एक अशांत मन
चौराहों पर
गलियों में
सड़कों पर
बस अड्डों पर
हरवक्त घूमता रहता है
एक अशांत मन
रोटी की तलाश में
अनाज के घड़ों में
भरी होती है निराशा
अनाज की जगह
भूखे बच्चों को
सोना पड़ता है अक्सर
रोटी के बिन
न्याय और सम्मान
उसकी खातिर हमेशा
रहता है शून्य
गाँवों से शहर
शहरों से गाँव
आना और जाना
होती है उसकी विवशता
ना कोई सैर
और न ही कोई शौक।
बंधे के इस ओर
होती है शुरुआत
बरसात की
और बरसात का पानी
लगता है चूने-टपकने
टिन और फूँस से
बने मकान में
उस काली-अँधेरी रात में
जब होने लगती है
तेज़ की बरसात
तो दिल-ओ-दिमाग
होकर बेचैन
लगता है दौड़ने-भटकने
खूँटे पर बँधी
मवेशियों की ओर
खेत में लगी
फसलों की ओर
सूखने के लिए फैलाई गई
लकड़ी की ओर
जिससे होता है संभव
दो जून की रोटी।
बंधे के इस ओर
आया हुआ नदिया का पानी
पहुँच चुका होता है
पहले ही गले तक
और फ़िर धीरे-धीरे
बढ़ने लगता है
नाक और मुँह की ओर
नदी और गाँव के बीच का फ़र्क पहचाना
हो जाता है मुश्किल।
अक़्ल के दुश्मन
पेड़
जंगल
नदियाँ-पोखर-झरने
इंसानी ज़िंदगी के
ख़ैरख़्वाह हैं
पेड़
जंगल
नदियाँ-पोखर-झरने
दुश्मन हैं
इंसानी अक़्ल के लिए...
अब वह अख़बार नहीं पढ़ती
उसने बंद कर लिया है
एक कमरे में अपने आप को
उसने बंद कर दिया है
अख़बारों के पन्ने पलटना
वह और दिन थे
जब वह आकुल रहती थी
जानने के लिए
'जनरल नाॅलेज' और 'करेंट अफेयर्स'
जब उसके हाथ में होता है रिमोट,
वह नहीं दबाती
न्यूज़ चैनलों के नंबर
'देहांत' से बहुत पहले
उसने महसूस कर लिया है आत्मा का अंत।
बुरे के विरुद्ध
खोला है तुमने
अपना मुँह
बुरे के विरुद्ध
शायद तुम
गूँगा होना चाहते हो!
अनुज पाण्डेय
युवा रचनाकार। नौंवी कक्षा के छात्र। उम्र: 14 वर्ष। पढ़ने-लिखने में रुचि। गोरखपुर, उत्तरप्रदेश में निवास। अनुज से उनके मोबाइल नंबर 8707065155 पर बात की जा सकती है।



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