चीखें
उपर जहाँ पहुँच नहीं पाती हवा
वहीं चींखें लटकती हैं
चमगादड़ की तरह
पुरानी चींखें पक कर
सूखे फल की तरह टूट कर गिर पड़ेंगी आसमान में
पिछले साल की चीखों का फड़फड़ाना
स्वभाव के अंतिम इम्तिहान पर है
नई चींखें
नन्हीं और मासूम चीखों की आँख में नाख़ून अटका कर लटकती हैं
ताज़ा चींखें
जो अभी-अभी आई हैं
लटकने लगती हैं पुरानी चींखों के बदन पर
अंदर दब चूकी चींखों की पेट में
क्या बच्चे रोते होंगे?
उनका ध्वनि कहाँ तक पहुँचता होगा?
मैं चींखों को देकर ज़मीन
पेश करना चाहता हूँ सबके सामने
मैं नहीं करना चाहता इंतज़ार
उस अज्ञात टहनी के सूख जाने का जहाँ लटकी हैं चींखें
क्या आप मुझे सुन रहे हो?
क्या कोई है वहाँ?
मुझे सुन रहा है कोई?
कोई बोलता क्यों नहीं?
मेरी चीख़ से एक और चीख़ का ढक जाना छिन लेता है आवाज़ मेरी।
हत्या को हत्या कहना सीखो
तुमने पेड़ की हत्या होते देखा है?
नहीं ना?
सुना होगा ऊपर लिखा वाक्य किसी से
या अब पढ रहे होगे
किसी पेड़ की मृतदेह की छाँव में बैठकर ऑक्सीजन के अनाथ होने पर रोए हो कभी?
प्रियजन की मृत्यु होने पर पेड़ों के परिवार को जलाने की विधि को कहते हो तुम प्रियजन की चिता!
तुम्हें पेड़ की हत्या कभी दिखाई नहीं देगी
क्योंकि तुम्हें पेड़ का 'कट जाना' सिखाया गया है
आपको आपके साँसों की कसम है
आज से हत्या को हत्या कहना सीखो!
नरेश सुमित्रा सुभाष
युवा रचनाकार



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