हम चुप रहे
जब बस्तियां जलाई जा रही थीं
जब नफ़रत की आग में
ज़िंदा इंसानों को जलाया गया
जब धार्मिक ध्वजों के नीचे
देशभक्ति के नारे लगाए जा रहे थे
हम चुप रहे
औरतें चुप रहीं, लड़कियां चुप रहीं
हर बलात्कार के बाद
हर घरेलू हिंसा के बाद
हर भद्दे टिप्पणी के बाद
हर घोटाले के बाद
हर झूठ के बाद
हर बर्बरता के बाद
हम चुप रहे
चाय की टपरी पर
हमने अपनी मानसिक चेतना का
सुदृढ़ उदाहरण दिया था
पर जब बोलना चाहिए था
हम चुप रहे
जब हमें सवाल करना था
जब हमें चिल्लाना था
हम चुप रहे
हम उम्मीद की बात करते रहे
जबकि हमें इंक़लाब की बातें करनी थीं
ग़लत को ग़लत कहते हुए
हमें बेबाकी से
सच का साथ देना था
हमें इतना अंतर्मुखी नहीं होना था
कि अपने अधिकार की बात भी
अपने होठों पर न ला सकें
हम चुप थे
हम चुप हैं
और हम चुप रहेंगे
क्योंकि विश्वपटल पर
भारत की छवि का धूमिल होना
हमारे स्वाभिमान को आहत नहीं करता।
चिट्ठी
तुम्हारी नज़रें जब मुझपर आती हैं
तो ऐसा लगता है कि
तुम मुझे अपने वजूद में शामिल करना चाहती हो
लेकिन मैं अक्सर तुम्हें मंदिरों में झुकता हुआ देखता हूं
तुम्हारा यूं बुतों के सामने झुकना
मन्नत मांगना
धागे बांधना
मुझे अच्छा नहीं लगता;
मैं तुम्हारी नज़रों को झुका हुआ नहीं देख सकता
क्योंकि झुकी नज़रें न ख़ुद से लड़ती हैं
न ज़माने से
और मुझे पाने के लिए तुम्हें लड़ना होगा
ख़ार-ज़ारों पर चलना होगा
मैं इस सफ़र के मर्हले पर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ।
हम मरेंगे
हम मरेंगे!
पत्थरों को कहकशां का रूप देकर
हर तिमिर को इक सुनहरी धूप देकर
इस जहां को इक अनोखा रंग देकर
रोती आंखों को हंसी का ढंग देकर
बेबसों को ख़्वाहिशों का ज्वार देकर
झुग्गियों को उनके हक़ का प्यार देकर
पतझड़ों में सावनों का बीज बोकर
अपने सर पर चाहतों का ताज ढोकर
हम मरेंगे!
जब मिलेंगे धरती और अंबर कहीं पर
जब खिलेंगे एकता के गुल ज़मीं पर
हम मरेंगे!
दुश्मनों के नफरतों को प्यार देकर
दोस्तों को दिल से लिक्खे तार देकर
हम मरेंगे तो मरेंगे, ख़्वाब नये दे जाएंगे हम
हम मरेंगे तो मरेंगे, लौटकर फिर आएंगे हम।
बिन माँ के लड़के
बिन मां के लड़के
गोल-गोल रोटियां बनाते हैं
वो समझ चुके होते हैं
कि घर संभालना
केवल औरतों का काम नहीं होता
वो सामाजिक लैंगिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होते हैं
बिन मां के लड़के
अपना खाली वक़्त
आईने के सामने गुज़ारते हैं
वो स्पष्टतः देख पाते हैं
अपने चेहरे पर मां की सूरत
और अपनी आंखों में
मां की आंखें।
प्रसून सारंग
युवा रचनाकार। उम्र: 21 वर्ष। नालंदा खुला विश्वविद्यालय में स्नातक (प्रथम वर्ष) के छात्र। छपरा, बिहार में निवास।



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