चलते चले जाने से दूरियाँ घटती हैं
संग्रहण से कोष बढ़ता है, परिपूर्णता आती है
गिरना हर बार हताश नहीं करता
वह सम्बलन भी करता है
फिर से प्रबुद्ध करने की अभिप्रेरणा
बस उसी में निहित है
एक वही है जो कहता है–
'अशेष हो तुम'
उम्मीदें, आकांक्षाएँ, लक्ष्य सभी
एक ही परिवार के सदस्य हैं
सभी को उनके हिस्से का
प्रेम व समर्पण चाहिए।
उम्मीदें ही हैं जिनमें शिथिलता नहीं होती
आकांक्षाएँ सदैव भोर दिखाती हैं
उनके पास कोई साँझ नहीं
लक्ष्य उन्निद्रता लाती है, निद्राएँ अदृष्ट करती है
फिर भी इन सब से अलग
अगर कहीं से निराशा उत्पन्न हो रही है
तो तुम्हें रुकना नहीं है
बस रुकना ही नहीं है
चलते चले जाना है।
कविता
जो कविता
लेखक के हृदय में पल रही होती है,
और जो लिखी जाती है
दोनों में नितांत अंतर होता है
लिखित कविता,
हृदयंगत कविता का
एक अंश मात्र होता है
जैसे एक वृक्ष की कुछ पत्तियाँ, फल, फूल
जैसे सागर की कुछ बूँदें
जो कविता
लेखक के हृदय में पल रही होती है,
और जो लिखी जाती है
दोनों में नितांत अंतर होता है
लिखित कविता,
हृदयंगत कविता का
एक अंश मात्र होता है
जैसे एक वृक्ष की कुछ पत्तियाँ, फल, फूल
जैसे सागर की कुछ बूँदें
जैसे शहर में एक मकान
जैसे इमारत की कुछ ईंटें
जैसे पक्षियों में एक पंछी
जैसे इमारत की कुछ ईंटें
जैसे पक्षियों में एक पंछी
जैसे लहरों में एक लहर
जैसे साँसों का एक स्पंदन
और पूरे राष्ट्र में एक शहर
ऐसे ही बस एक हिस्सा
लिख पाता है
एक लेखक, एक बार में।
जैसे साँसों का एक स्पंदन
और पूरे राष्ट्र में एक शहर
ऐसे ही बस एक हिस्सा
लिख पाता है
एक लेखक, एक बार में।
- विजय बागची 'साधक'
विजय बागची 'साधक'
युवा रचनाकार। स्नातक (शिक्षा) में अध्ययनरत। पढ़ने-लिखने में रुचि।



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