एक दुर्निवार इच्छा है

या एक पाग़ल-सा संकल्प

कि हमें तुम्हारा नाम लेना है एक बार

किसी शहर की व्यस्ततम सड़क के बीचो-बीच खड़ा होकर

एक नारे, एक विचार, एक चुनौती

या एक स्वगत-कथन की तरह,

जैसे कि पहली बार,

और अपने को एकदम नया महसूस करते हुए ।


नहीं,

यह कोई क़र्ज़ उतारना नहीं,

देश की छाती से कोई बोझ हटाना भी नहीं

विस्मृति की ग्लानि का,

(वह यूँ कि जब स्मृति थी

तब भी कितना था परिचय वास्तव में ?)

यह तो महज़

अन्धेरे में रख दिए गए एक दर्पण के बारे में

कुछ बातचीत करनी है अपने-आप से।


सोचना है कि अन्धेरे तक

किस तरह ले जाया गया था वह दर्पण

और किस तरह अन्धेरा लाया जा रहा है आज

हर उस जगह

जहाँ कोई दर्पण है।


जहाँ भी परावर्तन की सम्भावना,

किरणों का प्रवेश वर्जित है

और कहीं आग लग रही है

कहीं गोली चल रही है ।[1]


हमें तुम्हारा नाम लेना है

उठ खड़े होने की तरह,

देश को धकापेल बनाने या

वाशिंगटन डी०सी० का कूड़ाघर बनाने की

बर्बर-असभ्य या

कला-कोविद कोशिशों के विरुद्ध ।


नहीं, यह कोई भाव-विह्वल श्रद्धाँजलि नहीं,

यह नीले पानी वाली उस गहरी झील तक

फिर एक यात्रा है

उग आए झाड़-झँखाड़ों के बीच

खो गया रास्ता खोजने की कोशिश करते हुए,

या शायद, कोई भी राह बनाकर वहाँ तक पहुँचने की जद्दोजहद-भर है,

या शायद ऐसा कुछ

जैसे हम किसी विचार के छूटे हुए सिरे को

पकड़ते हैं

आगे खींचने के लिए ।


हमें तुम्हारा नाम लेना है

इसलिए कि तुम्हारे नामलेवा नहीं ।

संसद के खंभे भी तुम्हारा नाम लेते हैं

बिना किसी उच्चारण दोष के

और वातानुकूलित सभागारों में

तुम्हारी तस्वीरें हैं और फूल-मालाएँ हैं

और धूपबत्तियों का ख़ुशबूदार धुआँ है ।


एक ख्यातिलब्ध राजनयिक कहता है

कि तुम प्रयोग कर रहे थे क्राँति के साथ

और बाज़ार सुनता है

और रक्त-सने हत्यारे हाथों से

विमोचित हो रही है

तुम्हारी शौर्य-गाथा पर आधारित नई बिकाऊ किताब

और एक बूढ़ा विलासी पियक्कड़-पत्रकार

अपने अख़बारी कालम में तुम्हें याद करता हुआ

अपने पूर्वजों के पाप धो रहा है ।


हमें तुम्हारा नाम लेना है

कि वे लोग ख़ूब ले रहे हैं तुम्हारा नाम

जिन्हें ख़तरा है

लोगों तक पहुँचने से तुम्हारा नाम

सही अर्थों में ।


इसलिए सुनिश्चित ऐतिहासिक अर्थों का

सन्धान करते हुए

हमें फिर थकी हुई नींद में डूबे

घरों तक जाना है लेकर तुम्हारा नाम ।


कई बार हमें विचारों को कोई नाम देना होता है

या कोई संकेत-चिह्न

और हम माँगते हैं इतिहास से ऐसा ही कोई नाम

और उसे लोगों तक

विचार के रूप में लेकर जाते हैं ।


हमें तुम्हारा नाम लेना है

एक बार फिर

गुमनाम मंसूबों की शिनाख्त करते हुए

कुछ गुमशुदा साहसिक योजनाओं के पते ढूँढ़ते हुए

जहाँ रोटियों पर माँओं के दूध से अदृश्य अक्षरों में लिखे

पत्र भेजे जाने वाले हैं, खेतों-कारख़ानों में दिहाड़ी पर

खटने वाले पच्चीस करोड़ मज़दूरों,

बीस करोड़ युवा बेकारों,

उजड़े बेघरों और आधे आसमान की ओर से ।


उन्हें एक दर्पण, नीले पानी की एक स्वच्छ झील,

एक आग लगा जंगल और धरती के बेचैन गर्भ से

उफ़नने को आतुर लावे की पुकार चाहिए।


गन्तव्य तक पहुँचकर

अदृश्य अक्षर चमक उठेंगे लाल टहकदार

और तय है कलोग एक बार फिर इंसानियत की रूह में

हरक़त पैदा करने के बारे में सोचने लगेंगे ।[2]


तुम्हारा नाम हमें लेना है

उस समय के विरुद्ध

जब सजीव चीज़ों में निष्प्राणता भरी जा रही है

एक उज्ज्वल सुनसान में

जहाँ रहते हैं शिल्पी और सर्जक बस्तियाँ बसाकर,

और कभी दिन थे, जब हालांकि अन्धेरा था,

पर अनगिन कारीगर हाथों ने

मिटटी, राख, रक्त, पानी, धूप और कामनाओं-संकल्पों से—

स्मृतियों-सपनों को गूँथकर गए थे लोग

विचारों ने बनाया था जिन्हें सजीव-गतिमान.

तुम्हारा नाम हमें लेना है

कि अधबने रास्ते कभी खोते नहीं,

हरदम कचोटते रहते हैं वे दिलों में

जागते रहते हैं

और पीढ़ियों तक धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा के बाद

वे फिर आगे चल पड़ते हैं

और जब भी

पहुँचते हैं अपनी चिर वांछित मंज़िल तक,

तो वहाँ से

एक नई राह आगे चलने लगती है ।


तुम्हारा नाम हमें लेना है

विस्तृत और आश्चर्यजनक सागर विश्वास करते हुए और

इतिहास का लंगर छिछले पानी में डालने की[3]

कोशिशों के ख़िलाफ़,

और विचारों के ख़िलाफ़ जारी

चौतरफ़ा युद्ध के खिलाफ़

और उम्मीद जैसे शब्दों को

संग्रहालयो में रख देने के ख़िलाफ़ ।


...या तो हमें कविता में लानी है यह बात

या फिर किसी भी तरह की काव्य-कला के

आग्रह के बिना ही कह देना है कि

यह सत्ता पलट देनी होगी

जो पूरी नहीं करती हमारी बुनियादी ज़रूरतें

और छीनती है हमारे बुनियादी अधिकार[4]

और विद्वज्जन हैं कि मुख्य सडकें छोड़कर

पिछवाड़े की गंदगी और कूड़े भरी गलियों से होकर

आ-जा रहे हैं

ढूँढ़ते हुए कविता का अर्थात

मेर्कूरी अव्देविच की तरह[5]

और तकिये में सोने की गिन्नियाँ छुपाए

तीर्थाटन पर निकलने को तैयार हैं भिक्षुवेश में

यदि समय कोई ऐसा वैसा आ-जाए तो ।


...बल्कि सबसे अच्छा तो यह होगा कि

बेहद ईमानदार निजी दुखों, प्यार, झाग, आदिम सरोकारों,

शब्दों, तरलत, मौन, चिंतन के अकेलेपन,

जनता के सुनसान, पुरस्कार-कामना-बोझिल मन,

सीढ़ियों, रस्सियों, नक़बजनी के औज़ारों और

निर्लिप्त ख़बरों से भरी

धूसर, चमकीली या साँवली-सलोनी निर्दोष-सी कविताओं के

पाठ के बाद, किसी शाम, जब अपनी पारी आए

तो बस दुहरा दिए जाएँ

तुम्हारे ये सीधे-सादे शब्द :

"इन्क़लाब ज़िन्दाबाद !"


- शशि प्रकाश