पतंग

हमे अच्छा लगता था पतंग उड़ाना
दूर आसमान में उड़ाते हुए पतंग
हम खुद भी भरने-भरने को हो आते थे उड़ान

हमारे आलावा कुछ लोग और थे
जो जानते थे पतंगें लड़ाना
हम जब भी उड़ाते थे पतंगें
सबसे पहले काटी जाती थी हमारी
ही पतंगे
पूरे आसमान में केवल और केवल
उन्ही की पतंगों का परचम लहराता रहा
जिन्हें आता था दूसरों की पतंगे काटना।


घर

पहले पहल बदले गए
कमरों के पर्दे, बिस्तर की चादर, टेबल क्लॉथ
फिर पुराने फोटो फ्रेम में जड़ी
मां, पिता और हमारी बचपन की तस्वीरें

पुरानी चीज़ों की जगह लाई गई
नई चीजें मसलन आलमारी, टीवी, कोई गुलदान
बहनों की बनाई तस्वीरों की जगह लगाई गई नई तस्वीरें

इसी तरह दिवालों पर किया गया कुछ ख़ास तरह का रंग-रोगन
बदले गए दरवाजे, खिड़कियों के पल्ले, कुछ सजावट के सामान

रोज ब रोज कुछ ना कुछ बदलता रहा है
घर का कोई कोना कोई हिस्सा

अपने को बदलता देख 
गुपचुप
कुछ कुछ
उखड़ा-उखड़ा दिखा
घर इन दिनों।


चुनुआ फ़कीर

हम जब छोटे थे
हमारी कॉलोनी में आते थे चुनुआ फकीर
बजाते सारंगी, मांगते थे भीख सभी घर में

जब तक मिल ना जाए कुछ
बजती रहती थी चुनुआ फकीर की सारंगी
उनकी सारंगी की धुन में होती थी
लोक मंगल की धुन

कोई कितना भी ना करने वाला हो
नहीं कर पाता था चुनुआ फकीर को कुछ देने से मना 

चुनुआ फकीर की सारंगी एक अद्भुत वाद्ययंत्र था
जिसे देखा था मेरे कॉलोनी के अभी हम उम्र बच्चों ने

चुनुआ फकीर की सारंगी सुनते हुए
हम बड़े हुए, पर इधर कुछ दिनों से
चुनुआ बिना सारंगी के आते हैं

चुनुआ रोज़ आते हैं पर केवल
अपनी बिरादरी के लोगो के यहाँ
वे अब नहीं आते भीख मांगने हमारे घर

ऐसा नहीं कि मिलने पर पहचानते नहीं
बुलाने पर आ भी जाते हैं घर
ले जाते हैं आटा, चावल, दाल, नून, तेल

चुनुआ फ़कीर ने छोड़ रखी है सारंगी बजाना
पहनना टोपी और चरखाने वाली लुंगी
चुपचाप कांधे पर पोटली रखे
दीख जाते हैं गुज़रते दूर से ही 

वे चलते हुए गिलहरी की तरह चौकन्ना दिखते हैं
जैसे भरी हो उनके भीतर कोई आशंका 

चुनुआ फ़कीर नही मांगते भीख घूम-घूम कर पूरी कॉलोनी में
मेरे घर कभी आ जाते हैं पुकार लगाने पर

पर आज कई साल हो गए
वे नहीं आये मेरे भी घर मांगने कुछ
अपने मन से बिना हमारे पुकार लगाये।


सब्जी बेचने वाला

सुबह जब हम चाय की चुस्की लेते
अपने घर के अहाते में बैठे होते हैं
वह निकलता है ठेले पर
सब्जी लिए पसीने से तर

थोड़ी देर में पहुँच कर चौक पर 
तान लेता है चार बाँस के डंडों पर छाया
अपने लिए नहीं सब्जियों के लिए

झट से भर लाता है पानी बाल्टी में
सींचने के लिए टमाटर, लौकी, धनिया, भिंडी
ताकि बनी रहे तरो-ताजा कम ना पड़े उनके भीतर की नमी

जबकि सूख कर काली हो चुकी है
उसकी अपनी काया
कि सारी नमी चली जाती है
इन सब्जियों को ताजा रखने और सहेजने में 

ग्राहकों के आने से पहले एक-एक टमाटर, लौकी, भिन्डी को
कपड़े से पोंछकर सजाकर रखता है
वह रोज नए नए ढ़ंग से
इतना कभी नही झाड़ा-पोछा होगा उसने ख़ुद को

पसीने से लथपथ और सूख चुकी उसकी काया में
बिजली-सी फुर्ति दिखती है
देखकर ग्राहकों को
वह अपने फ़ेफ़डे में पूरे जोर से हवा भरकर लगता है हांक
सब्जियों के कभी दाम तो कभी उनके
सबसे ताजी होने का का दावा करते

जिस दिन बिक जाती है सब्जी जल्दी
उसकी मेहनत से अलसाई आँखों में
देखते बनती है चमक श्रम की।


जड़

जब तक जड़ है पेड़ खड़ा है
धरती आसमान के बीच तूफान
बारिश का सामना करते

हरी है पतियाँ
बज उठती है
हवा के झोंखे से 

डाल और तनों में दौड़ता है हरापन
लगते रहते हैं फूल-फल 

जड़ों के होने से बचा रहता है सबकुछ
जड़ों के सूखते ही 
सूख जाता है हरा भरा जीवन

ये जड़ ही थी जिसने बार-बार बचाया
मुझे ठूँठ होने से।


नदी

क्यों भई
रहने दो ना
नदी को नदी
बहने दो उसे
मैदानों, जंगलों, पहाड़ों के बीच

उसे छोड़ दो कि वह करती रहे
अपने किनारों को हरा भरा
मवेशियों-चिड़ियों के कंठ तक
पहुँचती रहे अमृत बनकर

मत पूजो नहीं गाओ इसकी
महिमा के गीत सामुहिक रूप से
गला फाड़कर
अब नहीं है राज 
नदी क्या, सब जानते हैं

तुम नदी के लिए नहीं आते हो नदी के तट पर
बल्कि तुम चाहते हो नदी की रेत अपने शहर के लिए।

बदलाव

इस समय बहुत परेशान है
धनीराम से उसकी पत्नी और बच्चे
एक समय था जब वह सुबह
फारिग होने निकलता तो संग-संग
ले जाता बंसी और छोटे से थैले में चारा

लौटता, तो बहुत नहीं तो सुबह-शाम की मछलियां तो
मार ही लाता था नदी पोखर से

पर इन दिनों सुबह-सुबह
एक पॉलीथिन और एक छड़ी लेकर निकल लेता है
और कहाँ-कहाँ से ले आता है
तरह-तरह के फूल
और नहा धोकर चढ़ा आता है
उसे मंदिर में देवी-देवताओं पर

शाम को भी देर से कीर्तन भजन करके लौटने लगा है मंदिर से

धनीराम के घर खाने के लाले पड़े हैं
कल उसकी अम्मा मिली थी, कह रही थी -
'मति मारी गई है, धनीराम की!'


वह

वह जिसने जंगलों को काटकर
बनाये खेत, घर, बस्ती, गाँव

वह जिसने नदियों को मोड़ा
खेतों की ओर

वह जिसने जंगल से गुजरते हुए
बनाई पगडंडियां

वह जिसने दुर्गम पहाड़ों को तोड़ा
बनाई असंख्य सड़कें

वह जिसने बनाये
किले महल और विजय स्तम्भ

वह जिसने बनाया दुनिया को
रोज बेहतर कुछ और बेहतर

उसे ही हर दौर में दुनिया से बेदखल करने के
जारी रहे हैं प्रयास..

बाबजूद, वह 'बना रहा' हर दौर में।


जानना

जानना जरूरी है मेरे बारे में
गोयाकि मुझे बेहतर ढंग से जाना जा सकता इस तरह

मुझे तलाशा जा सकता है
मेरी आदतों, क्रियाओं, रहन सहन, बोलचाल, रंग रूप, बेबकूफियों, चालाकियों याकि सादगी में

इसलिए मेरे एक-एक पन्नों को
इत्मीनान से उलट-पुलट कर पढ़ो
कहीं कुछ छूट ना जाये
रह ना जाये कुछ भी अबूझ
इसलिए मुझे बार बार पढ़ा जाना
मुझे जानने के क्रम में
ज़रूरी है

हर मोड़, हर कोने, हर दिशा, हर ऊंचाई-नीचाई से देखकर जानो मुझे
छूटने ना पाए मेरा कोई भी हिस्सा अस्पष्ट तुम्हारे पास

मुझे जानने के लिए मेरे एक-एक तंतु, रेशे, सिरे तक पहुँचो
देखो उघाड़कर कर मुझे परत-दर-परत

हालांकि तुम्हारा मुझे जानना
लगातार करता रहा तुमको
मुझसे दूर।


ईश्वर

एक:
हमारी विस्तृत और विशाल 
दुनिया में रहते आये हैं
जाने कब से
कितने ही ईश्वर

हर ईश्वर के रहे अपने क्षेत्र 
अपना इलाका अपने अनुयायी
अपने स्तुति गान, महिमा, पहचान

सभी ने रखा केवल अपने ही 
अनुयायियों का ख़याल
उन्हें ही किया उपकृत
केवल उन्हीं के सुख-दुःख का  
लिया जिम्मा 

हर ईश्वर के अनुयायी 
भिड़ते रहे आपस में
अपने ईश्वर के लिए वे बने रहे 
एक-दूसरे के जान के दुश्मन 

जबकि कई बार
कई-कई मौकों पर 
किसी ना किसी बहाने से 
मैंने उन तमाम ईश्वरों को देखा है 
एक दूसरे का मंच साझा करते हुए।

दो:
उठो, ईश्वर!
तुम कब तक लड़ते रहोगे 
अपनी ही धर्मध्वजा के ख़ातिर

उठो 
लड़ो 
हमारी प्यास
हमारी रोटी के लिए भी  
एक युद्ध!


गौरैया

ओ मेरी प्यारी गौरैया
तुम आती थी कभी 
हमारे घर आँगन में
अपने पूरे परिवार सखी-सहेलियों के साथ
झुंड की झुंड
फुदकती-चहचहाती

माँ जब डालती थी 
घर की छत पर सूखने को अनाज
हमें दे देती जिम्मा 
तुमको अनाज तक 
न फटकने देने का

असल में मां ने कभी नहीं चाहा
तुम्हे दाना चुगने से स्वयं मना करना
वह जानती थी कि
उनकी तरह तुम भी तो एक मां हो
तुम्हे भगाने का काम हमें सौपते हुए 
वे ख़ूब जानती थीं
बच्चे है भूल ही जायेंगे तुम्हें उड़ाना
और तुम्हें मिल ही जायेगा दाना पेट भर

उन दिनों दादा सुबह-सुबह ही 
निकल जाते थे खेत
जब से आने लगते दाने फसलों में
वे खेत के इस कोने से 
उस कोने भागते ही फिरते
तुम्हारे झुंड के साथ-साथ देर तक
जब थक जाते तो हँसते
और फिर गाने लगते ऊंची तान में
तुम्हारे प्रेम में भरकर
जीवन दर्शन से भरा 
कोई एक गीत

तुम्हें अक्सर देखा हमने 
घर के रोशनदान, फोटो फ्रेम के पीछे 
किसी कोने अतरे में डाल लेती थी 
तुम अपना घोंसला
तुम्हें देखकर किलक उठते हम बच्चे
जब अपने बच्चों के मुंह में
डालती तुम दाना तो 
हम भी बना लेते अपना मुँह
तुम्हारे बच्चों सा
लगता जैसे तुम ने दाना 
डाला हो हमारी ही चोंच में

अक्सर दादी सुबह प्रार्थना के बाद
चुगाती थी दाना तुलसी चौरे के पास बैठकर
तब कैसे बैठ जाती थी 
तुममें से कई
दाना पहले पाने की ज़िद्द में 
दादी के कंधे व सिर पर
दादी की डांट का कोई असर नहीं था तुमसब पर

आज समय के साथ 
फुर्र हो गये वो दिन
फुर्र हो गई तुम 
तुम्हारे जाने में शामिल है 
कांक्रीट में ढलता हमारा शहर
हमारे खेतों में पड़ते कीटनाशक की भारी मात्रा
कि तुम्हारे लिए बचे नही कीट
भुला दी हमने
तुमको दाने चुगाने की कला
हवाओं में घोल दिया विकिरण

हमारे जंगलों की अंधाधुंध 
कटाई ने छीन लिया
तुमसे तुम्हारा आशियाना
प्रदूषित पोखर, तालाब, नदी का पानी
तुम्हारी प्यास में 
ज़हर बनकर पहुँचता रहा है
तुम्हारे कंठ तक 

हमारे बच्चों ने नहीं देखा है 
तुम्हें अभी तक करीब से
नहीं देख सके हैं वे तुम्हे अपने आस-पास
हालांकि हम दिखा रहे हैं
उन्हें तुम्हारा चित्र
उनकी किताबो में बना
पर वे देखना चाहते हैं चहचहाते
दाना चुगते, तिनका-तिनका बटोरकर 
घोंसला बनाते तुम्हें
तुम्हारे चूजों को अपनी हथेलियों में रखकर चाहते है सिखाना उड़ना

ओ मेरी प्यारी गौरैया
तुम आते रहना फिर-फिर
हमारे घर-आँगन
खेत-खलिहान में 
जब तक रहेंगे हम
रहेंगी हमारी संततियां
हम तुम्हारी राह तकते रहेंगे
तुम्हारी जान की दुश्मन बनी 
इस दुनिया में...


गुनाहगार

पेड़ किसने लगाया था
यह तो पता ना था
पर कॉलोनी के लोग 
उसके नीचे तेज धूप में
मजे से छाया में बैठते आये थे वर्षों से

फिर एक दिन कुछ लोगों ने
काट दिया उसे

जो लोग बैठते आये थे उसकी छांव में
वे अनमने से देखते रहे
पेड़ को अंत तक कटते
करते रहे उसके पुराने और मजबूत होने की बातें देर तक

उनमें से किसी ने कुछ भी नहीं कहा
उसके कटने को लेकर
सब चुप थे

अफसोस, इससे ज़्यादा और क्या हो सकता है
कि लोगों को छांह देने वाला
काटा जा रहा था
और लोग थे कि चुप थे!


पेड़ और आदमी

यह सच है कि जंगल के सारे पेड़
उन लोगों ने नहीं लगाये
जो रहते आये हैं
सदियों से जंगल में पहाड़ पर
पेड़ो के बीच

उनके बीच ही पले-बढ़े
हुए पौधे, पेड़
उन्होंने ही देखा सबसे पहले
बीज को अखुआते
पतझड़ में पेड़ों की पत्तियों का झरना
और फिर उग आना डाल पर
मौसम में फूलों का आना, फल लगना, लग कर झरना
सबसे पहले उन्होंने ने ही देखा

पेड़ों से ही सीख कर वे बने
पेड़ों के जैसे
अपने लिए खुद ही जुटाया हवा-पानी-भोजन
और काम आते रहे दूसरों के

यह भी सच ही है
कि जंगल के पेड़ों की अंधाधुंध कटाई
कभी नहीं की अपने लिए 
पेड़ जैसे लोगो ने

सारे सच के बीच यह सबसे
खरा सच है कि जंगल में
पेड़ों को व पेड़ों के तरह लोगों को
उनकी जड़ों से 
काटता रहा है
आदमी की तरह दिख रहा
आदमी!


बयान

सारे जंगल में यह चर्चा
हर ख़ास-ओ-आम कर रहा है
कि भेड़िये शाकाहारी होते हैं

अब यह बात किसी ने कही है
या सिर्फ कही-सुनी बात है
या सच मे ऐसा देखा भी है किसी ने
अपनी आंखों से
इस पर  जंगल मे कोई भी
कुछ बोलना नहीं चाहता

मेमना ने तो सिर्फ 
इतना ही कहा कि
ऐसा नही हो सकता

मेमने के बयान से
जंगल मे हड़कंप मचा है
फिलहाल भेड़ियों ने इस पर
सख्त एतराज़ जताते हुए
इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग कहा है।

- मिथिलेश राय


मिथिलेश राय

जन्मतिथि: 31. 01. 1975
सम्प्रति: हायर सेकेंडरी स्कूल में अंग्रेजी के शिक्षक। वागर्थ, सृजनलोक, कविक्रम एवं अन्य पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। दो साझा लघुकथा संग्रह प्रकाशित।
बाणगंगा रोड, जिला- शहडोल, मध्यप्रदेश में निवास।
संपर्क: +91 88898 57854