वर्तमान अतीत का प्रतिबिंब है

इतिहास में पहली बार
जब 'अन्याय' शब्द की परिभाषा गढ़ी गई,
परंपराओं और रूढ़ियों के सताए हुओं को
इसके दायरे से बाहर रखा गया।
'ईश्वरीय न्याय' की बात करने वालों ने
कई बार चाहा
कि 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धांत
कर दिए जाएँ दरकिनार;
और किसी दूसरे लोक में प्राप्त
संभावित सुख-एश्वर्यों के समतुल्य
ठहरा दिए जाएँ
इस लोक के संत्रास;
कर्मफल के नियमों में बांध दिए जाएँ
श्रम-संताप-दुःख-अत्याचारों
की वैधानिकता;
पाप और पुण्य की अवधारणाओं में गौण कर दिए जाएँ जीवन की प्रवंचनाओं के प्रश्न!

परंतु अतीत की दुश्वारियाँ
कभी अपने एकांतवास में नहीं रहीं,
ना ही वक्त की बयार
एक ही दिशा में अजस्त्र बही,
वर्तमान एक साथ दोहरी भूमिका में खड़ा रहा-
अतीत की परछाई
और भविष्य की पूर्वपीठिका के सदृश।

रोम में ब्रूनो को जलाया जाना
भारत में सतियों के जलाए जाने से
पूर्णतः असम्बद्ध कभी नहीं रहा,
ना ही एकदम असम्पृक्त रहा
सुकरात और मीरा के विषपान का स्वाद।
ब्रूनो की राख ने गैलीलियो को रोशनी दी,
वहीं सतियों की चिताओं ने जना
सावित्री-रुद्रमा-गाइदिनल्यू को।
सुकरात के -
"विश्व कभी भी एक ही सिद्धांत की परिधि में नहीं बांधा जा सकता"
के उद्घोष ने निर्मिती दी
प्लेटो, अरस्तू और सिकंदर को,
तो मीरा ने जनी और कई मीराएँ-
जब कभी भी लांघी गई मर्यादाओं की दहलीज
प्रेम की स्वच्छंदता में।

...इतिहास की असंगत धाराएँ
वर्तमान के समुद्र में मिलने से पहले
अवक्षेपित अवश्य करती हैं
अपने भीतर का गाद,
ताकि उनके प्रवाह का अवरोध
उनकी निरंतरता का बाधक ना बन सके;
ताकि समंदर की समावेशिता
अपनी सार्वभौमिकता के प्रति निष्ठावान होने से
ना चूक जाए।

कालक्रम में इसी मुहाने पर जमी
तलछटी में पनपते हैं
'घने मैंग्रोव' और 'सुंदरी वृक्ष'
जिसके प्राणवायु में पोषित होता है जीवन
और उसकी विविधता;
जिसके उन्मुक्त संरक्षण में
बचा लिया जाता है मनुष्य
और उसकी संवेदना...
कि हमारा वर्तमान अतीत की
सार्थकता का पैमाना है।


विषयांतर

मित्र ने पूछा: देश में करोना की लहर
इतनी उठान पर क्यों है?
"मुल्क का हुक्मरान इसके एक प्रांत में
जम्हूरियत बचाने को आराध्य के
जयकारे लगवा रहा है,
अहा, प्रजा भावविभोर है।",
मैं बुदबुदाया।

उसने कहा: टीके की उपलब्धता
हर एक को हो पाएगी?
- "मुल्क के दूसरे प्रांत में लोग
परंपरा की डुबकी लगा रहे हैं,
अपने रिवाजों को बचा रहे हैं,
वाह, कितनी प्राचीन है इनकी संस्कृति!"

वह ठिठका: अब तो हमारे आस-पास भी लोग मर रहे हैं!
- "कल का मैच बड़ा रोमांचक था!
हमारी टीम विजयी हुई, लड़कों ने अच्छा प्रदर्शन किया।",
मैं इतराया।

"तुम मेरे प्रश्नों का उत्तर क्यों नहीं देते?",
वह झुंझलाया।
"इम्तेहान नहीं टलने वाले,
पाठ्यक्रम के सवालों के ज़वाब तलाशने
ज्यादा मुनासिब होंगे।", मैंने उत्तर दिया।


'धरतीपुत्रों' के बारे में

मैंने देखा है उन्हें
शहरों से दूर,
तराई वाले इलाकों
और पहाड़ों की ऊँचाई पर
बने घरों में वास करते।
श्याम-वर्णित मुखड़े के पीछे
उनकी दंतावलियाँ
टिमटिमाती हैं-
तारक-शृंखलाओं के सदृश
जैसे झरने का पानी
पत्थर से फूटकर मोती बन जाता है।

गठीले बदन पर
हरे वस्त्र धरते हैं वे 'धरतीपुत्र',
कि सदियों की सेवा से उनकी आत्मा
नदियों की आश्रयनी
हो गयी हो और
कपड़ों के किनारों पर बस गया हो
पर्वतों के 'हरेपन' का स्त्रोत।

उनकी सहृदयता से ढँक जाता है
समूचा आसमान
ज्यों उनके मन
पानीवाले घुमड़ते बादलों से मिल गये हों!
उन्हीं की जीव्यता पर टिके हैं
अधित्यका-आधार।

जंगलों के बीच,
गाँव की बाहरी बसावट पर
यात्राओं के दरमियान
और साँझ ढले के पहले..
मैंने कई दफा मांगी है उनकी सहायता।
उन्होंने हर बार दिखाया है
प्रकृति का विशाल हृदयागार।
मैंने भी कई बार
खरीदा है,
उनका ढोया बाँस और कोयले का बोझा
और हर बार
उनके श्रम को निम्नतर आँका है
जैसे उनका पसीना
भाप की जमीन पर पनपा हो।

मैं जानता हूँ उनका 'प्रेम',
क्योंकि मैंने उन्हें समूह में गाते देखा है
मांदर की थाप पर
क्रमबद्ध कतारों में,
परस्पर झूमते देखा है स्त्री-पुरुष सबको।
उनकी परंपरा में नहीं है
स्त्रियों को कमतर मानने का 'दोहराव'।

मैं परिचित हूँ
उनकी 'प्रतिबद्धता' और 'पूजा-पद्धतियों' से;
वे लोग छायाद्रुमों की पूजा करते हैं
और आजन्म उसे बचाते हैं।
संस्कृति में उनकी
पैबस्त हैं -
कृतज्ञता के मूल तत्व।

मैंने पढ़ा है 'बिरसा' का इतिहास,
इसलिए मैं आश्वस्त हूँ
उनकी न्यायप्रियता को लेकर।
मैं हिमायती हूँ
उनके अधिकारों का -
क्योंकि मैं 'उलगुलान' और 'हूल' का अर्थ समझता हूँ।
इसलिए डरता भी हूँ
कि कहीं 'निश्चल और सच्चे'
मनों का ताप,
'दामिन-ई-कोह' के
कोयला खदानों तक ना पहुंच जाय।

हाँ! वे 'आदिवासी' ही हैं
पर मैं उन्हें प्रहरी कहता हूँ;
प्रहरी -
जल, जंगल और जमीन के।


उन्मुक्तता और प्रेम

जिन पर्वत शृंखलाओं को
निहारा करती हो तुम
अपने छत की ऊँचाई से
वही पहाड़ -
रोकते हैं मेरा दृष्टिपथ।
हमारे गुणों के सुमेलन में
उभयनिष्ठ हैं
कुछ पर्वत शिखर।

इसलिए हमारे प्रेम को मिली
आसमान की ऊँचाई
जहाँ उड़ते -
रुई के फाहों को
अक्सर चूम लेती हो तुम।
फिर उनकी प्रतिच्छाया में
उमग उठता है- 'मन मेरा'!

मेरे आश्चर्य का
पुनः पुनः
परिसीमन करती तुम!
खाली सड़क पर चलते वक्त
अक्सर धर लेती हो
रूप-हरे समंदर का
और मेरा प्रेम;
उनके ऊपर उड़ते
छोटे पंछी जितना उन्मुक्त हो जाता है।


हमारे समय के शिलालेख

आपदा नियत नहीं होती;
प्रतिक्रियाएँ हो सकती हैं।

किसी महामारी में
व्यवस्था की लापरवाहियों से मरा आदमी
मुक्त नहीं होता,
शिलालेख बन जाता है अपने समय का।
उसकी आत्मा पत्थरों में खुद जाती है
जो चीख-चीख कर गवाही देते हैं -
अपने प्रति बरते गए
आपराधिक अनदेखेपन का

जो पुरजोर तरीके से
धिक्कारते हैं
अपने सत्तालोलुप प्रशासकों के
अदूरदर्शी ठिगनेपन को।

सभ्यताओं के खत्म होने की वजहें
तलाश रहे पुरातात्विक
अनुमान लगाते रहे
बाढ़-सूखा-अकाल और आक्रमणों को लेकर;
मगर वे अछूते रहे
महामारियों की आशंकाओं से!
कोई भी साम्राज्य
ऐसी मौतों का ब्यौरा नहीं देना चाहता
जो उसकी शान में बढ़ोतरी ना करती हों
या जो आँकड़े
उसे अपनी सफेदपोशी में
एक गुस्ताख़ी भर लगते हों।

आदमी की मौत को
इतनी अहमियत भी ना दिया जाना
कि उसे हादसे के पीड़ितों में कर लिया जाए शामिल;
सत्ताओं द्वारा किया जाने वाला
क्रूरतम अपराध है।
.
.
...काश, किसी दस्तावेज ने
दर्ज किया होता
शासकीय दम्भों का छिछलापन!
काश कि हम ना हुए होते इतने दृष्टिहीन..
अपनी स्वार्थपूर्ण लिप्साओं की प्रतिस्पर्धा में!
...काश कि हमारी वैज्ञानिक गवेषणाएँ
संहारक-युद्धक-क्षमताओं में बढ़ोतरी के बरक्स
प्रेरित होतीं
रक्षात्मक-जीवन-प्रणालियों में अभिवृद्धि की आकांक्षा से!
काश कि हमने
साम्राज्यों को जीतने से पूर्व
जीत लिए होते
अपने-अपने उन्मादों की भावभूमि!
...काश, उन्हें बचा लिया गया होता,
जिन्हें बचाया जा सकता था।
काश!

अंकित कुमार भगत

युवा कवि। स्नातक तृतीय वर्ष (हिंदी साहित्य) के छात्र। पोषम पा, हिंदीनामा के अलावा कई साझा संकलनों में भी रचनाएं प्रकाशित। साहिबगंज, झारखंड में निवास।