ये भी लगभग बंद गली का आख़िरी मकान सा है, हालांकी यह मकान जिसे हम घर कहते हैं, एक बड़े अपार्टमेंट का सड़क की ओर खुलने वाला एक फ्लैट है। लगभग बंद गली इसलिए भी कि एक छोटी-सी पगडंडी है जो कि मुख्य सड़क तक जाकर अपने आपको सड़क मान लेती है। फ्लैट के बाजू से एक गलियारा पीछे और ऊपर बने फ्लेटों की तरफ जाता है, कोई भी राहगीर भटक कर रास्ता भूलता है या कोई अपार्टमेंट के लोगों के बारे में पूछता है तो इसी घर पर दस्तक देता है। कभी-कभी तो बिना पूछे ही हमारा ज़वाब होता है कि पीछे होगा। पीछे होगा, किसी भी जानकारी के लिए एक दम सटीक होता है, क्योंकि आगे कुछ है ही नहीं। कुछ नहीं है मतलब ऐसा भी नहीं कि कुछ नहीं। किसी और कॉलोनी की चारदीवारी है, उस दीवार के पीछे चम्पा का एक बहुत बड़ा पेड़ है सुबह दरवाजा खोलते ही चम्पा के सैंकड़ों फूल अपनी डालियों के सहारे झुकते हुए आदाब करते हुए दीखते है, चिडियों की चहचहाट है, कबूतर दीवार पर आकर मंडराते रहते है फिर अपने दड़बों में जाकर गुटुर गूं करते रहते हैं, बिजली के खम्बों के तारों से भी इन दोनों कॉलोनी के बीच का जुड़ाव देखने को मिल जाता है।
घर के आंगन में भोपाल बर्डस् संस्था द्वारा दिया गया नेस्ट बॉक्स लगा है, जिस पर लिखा है आइए गौरेया मित्र बनें। नीचे एक कटोरे में परमल के दानें हमेंशा भरे रहते हैं और पानी का सकोरा तो सालों से रखा है। यानी गौरेया के लिए दाना, पानी और रहने की सुविधा है। लाक डाउन में हम भी इन फ्लैटनुमा दड़बों में सुरक्षित रहने की कोशिश में तमाम दैनिक क्रियाओं में लगे रहते हैं। घर के लोगों के अलावा सीधी दूसरी आवाज़ें सुनना कितना मुश्किल हो गया है, अपनों से केवल फोन पर ही बात हो पाती है। ख़ैर खबर मिल जाती है लेकिन मिलने का जो सुख होता है, वो इन दिनों नसीब में ही नहीं है। सड़क से घर लगा होने से कोई भी आवाज आती है तो अच्छा लगता है चाहे वो चिडियों और अन्य पक्षियों की चहचहाट हो, गली के कुत्तों का भौंकना हो, बाहर आकर देखना सुखद होता है, गली के कोने पगडंडी के मुड़ते ही कचरे का ढेर होता है इस ढेर पर चारदीवारी में बने हुए छेद से कुछ सूअर आकर खाने की तलाश करते दीख जाते हैं, खाना न मिलने के कारण कितने सूखे हुए दिखते हैं। जैसे शहर की गाएं और इन दिनों कुछ लोग भी जो पास की ही बस्ती में ओटले पर खाली बैठे दिख जाते हैं। इसी ढेर में काम की चीज़ें तलाशती हुई गले में एक पास लटकाए एक बूढ़ी अम्मा अक्सर दीख जाती हैं। नगर निगम की गाड़ी में लगे स्पीकर से सुरक्षा उपायों के उद्बोधन के बाद, गाड़ी में चल रहे सफाई कर्मियों को सुरक्षित देखने की भी उत्सुकता होती है।
क्योंकि गली में कुछ ही मकान है, इसलिए आमतौर पर कोई फेरीवाला नही आता, लेकिन लॉकडाउन के चलते काम धंधा नहीं होने के कारण बहुत सारे लोगों ने सब्जी बेचना शुरू किया है, तो अब इस गली में सब्जी वाले आने लगे हैं। सब्जी खरीदने घर से निकलते इक्का-दुक्का लोगों से सलाम दुआ हो जाती है तो अच्छा लगता है कि अपने आसपास सब ठीक है। मास्क लगाए गमछा टांगे एक सब्जी वाला लड़का अच्छी सब्जी लाता है, दाम भी ठीक होते हैं तो हमलोग उससे ही सब्जी लेना पंसद करते हैं। इन दिनों हरा धनिया इतना महंगा होने के बावजूद भी वह धनिये के पैसे नहीं लेता, सब्जी हाट में तो दस रूपए का धनिया मांगने पर भी दुकानदार गुस्सा हो जाता था। एक बार खुल्ले अस्सी रूपए नहीं होने के कारण उससे उधारी कर ली, उसने भी मुस्कुराते हुए कहा कि लॉकडाउन में कहां भागोगे बाबूजी, ले लेंगे आप चिंता ना करें। फिर उसके बाद ना जाने क्या हुआ, चार पांच दिन तक वह आया ही नहीं इस तरफ। थोड़ी चिंता होने लगी कि इस मुश्किल दौर में अस्सी रूपए बड़ी बात होती है, नहीं होने पर कितनी मुश्किल हो रही होगी उसे। आज आया तो देखकर बहुत अच्छा लगा कि चलो सब ठीक ही है, पास आने पर उसको डांट लगाई कि इतने दिनों से क्यों नहीं आ रहे थे, हमको अच्छी सब्जी मिली ही नहीं और क्यों तुमको पैसे नहीं लेने थे क्या। कुछ और सब्जियां लेते हुए उसकी पुरानी उधारी भी चुकता कर दी। दिल का भी अच्छा लगने के कारण बातचीत कुछ ज्यादा ही करने लगा, वैसे भी कितने दिनों से लोगों से बातचीत आमने-सामने कहां हो पा रही थी। अतिउत्साह में उससे उसका नाम पूछा। उसने मेरी तरफ देखा, फिर अपने गमझे से पसीना पोछते हुए तराजू में चिपके एल्युमिनियम के एक छोटे से टुकडे पर हरे पेंटे से अरबी में लिखे तीन अंकों को छुपाते हुए बुदबुदाया – मोहसिन। फिर वह आगे चल दिया। गाड़ियों की पार्किंग में पंडित जी की कार के रियर व्यू शीशे और कांच के बीच में बनी जगह पर गौरेया ने अपना घोंसला बना लिया था, थोड़ी आहट होती तो फुर्र करके उड़ जाती। पंडित जी को इन दिनों बहुत आराम है, मंदिर में और अन्य जजमानों के घर नियमित हवन करते-करते उनको अस्थमा हो गया था, अब घर से उनके खांसने की आवाज भी नहीं आती, पहले कहा करते थे कि बिना हवन किए कैसे काम चल सकता है, इसके अलावा कुछ और आता भी तो नहीं था। पंडित जी की कार की नम्बर प्लेट पर गेरुवा रंग से 214 लिखा था। दो सौ चौदह कुछ इस स्टाईल में लिखा था कि वह राम भी पढ़ने में आ जाता है। इन दिनों मन कहां से कहां चला जाता है, मोहसिन के तराजू और पंडित जी की गाड़ी के दो नम्बर जोड़ने पर मुझे एक हजार की एक पूर्ण संख्या मिलती है। इस पूर्णता को मन के तराजू पर तौल रहा हूं।
रमजान शुरू होने के पांचवें दिन ही मोहसिन आया था, उसके बाद वह कभी नहीं दिखा। कल रात की आंधी में कोने में टंगा नेस्ट बॉक्स बुरी तरह से हिल गया था, फिर से मजबूती से बांध रहा हूं। शायद इसलिए शायद गौरेया उसके अंदर नहीं जा पा रही होगी। और देखो चम्पा की डालियां झुकी ज़रूर है पर लगता है शर्म के मारे झुकी होंगी। कबूतर का जोड़ा अपने दड़बे में गुटर-गूं करते हुए, जाने क्या बयां कर रहा होगा। और मैं अपने दड़बे में बिना पंखों के फडफड़ा रहा हूं। पगडंडी मोड़ से आगे जाकर बड़ी सड़क से मिलकर अपना वजूद तलाश रही है।
मनोज निगम
करियर के शुरूआती दौर में तीन साल मध्य प्रदेश विधान भवन के निर्माण में असिसटेंट इंजीनियर, फिर एकलव्य फाउंडेशन में लगभग 28 सालों से प्रकाशनों के प्रचार-प्रसार के साथ विभिन्न भूमिकाओं में। वर्तमान में संस्था के कार्यपालक अधिकारी। जनसत्ता, देशबंधु, सुबह-सवेरे, चकमक, नया ज्ञानोदय, स्रोत, सांझी-बात आदि पत्र-पत्रिकाओं में पर्यावरण, शिक्षा एवं सामाजिक सरोकारों पर लेखन। हाल ही में सोनी किड्स म्यूजिक द्वारा बच्चों की एक कहानी एनीमेशन के फॉर्म में प्रकाशित।



2 टिप्पणियाँ
मनोज भाई कहानी बहुत अच्छी थी हम सभी लोग एक तरह से नजरबंद ही हम चाह कर भी वह नहीं कर पाते जो हम सोचते हैं
जवाब देंहटाएंबेहद शुक्रिया, दोस्त। आपका नाम यहां पर नही दिख रहा हैं।
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