 


इन सारी चीजों को बचाने के लिए

मैं पेड़ों को गले लगाता हूं 

ताकि तुम्हारी कुल्हाड़ी

पहले मेरे गले को रेते

फिर पेड़ों के गले तक पहुंचे


मैं धरती के सीने में 

प्रेम बोता हूं, बोता रहूंगा

ताकि सामना कर सकूं

तुम्हारे तोपों और बंदूकों का


यह प्रेम की खेती

अनवरत जारी रहेगी

जब तक तुम इन जंगलों की 

नन्हीं सी हथेलियों, 

बाजुओं और धड़ को काटकर 

इनकी पीठ पर कंक्रीट का जंगल 

उगाने की चेष्ठा करते रहोगे।



स्वप्न


मैं एक कवि हूं

मैंने बहुत सी कविताएं लिखी हैं

चिंता की बात ये है कि 

मेरी कई कविताएं गुम हो गयी हैं

उन्हें ढूंढने में 

क्या तुम मेरी मदद करोगे?


आप अपने कमरे से निकलो

देखो सामने सड़क पर मोची बैठा है  

कलाई घड़ी बनाने वाले की गुमटी है 

वहां उनके साथ कोई नहीं है 

दोनों बैठे अपने नसीब को कोस रहे है 

ध्यान से देखो!

वहां आपकी कविता उनसे बतिया रही है


थोड़ा और आगे बढ़ो 

ये गरीबों, मजदूरों, किसानों की भीड़ है 

जिन्होंने आज संसद का घेराव किया है

अपने हक़ की खातिर


हां ये सब दिख तो रहा है

पर यहां पर मेरी कविता कहां है


हे कवि! ध्यान से देखो 

कंटीले तारों, तोपों, बंदूकों आंसू गैस के गोलों 

के सामने आंदोलनकारियों के साथ कंधा से कंधा 

मिलाए तन के खड़ी है तुम्हारी कविता


मैं दिन ढलने के साथ आगे बढ़ रहा हूं

शहर के इस हिस्से में झुग्गी है 

जहां सरकार का सारा विकास 

दम तोड़ देता है


देखो! तुम्हारे बगल में

जो बच्चा भूख से बिलखकर

अब शांत हो गया है 

वहीं बगल में बैठी तुम्हारी कविता 

उस बच्चे को लोरी सुना रही है


अब रात हो गयी 

सारा शहर पीली रोशनी से भर गया है 

ये हिस्सा तो जर्जर है 

पुराने मकान हैं


ऊपर देखो! चौथी मंजिल पर एक लड़का 

आज के अपने परीक्षा परिणाम से हताश है

कूदकर जान देने जा रहा है 

हां मैं देख पा रहा हूं


ध्यान से देखो कवि!

तुम्हारी कविताएं उसका हाथ थाम 

उसे समझा रही है, हौसला बढ़ा रही है


रात बहुत गहरी हो गयी है 

मैं अपने कमरे पर भी नहीं जा सकता 

मुझे समझ नहीं आ रहा कहां आराम करूं


अरे कवि! अपने बांयी तरफ देखो तो सही 

आधा शहर कुत्ते, गायों के साथ 

खुले आसमान की छतरी तले

फुटपाथ पर सो रहा है 

ध्यान से देखना तुम्हारी कविता भी 

इन सबके साथ चैंन की नींद सो रही है

तुम भी वहीं बगल में लेट जाओ


ओ कवि! उठो सुबह हो गयी 

सारे लोग रोटी के जुगत-जुगाड़ में चले गए 


अच्छा तुम ये बताओ

मेरी कविताएं बस शहरों तक सीमित है 

नहीं नहीं 

ऐसा नहीं है कवि!

मेरे साथ आप सुदुर गांव की यात्रा पर चलो 

मैं मिलवाता हूं आपको आपकी कविताओं से 


गांव की पगडंडी पर चलते हुए 

अच्छा, कवि! ये बताओ 

तुम्हें याद है 

कि इस स्कूल सामने एक बुढ़िया काकी की झोपड़ी हुआ करती थी


हां हां जहां से मैं टाफियां लेता था अक्सर 

तो इसका मेरी कविताओं से क्या मतलब?

देखना शाम को यहां आकर 

आपकी कविता "बुढ़िया काकी" 

इस झोपड़ी के ओसारे में टहलती मिलेगी


ये देखो महुआ का पेड़ 

सारे चरवाहे आराम फरमा रहे हैं

अरे! तो फिर उनकी बकरी और भेड़ कौन चरा रहा है?

तुम्हारी कविता बकरी चरा रही है 

ये सौभाग्य सिर्फ तुम्हारी कविताओं को ही हासिल है


अभी भी सोच रहे हो 

अपनी कविताओं के बारे में

तो देखो उस खेत की मेढ़ से 

तुम्हारी कविता कांटा हटा रही है

गेंहूं की बालियों के साथ गुनगुना रही है

दूर देखो नदी के तीरे 

तुम्हारी कविता घास काटती 

औरतों के साथ लोकगीत गा रही है


हे कवि! क्या आप अब भी चिंतित हो?

नहीं, मुझे मेरा जवाब मिल गया 

पर तुम कौन?

पूछते हुए कवि

बिस्तर से उठता है।


- आशीष यादव


आशीष यादव

युवा रचनाकार। इंजिनियरिंग के छात्र रह चुके हैं, वर्तमान में चंडीगढ़ में रहकर स्नातक में अध्ययनरत। स्थायी पता - ग्राम जानुपूर, पोस्ट- बौरी, जिला - गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) - 233303. आशीष यादव से उनके ईमेल आईडी ashishkpal0910@gmail.com अथवा मोबाइल नंबर +919140911253 पर संपर्क किया जा सकता है।