एक
एक बीमार का प्रेम सन्देश
प्रिय कांटों
सिस्टर (नर्स) कहती है/ रात को यदि नींद आ जाए
तो मैं दुनिया का सबसे सुखी बीमार हूंगा
बहुत अजीब है ना, सबसे सुखी बीमार
डॉ कहता है/ यदि मैं बीमार नहीं होता
तो मजाज़ लखनवी के से मिजाज में रुखसत हो जाता
एक दोस्त/ जो खुद मेरे जितना ही बीमार है
सेबों के बागीचे से/ ताजे ताजे अफ़साने तोड़कर लाता है
दूर देश की एक ज़हीन लड़की
सुर्ख लाल गुलाब मेरे सिरहाने रखकर
ताकती रहती है/ मेरे काले पड़ चुके होठों को
शायद वो बीमार से ज्यादा/ बीमारी वाले होठों को
छूना चाहती है
किसी कविता की मृत्यु से भी भयानक है
किसी की खुशियों के आबशार में जहर डालना।
दो
कार्यक्रम स्थगित
ठीक उसी साल पैदा होना बताया गया मेरा
जब अयोध्या की धरती
दो विपरीत रतिक्रियाओं में मग्न थी
एक दूसरे के लिंगों को छिन्न भिन्न करने के कुत्सित उद्देश्य से
कुछ सालों बाद रेडियो और टेलीविजनों में
एक ही विजन चल रहा था
उस रतिक्रिया से पैदा हुए बदबूदार मवाद को
कैसे देश की सोंधी खुश्बू में मिला दिया जाए
भाड़े के कुछ लुटेरे/ सिंघासन पर बैठकर
आदमियत की बातें करते पकड़े गए
जबकि उनकी भौंहें उनकी आंखों की पुतलियां
उनकी गहरे चटक लाल रंग की जीभ
उनके ठीक विपरीत दिशा में घूम रही थी
अब जबकि मैं रंगमंच पर नकली (हास्य कलाकार) की भूमिका करने आया था
मुरदा मांसपिंडो को देखकर/ हंसने हंसाने का अपना कार्यक्रम स्थगित करता हूँ।
तीन
फूल सन्नाटे का आंनद है
क्या तुम्हें नहीं पता था
कि फूलों के साथ साथ कांटे भी मिलेंगे
कांटे शोर करते हैं
फूल सन्नाटे का आनन्द है
एक खुरपी यदि गलत दिशा में घूम जाए
तो सन्नाटों को भयावहता में बदल देती है
आकाश में उड़ी खुश्बू को
किवाड़ मूंदकर रोका नहीं जा सकता
लेकिन डब्बे में बंद किया जा सकता है
मेरे पास साइकिल था
जिसके दो पैडलों पर पूरी दुनिया घूमी जा सकती थी
तुम्हारे साथ, लेकिन
साइकिल की ताड़ियों में डंडा फंसाने वाले लोग
हमारे साथ साथ चल रहे थे
चींटियां एकरेखीय चलती हैं
खाने की तलाश में
लेकिन हम प्रेम की सम्पूर्णता की खोज में थे!
चार
एक आंख है जो देख रही है
तुम्हें कपड़े उतारते हुए
एक कान है जो सुन रहा है
तुम्हारे नारों की खड़खड़ाहट को
एक दिमाग है जो नियंत्रित कर रहा है
तुम्हारी सांस्कृतिक लड़ाई को
यह सदी, गुमराह करने के लिए
सृजन की ईमानदारी को/ कड़ाही में उबाल खा रहे
मटन के टुकड़ों में खरीद लेगी ।
फिर भी कविता को /न अपनी जमीन छोड़नी होगी
न आकाश की तरफ ताकना
और न ही अपनी मुलायमियत का रंग ।
पाँच
अधूरा सन्त्रास
मैं एक अधूरा सन्त्रास हूं
जैसे एक आधी बुझी बीड़ी
रखी हो मेज के किनारे
मैंने हज़ारों कुंठित उत्सव मनाऐ हैं
जिन्होंने चाट लिया है, घुन की तरह
मेरे भीतर बैठे देवता को!
हर अमावस्या की रात
किसी मंदिर के पिछवाड़े बैठकर
घटिया दारू चटखारे लेकर पी है मैंने!
मैं जला दिए गए उपन्यास का वो नायक हूं,
जो पत्थरो में अपनी प्रेमिका के चुम्बन तलाशता है!
सच कहूं,
फफोले फोड़ने में जो मजा है,
किसी स्त्री नाभि की चिकोटियाँ काटने में भी नहीं!
कपिल भारद्वाज
युवा कवि। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में पीएचडी के शोधार्थी। पहला काव्य संग्रह 'फिर देवता आ गए' फरवरी 2021 में प्रकाशित।



2 टिप्पणियाँ
कपिल भारद्वाज की कविताएं पढने पर एक नई ऊर्जा का संचार होता है, इनकी कविताओं में जो मर्म छिपा होता है असल में वह हमें वास्तविकता से जोड़ता है- बधाई की कपिल
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