कछुएं
खबर आई कि
काशी से बहते-बहते
चले आए हैं कुछ बेजान कछुएं
सूबा-ए-मगध की ओर
करते साँसों की डोर
गंगा में प्रवाहित
तभी एक और खबर चल पड़ी
इसके ठीक विपरीत
दोनों तरफ से चलता रहा
खबरों का पुरज़ोर खंडन
होता रहा बखान
कि किसकी कमीज़ है कितनी दागदार
कितने शफ़ीक़ हैं दोनों के ताज़दार
पर सामने न आया कोई दावेदार
क्योंकि वह कछुएं -
न तो थे कोई स्वर्णमयी हंस
जिन्हें गढ़कर बन सके
किसी शासक का राज-मुकुट
और न ही कोई जमीन का टुकड़ा
जिसे पाने की सनक में
भिड़ जाएँ
दो देशों की सेनाएँ
वह तो थे केवल मामूली कछुएं
जिन्हें पहली साँस के साथ ही सिखाया गया रेंगना
ताकि रेंगते-रेंगते गल जाए सारी उनकी हड्डियाँ
और मृत्योपरांत भी मयस्सर हो न पाए चंद लकड़ियाँ
मगर निर्माणाधीन रहे बादशाह के रथ का पहिया।
मैं भी रोज की तरह रेंग रहा हूँ
पढ़ते हुए अपना अखबार
आज की सुर्खियाँ कहती हैं -
"अंत्येष्टि का अधिकार
आर्टिकल इक्कीस..
आर्टिकल पच्चीस.."
शब्द और सभ्यताएँ
अपने काफ़िले संग गुज़रता हुआ
कोई हुक्मरान जब देखता है
एक मामूली सा, राह-चलता, बेख़ौफ़ शब्द
जिसे देखने भर से उसे होती है
एक अजीब सी कंपकपाहट
तभी तानाशाह के पसंदीदा शब्द
उस निहत्थे शब्द को घेरते है भीड़ बनकर
उसी वक़्त एक सुर और ऊँची आवाज में गुंजता है
उनका पसंदीदा नारा
जिसकी गूंज में खो जाए विरोध की हर एक ध्वनि!
तानाशाह मुस्कुराकर आगे निकल जाता है।
दूसरी ओर एक और भीड़ है
जो दूर से देखती है इस वाक़ियात को
और मन ही मन करने लगती है घृणा
ऐसे तमाम शब्दों से
जिन्हें हजारों वर्षों की यात्रा के बाद
सभ्यताओं ने स्वीकारा था
खुद अपनी बेहतरी के लिए
मैं, बस इतना जानता हूँ -
पहले शब्द मरते है
फिर सभ्यताएँ!
विश्वजीत गुडधे
युवा रचनाकार। उम्र: 24 वर्ष
मुख्यतः मराठी भाषा में रचनाएँ करते हैं। विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं तथा समाचार पत्रों में गजलें, कविताएं एवं लेख प्रकाशित।
प्रकाशित किताबें: ऋतु शब्दांचे, सूर माझ्यामनीचे (दोनों मराठी)।



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