सावन-भादो धान रोपने के मौसम को कहते हैं. लेकिन धान बिन पानी के कैसे रोपा जाएगा, सो मेढ़क मेघ से रिमझिम बरसने का प्रार्थना कर रहा है. सच जो हो लेकिन अब सावन-भादो आ गया है और बारिश गिरने लगी है तो गांव-घर का नजारा बड़ी तेजी से बदलने लगा है. यह एक ऐसा मौसम होता है यहां जिसमें आकर जीवन कीचड़ में लथपथ हो जाता है. फिर भी चेहरे पर खुशी और ओठों पर हंसी पसरी रहती हैं.
लेकिन अभी कोई यह भी कह रहा था कि यह भारी परेशानी का सीजन आ गया है. अब कभी भी मेघ धमक पड़ेंगे और कपड़े भींग जाएंगे. कुछ इसी तरह की बातें मैंने धूप के बारे में भी सुन रखी थी. निश्चय ही ये वही लोग होंगे जो पसीने के डर से धूप को कोसते होंगे. उन्हें इसका जरा भी भान नहीं होता होगा कि इसी धूप के कारण खेतों में दाल बन रही होगी और जूट को एक लंबाई मिल रही होगी. उन्हें बिलकुल भी पता नहीं होगा कि धूप वृक्षों पर आम पका रही होगी. ये रासायनिक प्रक्रिया से पकाये गए आम के स्वाद चखे लोग होंगे.
बारिश के दिनों में पानी की बूंदों से परेशान हो जानेवाले लोगों को जाट-जाटिन के बारे में कुछ पता होगा? शायद नहीं. वे अपने उन पूर्वजों के बारे में भूल चुके होंगे जिन्हें पंप-सेट की सुविधा नहीं मिली थी और जीवन-जीविका के नाम पर खेती ही जिनके पास एकमात्र सहारा था. वे यह भी भूल गए होंगे कि तब की खेती मानसून पर आधारित होती थी. बारिश अच्छी होती थी तो वारे-न्यारे हो जाया करते थे. नहीं होती थी या कम होती थी तो इसका असर साल भर के जीवन-जीविका पर पड़ जाता था.
जब मानसून के भरोसे धान की खेती होती थी और मानसून कमजोर निकलता था, हमारे पूर्वज इसे इंद्रदेव का कोप समझते थे. हमारे पूर्वज अशिक्षित थे. लगभग सारी चीजों को देवताओं की राजी-खुशी से जोड़कर देखते थे. क्या करते. उनके पास सुविधाओं का टोटा हुआ करता था. गांव पहुंचने से पहले ही सारी सुविधाएं खत्म हो जाया करती थीं. तब दुआ में हाथ उठाने के सिवा उन्हें कुछ न सूझता था.
जब सावन बीतने लगता था और बादल का कोई टुकड़ा कहीं नजर नहीं आता था, तब कहते हैं कि हहाकार मच जाता था. उपजेगा नहीं तो लोग साल भर क्या खाकर जिंदा रहेंगे. तब गांव की कुंवारी लड़कियां एक टोटका करती थीं. वे पूर्णिमा की किसी रात को सूखे खेतों में रंभा, मेनका आदि अप्सरा बनकर नाचती थीं. गाती थीं. कहते हैं कि यह इंद्रदेव को रिझाने के लिए होता था. इस संदर्भ में यह भी कहा जाता है कि तब खूब झमाझम बारिश होने लगती थी. किसान पानी में भींगते हुए खेत जोतते थे और औरतें गाती हुईं धान रोपती थीं. उनकी देह पर बारिश की बूंदें फूलों की तरह गिरती थीं और मन प्रफुल्लित होता रहता था.
हमें यह याद रखना होगा कि वे दिन अभी पूरी तरह से गए नहीं हैं. आज भी यहां की खेती मानसून आधारित है. न तो सारे गांव में नहर की सुविधा है और न ही बिजली की अच्छी व्यवस्था. डीजल के भरोसे धान की खेती करना इतना महंगा साबित होता है कि छोटे किसानों के लिए मुसीबत खड़ी हो जाती है. आज भी बादलों की ओर हम देखते रहते हैं और बारिश के आसार नजर आते ही खेतों की और दौड़ पड़ते हैं.
हां, यह सच है कि अधिकांश शहरों की नालियों की व्यवस्था इतनी दयनीय है कि थोड़ी सी बारिश होते ही स्थिति नारकीय हो जाती है. उपर से गंदगी का ढेर. बारिश आते ही कचरे तैरने लगते हैं और स्थिति बदतर हो जाती है. लेकिन हमें याद रखना होगा कि ठीक इसी समय में अधिकतर गांव की कच्ची सड़कें और पगडंडियां कीचड़-कीचड़ हो जाती हैं. लेकिन कीचड़ में सने लोग वहां सिर्फ नए अन्न के सृजन के बारे में सोचते हैं.
तस्वीर : गूगल
● बिचड़े देखकर प्रकृति को बारिश की याद आती है
कक्का कह रहे थे कि धान के बिचड़े को देखकर ही मौसम को यह याद आता होगा कि अब बारिश की बारी आ गई है. मुझे अपनी ओर हैरत से देखते पाकर वे मुस्कुराने लगे. कहने लगे कि पानी देखकर धान के खेत प्रसन्न हो जाते हैं. आसमान में बदल के काले-काले टुकड़े को तैरते देखकर खेतों में लहरा रही धान की फसल जैसे खिलखिलाने लगती हैं.
पुरबाई बह रही थी और आसमान में बदल मंडरा रहे थे. बारिश अभी शुरू नहीं हुई थी. लेकिन वह भूमिका बांधकर तैयार खड़ी थी और कभी भी मूसलाधार रूप में शुरू हो सकती थी. पीपल के नीचे मचान पर बैठे हमारे बाल हवा में उड़ रहे थे. दृश्य इतना सुहाना बन रहा रहा था कि कक्का आह्लादित हो रहे थे. कहने लगे कि मौसम यह भूल जाता है कि कब उसको बदल जाना चाहिए. वह अपनी रौ में रहता है. बदलने के लिए उसको टोकना पड़ता है. कौन टोक सकता है उसको? कहो तो!कक्का की यही आदत है. कोई बात उठाते हैं और बीच में एक सवाल दाग देते हैं. जवाब सोचो, उससे पहले खुद ही जवाब देने लगते हैं. मुझे पता था, दो मिनट के बाद वे खुद ही जवाब दे देंगे. जो जवाब देंगे, उसी की पूंछ पकड़ कर अपनी बात को पूरी करेंगे. मैं यह सब सोच ही रहा था कि वे कहने लगे कि खेतों में बोए जा रहे बीज मौसम को आवाज लगाता है और उसको यह याद दिलाता है कि अब उसको अपना रंग बदल लेना चाहिए.
बारिश शुरू हो गई. हम उठकर थान के बरामदे पर आ गए और पालथी मारकर बैठ गए. कुछ देर बूंदा-बांदी होने के बाद बारिश ने रफ्तार पकड़ ली. हवा भी तेज बहने लगी. कक्का बोले, बारिश का यह मूसलाधार वाला रूप है. फिर बताने लगे कि बारिश के भी कई रूप होते हैं. इनके हरेक रूप का एक नाम होता है. जैसे झटकी, झींसी, फिसफिसी, सतहैया, मूसलाधार आदि. इन नामों का उच्चारण आषाढ़ चढ़ते ही लोगों की जुबान पर भी चढ़ आता है. उन्होंने मुस्कुराते हुए यह कहा कि इनमें भी यथा नाम तथा गुण वाली बात होती है.
कक्का सही कह रहे थे. इधर बारिश का झटकी और झींसी वाला नाम काफी प्रसिद्ध है. बोलने और सुनने में भी प्यारे लगते हैं. इसमें लोग दौड़कर कुछ काम भी कर लिया करते हैं. सूजी के दाने के बराबर बूंदों में यह हौले-हौले बरसती रहती है. लेकिन लंबी चलती है. कक्का बता रहे थे कि सतहैया अब कम आती है. लेकिन जब आती है, सात दिन तक टिकी रहती है. तब लोग घरों में बंद हो जाते हैं और जब कभी सड़क तक आकर सामने देखते हैं, दूर-दूर तक सिर्फ पानी ही पानी नजर आता है. उन्हें फिर मूसलाधार की सुधि आ गई थी. बोले, बारिश का 'मूसलाधार' रूप अपने नाम के अनुरूप ही वजनदार होता है. इसमें भारी परेशानी हो जाती है. सारे कार्य स्थगित हो जाते हैं. तब बिजली बहुत कड़कती है. हवा भी तेज बहने लगती है और मोटी-मोटी बूंदे दे दनादन गिरती रहती हैं. कच्चे घर तो मूसलाधार में हाथ तक खड़े कर देते हैं और चूने लग जाते हैं. मूसलाधार से कक्का को कच्चे घरों की याद आ गई थी. बोले, कई बार मूसलाधार बारिश होती रहती है और लोग उसी समय छप्पर ठीक करने चढ़ जाते हैं. बाद में यह देखने के बाद कि छप्पर ने चूना बंद कर दिया है, गुनगुनाते हुए इसी बारिश में स्नान भी करने लग जाते हैं.
मनुष्यों की जीवटता को सारे मौसम देखने आते हैं! यह कहते हुए कक्का मुस्कुराए तो मैं भी मुस्कुराने लगा.
● कीचड़ भात का आधार बनता है
परसों जब मूसलाधार बारिश हो रही थी, कक्का कहने लगे कि आषाढ़ आते न आते खेत कीचड़ होने के लिए व्याकुल होने लगता है. उनकी बातें सुनते हुए अक्सर मेरी आंखें हैरत से फैल जाती हैं. जब उन्होंने यह कहा कि खेत का कीचड़ हो जाने की अभिलाषा खुद के लिए न होकर दूसरे के हित के लिए होता है तो मैं उनकी ओर मुंह करके बैठ गया. कक्का कह रहे थे कि कीचड़ में ही धान फलते हैं! वे वहीं पलते हैं. उनका कहना था कि आषाढ़ से सावन-भादो तक खेत बारिश के पानी को सोखते हुए अपनी मिट्टी को कीचड़-कीचड़ करता रहता है. जिसमें झूम-झूम के लोग धान के विरवे रोपते हैं. आती सर्दी में उन्हीं विरवों में धान की शीश हवा के झोंकों के संग झूमती हैं और छन-छन करके गाती हैं. कक्का बता रहे थे कि दशहरा-दीवाली में खुशियां वैसे ही चौगुनी नहीं रहती. अन्न से बखार भर जाने की प्रसन्नता भी उसमें मिली होती हैं!
कक्का सही कह रहे थे. कीचड़ की भी अपनी एक अलग ही महिमा है. कमल के दुर्लभ और बड़े-बड़े फूल तो सदैव उसी में खिला करते हैं. लेकिन धान के रूप में भात का भी इसी कीचड़ से चोली और दामन का साथ है. कमल का क्या है, वह तो पोखर-तालाब और झील में जहां स्थाई रूप से पानी और पानी के नीचे कीचड़ रहता है, अपना ठिकाना बना लेता है. लेकिन सावन-भादो का महीना आते ही धान के लिए एक बड़े भूभाग को मनुष्यों की एक बड़ी आबादी कीचड़ बनाने के लिए प्रयासरत हो उठते हैं. कक्का यह बात बहुत ठीक कह रहे थे कि अकारण ही प्रकृति इन महीनों में धरती को नम कर देने के लिए बादलों की मदद नहीं लेती है-जेठ के बाद खेत और खेतों के सृजनहार, दोनों के हृदय की पुकार से वे इतने द्रवित हो जाती हैं कि अपने आपको काले-काले बादलों के रूप में परिवर्तित कर यत्र-तत्र बरसने लगती हैं. उनकी इस सहृदयता पर जहां खेत नम होकर खिलने लगते हैं वहीं उसमें धान के विरवे रोपते सृजनहार के कंठ से खुशी के गीत फूट पड़ते हैं.
बिना धरती का कीचड़ बने धान की फसल को उपजना संभव है क्या. नहीं. कक्का का कहना था कि कभी-कभी जब प्रकृति मनुष्यों की मदद करने में असक्षम हो जाती है और समय गुजरता जा रहा होता है, मनुष्य अपने बाहुबल और बुद्धिबल का सहारा लिए खेतों में उतर पड़ता है. तब धरती के अंदर का पानी इनका साथ देता है और वह बाहर आकर खेत की मिट्टी पर बिछ जाता है. हालांकि तब धरती उतना कीचड़ नहीं हो पाती. लेकिन धान के विरवे को रोपने लायक जमीन तैयार करने में मदद तो मिल ही जाती है. तभी अगर मनुष्यों की इस जीवटता से प्रसन्न होकर बादल के कुछ टुकड़े भी पिघल जाते हैं तो सोने पर सुहागा हो जाता है. धान के विरवे की हरियाली को और हरा होता देख लाखों आंखों की रौशनी और चेहरे की चमक में बेतहाशा वृद्धि हो जाती है.
कक्का कह रहे थे कि सावन-भादो का महीना अन्न के लिए मनुष्यों का उद्यम करने का महीना होता है. उनका कहना था कि बारिश के महीने में दृश्यों में कीचड़ पसरता देख, कृषकों के चेहरे पर घृणा का भाव नहीं लाता. वे हर्षित होते हैं और उनकी बांछें खिलती रहती हैं. वे कह रहे थे कि यह वो कीचड़ होता है जिसे चेहरे पर पोतने के काम में नहीं लाया जाता, इनका उपयोग भूख मिटाने के लिए अन्न को उपजने के काम मे किया जाता है.
● बूंदें हरियाली का सौगात लाती हैं
उस दिन जब मूसलाधार बारिश हो रही थी, आसमान से गिरती बूंदों की ओर देखते हुए कक्का हठात मुस्कुराने लगे थे. कहने लगे कि देखना, अब धीरे-धीरे रंग कितना गाढ़ा हरा हो जाएगा. बोले, जेठ की तीखी धूप को विदा करने यह मौसम आया है. देखो तो, पेड़-पौधे खुशी से झूमने लगे हैं. ऐसा लगता है कि बड़े इंतज़ार के बाद इन्हें ये दिन नसीब हुए हैं. सावन-भादो की लगातार बारिश के बाद पेड़-पौधे विशाल और पूरे हरे हो जाएंगे.
कक्का सही कह कह रहे थे. पेड़-पौधे पर नजर डालिए तो लगेगा कि इनमें कुछ खास परिवर्तन बड़ी तेजी से हो रहे हैं. इनका रंग गाढ़ा हो गया है और तने व टहनियां विकसित होकर विशाल हो रहे हैं. सड़क किनारे के अरिकंचन के पौधे पर नजर डालता हूं तो लगता है कि जब से बारिश का मौसम आया है, इसकी झाड़ी निरंतर फैलती ही जा रही हैं. वैजयंती की छटा तो देखिए. जेठ में कितनी मायूस लगती थी. खासकर उस समय जब तीन-चार दिनों के लिए देह जलानेवाली धूप उतरी थी, देखने से वे हतास नजर आती थीं. लेकिन अब नज़ारा एकदम से बदल गया है. इसके बड़े-बड़े और लंबे-लंबे पत्ते इतने हरे हो गए हैं कि खिलखिलाती हुई जान पड़ती हैं.
कक्का कह रहे थे कि सड़क के दोनों तरफ रोपे कदम के पेड़ों के रंग-ढंग बदलने लगे हैं. उनकी टहनियां ऐसे बढ़ रही हैं और उनमें पत्तों का इजाफा इस तरह से हो रहा है कि लगता है जैसे बारिश की हरेक बूंद से इन्हें जीवनदायिनी-शक्ति मिल रही हैं. वे कह रहे थे कि हम मनुष्य हैं, हमें प्यास लगती है तो हम पानी लेकर पी लेते हैं. हमारी देह को गर्मी लगती है तो हम देर तक स्नान करते हैं. लेकिन पेड़-पौधे के पास ऐसी सुविधा नहीं है. उनके पास मजबूरी है कि वे अपनी जगह से हिल भी नहीं सकते. कक्का ने यह भी कहा कि ऊपर से पानी का स्तर निरंतर नीचे जा रहा है. पानी के लिए जड़ें निश्चित ही बड़ी मशक्कत करती होंगी, लेकिन वे इसमें कितनी सफल होती होंगी, यह कहना बड़ा मुश्किल है. बैशाख-जेठ के महीने में वृक्षों का मलिन मुंह देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन्हें उतना पानी नहीं मिलता होगा, जितने की इन्हें जरूरत रहती होगी.
कक्का को यह पता है कि जल का स्तर लगातार नीचे सरक रहा है और हम इस पर कोई खास तवज्जो नहीं दे रहे हैं. वे कह रहे थे कि अब इस सावन-भादो से इन पेड़-पौधों की बड़ी उम्मीद बंध गई है. रौ में आकर उन्होंने यहां तक कह दिया कि सब कुछ ऐसा ही चलता रहा और हम जल्दी ही न चेते तो वृक्षों की तरह बारिश के मौसम का हमें भी बेसब्री से इंतजार रहेगा. न सिर्फ खेती के लिए बल्कि पीने के पानी के लिए भी.
कक्का जो कह रहे थे, उसे सुनकर मुझे डर लगने लगा. पेड़-पौधे के कारण इस धरती का रंग जो हरा है, पानी की कमी के कारण इसका रंग कैसा हो जाएगा. जब ऐसा सोचते हुए मैं सिहरने लगा तो मजबूरन मुझे इस ओर से ध्यान हटाकर अपने मन को खेतों की मेड़ पर लगे महोगनी, सागवान, शीशम और आम के उन वृक्षों की तरफ ले जाना पड़ा जो बारिश में हरा-हरा होकर ऐसे झूम रहे थे जैसे इन्हें नया जीवन मिल रहा हो!
मिथिलेश कुमार राय
कविता संकलन 'ओस पसीना बारिश फूल' तथा 'धूप के लिए शुक्रिया का गीत तथा अन्य कविताएं ' प्रकाशित। कहानी 'स्वरटोन' पर 'द इंडियन पोस्ट ग्रेजुएट' नाम से फीचर फिल्म का निर्माण। ग्रामीण समाज व पर्यावरण पर अखबार में स्तंभ लेखन। एक आंचलिक उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य। पत्रकारिता के बाद फिलवक्त ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापन।
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