रूढ़िवादिता के खिलाफ इतिहास की पहली लड़ाई
निश्चित ही पेट की भूख ने लड़ी होगी
वही भूख जिसने
महिलाओं को घर की चौखट लांघने को मजबूर कर दिया होगा
वे खेतों में निकली होंगी
ज़मीनों को खोदकर दफ़ना दिया होगा
ब्राह्मणवाद की सड़ी हुई लाश
और रोप दिया होगा
चेतना के पौधे को!
उनके कांखों से निकले हुए पसीने
सींचे होंगे उन पौधों को
जिनके छांव में हमारा वर्तमान सांसे ले रहा है
महलों और झोपड़ियों के बीच
मात्र यही एक अंतर है
महलों ने कुप्रथाओं को संस्कारों की चादर में लपेटकर
समाज को दमघोंटू बनाये रखा
जबकि झोपड़ियों ने उन चादरों को फाड़कर
बदलाव का परचम लहराया
यह कहना अतिशयोक्ति न होगी
कि इन सबका नायक भूख ही है
किंतु भूख ने केवल झोपड़ियों में ही क्यों दस्तक दी?
ज़रा ठहरिए और सोचिए,
इसका ज़वाब ही लोकतंत्र का इलाज़ है।
संगीत
चूल्हे पर पकता भात
और उससे निकलता संगीत
सभ्यताओं के विकास क्रम में
सुना गया सबसे सुंदर संगीत है
पेट की भूख
एक ऐसी महफिल है
जहाँ इसे बड़े अदब के साथ सुना गया।
मर्दानगी
दो पक्षों में लड़ाई हुई
सबने एक-दूसरे को मां-बहन की गालियाँ दी
महिलाएं घर में बैठीं
उनके लिए रोटियाँ बनाती रहीं
ये जानते हुए भी
कि आज फिर
पुरूषों ने अपनी मर्दानगी उनपर ख़र्च कर दी।
गिद्ध
एक अधमरी लाश पर
बहुत सारे गिद्धों को चोंच मारते देखा
कुछ देर बाद
लाश मांस विहीन थी
वहाँ सिर्फ़ हड्डियां बिखरी पड़ी थी
हड्डियों से जनतंत्र की बू आ रही थी
और गिद्धों के जाते झुंड से
खादी कुर्ते की गंध!
प्यास का मज़हब नहीं होता
भूख, भूख होती है
प्यास, प्यास!
अक्सर, मैंने ऐसा सोचा
किंतु दुनिया मेरे मन से कहाँ चलती है?
पानी कभी गंगा
तो कभी आब-ए-ज़मज़म हो जाता है
भूख
कभी पेट की
मजहब की
कट्टरता की
तो कभी वासना की हो जाती है
किसने बनायी ये रीत
ये कायदे कानून?
प्यास
सरहद, मज़हब
देखकर तो नहीं लगती!
आब-ए-ज़मज़म हो या गंगा
आखिर पानी ही तो है
प्यास ही तो बुझाती है
नफ़रत की रेत ऐसे ही उड़ती रही
तो ना यहाँ पानी बचेंगे
ना मज़हब
ना हम
सिवाय बंजर पड़ी भूमि के!
जहाँ बसंत नहीं आएगा
फूल नहीं खिलेंगे
अगर कुछ होंगे
तो सिर्फ़ काँटे
और काँटे कभी प्यास नहीं बुझाते
वो तो सिर्फ़ चुभना जानते हैं।
आत्मसमर्पण
मुझे भी युद्ध लड़ना हैं
किंतु मेरे पास ना ही मिसाइलें हैं
और ना ही सैनिकों का जत्था
मुझे नहीं जीतना है कोई देश
ना ही कोई क्षेत्र विशेष
जबकि कुछ नहीं है मेरे पास
सिवाय प्रेम के
तो रख दूंगा अपने हाथ
तुम्हारे हाथों पर और कर दूंगा आत्मसमर्पण
हर बार जंग जीतने के लिए लड़ा जाए
जरूरी तो नहीं!
दबी हुई पुकार
दुःख की कोई भाषा नहीं होती
रोना हमेशा से मौन ही रहा है
कौन सुन पाया है बेबसी की चीख
जो बजती है हमारी नसों में
चढ़ती है मष्तिष्क के सबसे ऊपरी सिरे पर
और फिर ख़ामोश हो जाती है
दरअसल, हम सब अपनी-अपनी
चीखों की शोर में दबी हुई पुकार हैं
जिन्हें अब तक सुनी नहीं गई
हर बार "माफ़ करना, देर हो रही है" कह कर
हम सब अजनबियों की तरह निकल गये
ये जानते हुए कि उन्हें उस वक़्त सबसे ज्यादा ज़रूरत हमारी थी।
हम रोक सकते हैं
इतिहास के पन्ने
बीते युगों की तरफ खुलने लगे हैं
हिटलर के गैस चेंबर
नीरो की बांसुरी
पन्नों पर हरकतें कर रहे हैं
इतिहास तो शाश्वत है
पन्ने फाड़कर भी नहीं रोक सकते बांसुरी का बजना, रोम का जलना
और ना ही,
चेंबर में मरते वकीलों, लेखकों, छात्रों और जिंदा लोगों की चीख़!
हम रोक सकते हैं
अपने अंदर मर रही संवेदना, ओझल होते संघर्ष
और समय के बनते क्रूर इतिहास को...
- आदित्य रहबर



3 टिप्पणियाँ
आदित्य भाई सब एक से बढ़ कर एक
जवाब देंहटाएं👌👌❣️❣️🍫🍫
Nice
जवाब देंहटाएंअद्भुत अकल्पनीय गहराइयों के साथ पहाड़ों को लांघती
जवाब देंहटाएंसमाज की कुरूतियों का परिचय कराती हुई अनवरत धारा में बहती हुई कविताओं का संग्रह