आजकल
एक
वो कल गया
फिर कल लौट आने के लिए
मेरा आज उसका कल है
उसका कल कब आयेगा
ये सवाल मेरा आज है..
दो
वो कल था मेरे पास
आज नही है
'मेरे कल में आज वो ही पास है'
बस उसके पास
वो कल आजकल नहीं है..
तीन
मैने उसे कल ही कहा था
नहीं आ सकते तुम कल
उसके कल आने के इंतज़ार में
मैं आजकल
कल का इंतजार करता हूँ!
गिरवी
उसे जब लगा
कि भूख रुलाएगी
रात होते होते
दोपहर बाद
उसने घर के कुछ भाड़े
साहूकार के यहां गिरवी रख छोड़े
बचा था बस
तवा, चमचा, डेगची
और खरीद लाया
तीन दिन का
नाज, प्याज, नूण
सोते समय बिटिया के
सर पर हाथ फेरता
सुनाता कविता
"बाबा कल जायेगा
मंच को जगायेगा
तालियां भी बजबायेगा
तेरी लिए पढ़ने को
किताब खरीद लायेगा।"
स्तब्ध
देखा है मैंने
अभी-अभी
इक नदी
को उफनते हुए
उमड़ती, इठलाती
बहकती-बहकाती
बहुत शोर था
खेत-खेत, ढ़ाणी, गाँव
और मचलते लोगों में
महसूस किया मैंने
मैं पत्थर-सा बेजान
स्तब्ध देखता रहा!
शामिल नहीं था बस मैं
न बहकने में न मचलने में..
गहराई
पुल पर खड़े रह कर
दूर तक जाती नज़र
थरथराता मन भी पुल के साथ
दिल भी किनारे पर हिलते-डुलते
पानी की गहराई को नापता
और साथ बहता
रहा पानी के
खोज लिया
रास्ता नदी से पार
निकलने का आँखो ने!
संवेदना
अपने राग में
एक अकेली बहती नदी
तुम अपने
एंकात के रंग रंगी हो
इस रंग का रस स्पर्श
पृथ्वी की पीड़ा को संवेदना है!
मृत्यु गीत
अब हर
'हासिल'
के बाद रिक्त है मौन
जानता हूँ
कि अब के बाद आज क्या लेकर जा पाता
आवाज़ के बाद 'मैं' को बेचैन किया
अनदेखी, अनसुनी पीड़ा में शून्य जोड़ कर फिर एक नया सवाल बना लेता
चीखने भर से थक गया और हासिल भी क्या किया?
'मौन तुम मेरी स्मृति के मृत्यु गीत हो!'
चाँद-सी रोटी
दिन गरजेगा कल
सुबह से ही
चिंता मुक्त
दोपहर ही खा लेगा
रात की सिकी चाँद-सी रोटियां कल भी
'असंभव सरल शब्द नहीं है'
भूख बगावत नही करने वाली
पेट प्रकृति की भाषा पढ़ना सीख गया है!
सांत्वना
वो आया
आ कर गया
आये और गये में
मौन सवांद नजरों से हुआ!
बाहर जाकर वो था खुश
नजरों की सांत्वना से स्वयं को उसने निर्दोष घोषित किया!
- भारद्वाज दिलीप



1 टिप्पणियाँ
धन्यवाद द साहित्यग्राम टीम का 🌻
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