रिश्ते
जिन्हें धक्का मारना था
उन्हें अपनी तरफ
रहा खींचता
जो बने थे
खुल जाने के लिए
खींचने से
उन्हें धकेलता रहा
अपने से दूर
लोग दरवाज़े थे
और मैं
साइन बोर्ड पढ़ने में अक्षम
अनपढ़, अल्हड़।
अनुकंपा
मुझे मंद कहने वालों
ये चमकीले जूते उतारो
आओ फिर दौड़ते हैं
दोनो नंगे पाँव
तुम्हारे जूतों की कीलें
बिछाती आई हैं
काँटे हमारी राहों में
जब तुम्हारे शाही जूते
दौड़ जाते हैं मंद बयार
और मद्धम चाँदनी
चूमते हुए
तब हमें परोसा गया है
ख़ुश्क रास्ता
जहाँ हज़ार नक्कारखाने हैं
और लाख मक्कार साहूकार
जो करते हैं सौदा
हमारी स्वायत्तता का
दौड़कर लहुलूहान
हमारे नंगे पैर
देख रहे होते हैं
अंतहीन लक्ष्य
और हाथ में खिंची
भाग्य की लकीर
हो जाती है
दूसरे के हाथ में स्थानांतरित
इस बीच तुम
सूखे मेवे और ताज़ा फल
खाते रहे हो
‘अनुकंपा’ के जूते पहने हुए।
फटेहाल का खज़ाना
दुनिया के नामचीन फोटोग्राफर
भटकते हैं
भूखे-नंगे लोगों की बस्ती में
और उन अभावग्रस्त लोगो में से
एक चेहरा चुनते हैं
ऐसा चेहरा, जो निर्दिष्ट कर दे
सारी कहानी उस बस्ती की
उसके लोगों की
उसकी जैसी बहुत सी बस्तियों की
युद्ध शरणार्थी,
अकालग्रस्त, दंगा पीड़ित,
नंगे-भूखे बच्चे की दुहाई दे
कार के बाहर हाथ फैलाई औरत
ऐसे ही चंद दृश्य तलाशते हैं वे
उतारकर ले जाते हैं
किसी का जीवन
एक अदद कैमरे में
बदले में दे जाते हैं
एक दिन या
हद-से-हद एक हफ्ते की रोटी
उस फोटो से
कितने ही पुरस्कार
कितना सम्मान-धन
फोटोग्राफर पर बरसता है
पर उस चेहरे को उसका हिस्सा
देने नही जाता वह
कौन माथा-पच्ची करे और क्यों
फटेहाल चेहरे की कहानी नहीं बदलती
निर्दिष्ट बस्ती की कहानी दीगर बात है
भिखारी, दीन-हीन
अपने फटे चीथड़ों में
ख़ज़ाना समाए हैं
जो बेचने की तरकीब जानते हैं
उन्हें लूट ले जाते हैं,
बड़े सस्ते में।
भेड़
भेड़ों में नहीं होता
सही नेतृत्व चुनने का शऊर
और चुने हुए ग़लत नेतृत्व को
उखाड़ फेंकने का साहस
इतिहास बताता है
इंसानों में भी ये गुण
यदा-कदा ही देखे गए हैं
सर्वप्रथम,
शऊर और हिम्मत की ग्रंथियां टटोलकर
दुरूस्त करने के बाद
अनुशासन का पाठ
इंसान को
भेड़ों से सीखना चाहिए।
एक बूंद की कहानी
बर्फ
आसमान से गिरी
एक बड़े से पत्ते पर
और पिघल गयी
पत्ते ही पर
अपनी ही जैसी
पत्ते पर पहले गिरी बर्फ के
पिघलने से बने पानी में
घुलमिल
उसने आकार ले लिया एक बूंद का
और पत्ते की सपाट देह में
ढलान की गुंजाइश पाते ही
पत्ते से नीचे
लुढ़कने चली बूंद
अपनी देह का जितना वजन
सह सकती थी वह
उससे अधिक होते ही
टपक पड़ी धरती पर
टूटकर एक बड़ी-सी बूंद में
अब पत्ते पर बची रह गयी
बस नन्ही सी बूंद
जो गिर सकने जितनी वज़नी नहीं थी
फिर ऐसा हुआ
कि रूक गया हिमपात
पत्ते पर टिकी बूंद से
ना जुड़ पाया और पानी मिलकर
ना बढ़ पाया उसके अस्तित्व का दायरा
टपकते-टपकते रह गयी
वह नन्हीं बूंद
पत्ते के धरती की ओर समर्पित भाव में झुके
कोने पर
रात भर ठण्ड में
दृढ़ता से टिकी रही एक बूंद
गुरूत्वाकर्षण बल के विरूद्ध
धरती को तरसाते हुए
धरती रही
एक बूंद प्यासी।
- देवेश पथ सरिया
देवेश पथ सरिया
हिन्दी कवि और कथेतर गद्य लेखक। सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध।
साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, मधुमती, कादंबिनी, कथादेश, कथाक्रम, परिकथा, पाखी, आजकल, बनास जन, समयांतर, समावर्तन, जनपथ, नया पथ, कथा, आधारशिला, बया, उद्भावना, दोआबा, बहुमत, परिंदे, प्रगतिशील वसुधा, साखी, अकार, कविता बिहान, गाँव के लोग, ककसाड़, गगनांचल, अक्षर पर्व, निकट, मंतव्य, मुक्तांचल, रेतपथ, कृति ओर, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, उम्मीद, अनुगूँज, कला समय, पुष्पगंधा आदि ।
समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, प्रभात ख़बर, दि सन्डे पोस्ट।
वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, हिंदवी, कविता कोश, पोषम पा, हिन्दीनेस्ट, इंद्रधनुष, अनुनाद, बिजूका, पहली बार, समकालीन जनमत, मीमांसा, शब्दांकन, कारवां, साहित्यिकी, अथाई, हिन्दीनामा, लिटरेचर पॉइंट।
विशिष्ट: कविताओं का अनुवाद मैंड्रिन (यूनाइटेड डेली न्यूज़ अखबार) में प्रकाशित हो चुका है।



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