लाचार लेखक
मैं रोज़ कुछ लिखता हूँ
और भूल जाता हूँ कि
कल क्या लिखा था
क्या विषय था मेरे लिखने का
और किस कारण मैंने ऐसा लिखा था
मेरी उस कविता से कितना कुछ बदल गया
और कितनी बेहतर स्तिथि में पहुँच गया ये समाज
जिस में मैं रहता हूँ
और जिसे रोज़ कोसता हूँ
इसकी नपुंशकता के लिए
इसके मरे होने के लिए
जहाँ कुछ भी बदलता नहीं
और बदलता है तो
सिर्फ चन्द लोगों के लिए
जो शक्ति के स्वामी हैं
जिन्हें छूट है अपनी मनमानी की
जो रोज़ संविधान में संशोधन का माद्दा रखते हैं
जिन्हें समझ है धन के इस्तेमाल का
और जाति, धर्म, अशिक्षा, गरीबी, बेरोज़गारी की राजनीति का
क्या इन सब में फँस कर
मेरी कविता उसी रूप में पढ़ी, देखी और समझी जाएगी
जैसा कि मैं लिखता हूँ
या किसी दिन रोड पर पड़े
बेनाम लाश की तरह
मुर्दाघर में फेंक दी जाएगी
या किसी बच्ची की तरह
इसकी भी इज़्ज़त लूट ली जाएगी
और खुले बदन छोड़ दिया जाएगा तमाशा बनने के लिए
बीच बाज़ार में
या किसी दिन सदन में ये बहस होगा
कि ऐसी कविताएँ क्यों रची जाती हैं
कौन है इसका लेखक
और क्या उसका संबंध
वर्ग-विभाजन और राष्ट्रद्रोह से है
और
मेरी कविता लिखने की
क्षमता पर प्रश्न उठाकर
मेरी प्रतिभा पंगु कर दी जाएगी
फिर
किसी गुमशुदा जगह पर फटेहाल मैं मिलूँगा
और बदनाम हो जाएगी
मेरी वो कविता
जो कई रात जाग कर
बीवी से झगड़ कर
और बच्चों के हाथों से
फटने से बचाके लिखी थी
आँखों के नीचे काले गढ्ढ़े
और बालों की सफेदी
इस बात की साक्षी हैं कि
मैने अपना खून जलाया है,
स्वेद बहाया है
और
खुद को खोया है
इस कविता के निर्माण में
पर अब मैं सत्य समझ चुका हूँ
कि
सत्य वो नहीं
जो मैं अपनी कविताओं में लिखता हूँ
बल्कि हर एक का सत्य अलग है
जो हर कोई अपनी सहूलियत से मेरी कविता से निकालता है
और छोड़ जाता है
मेरी कविताओं में
एक सड़ी हुई लाश
और उस लाश से घिरा
मुझ जैसा उसका लाचार लेखक।
धर्म का सहारा
कमजोर ही लिया करते हैं
धर्म का सहारा
पुरुषार्थ के मतवादियों को
कतिपय इसकी जरूरत नहीं होती
जो कमजोर हैं
वो अपने अस्तित्व के लिए
दूसरों का डर खरीदते हैं
और मूल्य चुकाते हैं
धर्म की टकसाल से उत्पन्न सिक्कों से
जबकि पुरुषार्थी इस्तेमाल करते हैं
विवेचना, तर्क और आधार का
जिसमें भय और आक्रान्त का अवयव नहीं होता
जो नहीं टिका होता अवैज्ञानिक आस्थाओं पर
या जो तैयार नहीं रहता लड़ने और लड़ाने को
हर धर्मान्ध कमजोर है
वो भगत सिंह की तरह कभी भी
शक्ति का पर्याय नहीं हो सकता
क्योंकि शक्ति के लिए
क्षमा ज़रूरी है
शील अत्यावश्यक है
और बिना तर्क के ये सब अप्राप्य हैं
हिटलर निरीह और कमजोर था
जिसने नस्ल की आड़ में
नरसंहार का तांडव रचा
और अपनी नपुंसकता का पताका फहराता रहा
मनुष्य के हारने से
धर्म जीत जाता है
इसका कोई इतिहास है क्या?
तुम अपने अधिकारों की बातें क्यों नहीं करती
मैं
जब जब
अपने हक़ की बातें करूँगी
तुम
तब तब
अपनी बातों से मुकर जाया करोगे
मैं जिद्द करूँगी
तुम गुस्सा हो जाओगे
मैं गुस्सा करूँगी
तुम और गुस्सा हो जाओगे
मैं और गुस्सा करूँगी
तुम हाथ उठाने पर आ जाओगे
मैं अपनी आवाज़ उठाऊँगी
तुम मेरे बदन पर शोर मचाओगे
और
फिर मैं गिड़गिड़ाऊँगी
फिर तुम खुश हो जाओगे
अपनी दम्भ का पताका भी फहराओगे
और
फिर रात में
जब मेरे जिस्म से तुम खेलोगे
फिर मुझे पुचकारोगे
और
गहरी आँहें भरकर बोलोगे
"तुम अपने अधिकारों की बातें क्यों नहीं करती?"
सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी, लोक सभा सचिवालय
संसद भवन, नई दिल्ली
मोबाइल नंबर: 9968638267
ईमेल: salilmumtaz@gmail.com



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