एकांत
(१)
कहाँ है एकांत
घर में ढूँढ़ता रहा
मित्रों से कहा
चलो, एकांत में चलते हैं
एकांत की खोज में
प्रेमिकाओं को ख़त लिखे गये
एकांत है जिसने मुझे
भीड़ का हिस्सा होने से बचाया
कविताओं के बीज एकांत में पड़े
एकांत ने ही बनाये रखी
आँखों में नमी
एकांत की छाया में
पल-पोसकर बड़ा हुआ
मेरे भीतर का मनुष्य।
(२)
कहीं बाहर
नहीं है एकांत
भीतर है
छिपा हुआ
प्रेम की तरह
एकांत की खोज
दरअसल प्रेम की खोज है।
(३)
जिसके साथ होने से
मेरा एकांत खंडित नहीं होता
वही मेरा मित्र है।
उसी दुनिया में
सच की हिफाज़त का काम
झूठे लोगों को सौंपा गया
ईमानदारी की शिक्षा देने के लिए
बेईमान भर्ती हुए
अहिंसा का प्रचार-प्रसार करना था
हिंसकों की टोली लगायी गयी
राहत-सामग्रियाँ बाँटने के समय
दलाल जोशोखरोश से काम पर भिड़े थे
प्रेम से भरे लोगों की आँखें नम थीं
करुणावान रो रहे थे
ईमानदार अज्ञातवास में चले गये
भाईचारे को जीने वाले आत्महत्या के बारे में सोच रहे थे
ताज्जुब की बात यह है
कि यह सब कुछ
किसी राजा-रानी या परीलोक की दंतकथाओं में नहीं
ठीक उसी दुनिया में घट रहा था
जो मेरे देखते-देखते
बड़ी तेजी से बदलती जा रही थी
और मैं मुँह बाये
भौंचक खड़ा था
निःशब्द।
बचा रहे मेरे भीतर का मनुष्य
बड़ा और चर्चित-पुरस्कृत कवि बन पाऊँ या नहीं
मुझे इस बात की चिंता नहीं
पत्रिकाएँ मेरी कविताएँ स्वीकृत करें या अस्वीकृत
इस बात से कभी चिंतित नहीं होता
प्रकाशक कविता-पुस्तकें प्रकाशित करें या न करें
यह बात मुझे चिंताकुल नहीं कर पाती
कविता-समारोहों में मुझे आमंत्रित किया जायेगा या नहीं
यह विषय भी मेरी चिंताओं में शामिल नहीं
मेरे भीतर का मनुष्य हर दिन विकसित होता रहे
प्रेम, करुणा, सद्भाव मुझमें निर्बाध फलते-फूलते रहें
छल-कपट, द्वेष-ईर्ष्या, मद-अहंकार मेरे भीतर घर न बना लें
ये बातें जरूर मुझे चिंता में घेरे रहती हैं
बड़ा और चर्चित-पुरस्कृत कवि बनकर क्या करूँगा
अगर मेरे भीतर का मनुष्य ही बचा न रह पाये।
डर
डरें वे जो झूठ को सच की तरह बोलते हैं
डरें वे जिन्हें मुखौटों से आशिक़ी है
जो सोचते हैं
सब कुछ जानते हैं हम
वे जरूर डरें
सूख गया है
जिनकी आँखों का पानी
वे भला क्यों न डरें
डराते हैं जो दूसरों को
वे ही हैं असल में डरे हुए लोग
फैलाते हैं जो डर का भ्रम
और गढ़ते हैं तिलिस्म डर का
अभिशप्त हैं वे
डर के स्याह साये में
जीने के लिए
घृणा कम
प्रेम की खाल ओढ़े घृणा
ज्यादा डराती है
हिंसा से ज्यादा
अहिंसा की चादर लपेटी हिंसा
रचती है डर का चक्रव्यूह
शत्रु क्या खाक डरायेंगे
मित्र का चोगा पहने शत्रु से
लगता है ज्यादा डर
वे क्यों डरें
जो बिछाते हैं प्रेम
प्रेम ही ओढ़ते हैं
घुला हुआ है प्रेम
जिनकी साँसों में
पराग बनकर
जिनकी नसों और शिराओं में
दौड़ रहा है प्रेम
लहू से एकरँग होकर
वे तो बिल्कुल न डरें
डर के खिलाफ़
एक प्रेम ही है
जो बन जाता है
सबसे बड़ा हथियार
घृणा के विरुद्ध
परचम लहराने के लिए।
बुद्ध को प्रेम करता हूँ
बुद्ध को प्रेम करता हूँ
बौद्ध नहीं हूँ
जीसस को प्रेम करता हूँ
ईसाई नहीं हूँ
महावीर के मुझ पर ऋण हैं
उन्होंने तपाया है मुझे
जैनियों से मेरा क्या लेना-देना
नानक मंत्रमुग्ध कर देते हैं
उन्होंने निखारा है मुझे
सिखों से मेरा क्या वास्ता
कृष्ण को प्रेम करने के लिए
क्या मेरा हिंदू होना जरूरी है?
क्या बगैर मुसलमान हुए
मैं मुहम्मद को मुहब्बत नहीं कर सकता?
धूप, हवा, पानी, धरती
और आसमान को प्रेम करने के लिए
मेरा किसी संप्रदाय की शरण में जाना
जरूरी तो नहीं
रँग, फूल, चिड़िया और दरख़्तों से
अपने इश्क़ का इज़हार करने के लिए
किसी मंदिर, मस्जिद, गिरजे और गुरद्वारे में
मुझे मत्था टेकना तो नहीं पड़ता
सिर्फ आदमी की दुनिया में
क्यों हैं प्रेम पर इतने सारे पहरे?
क्यों हैं इतनी सारी बंदिशें?
क्यों हो गया है प्रेम इतना मुश्किल?
सिर्फ आदमी की दुनिया में
आखिर क्यों है प्रेम में इतनी शर्तें?
आखिर क्यों हैं प्रेम में इतनी दीवारें?
जबकि
सारी शर्तें छोड़कर
और सारी दीवारें गिराकर
प्रेम करना सीखा है मैंने।
पाँच-छह बरसों से
पाँच-छह बरसों से
बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूँ
नाते-रिश्तेदारों को लगता है
मुझे अपनी जाति, अपने धर्म पर
तनिक भी स्वाभिमान नहीं
पड़ोसियों, सहकर्मियों को लगता है
गरीबों, पिछड़ों, दलितों, मुसलमानों का
कुछ ज्यादा हितैषी हो गया हूँ
भाइयों-बहनों को लगता है
रूढ़ियों, मान्यताओं, परंपराओं के विशेष मूल्य हैं
और इनके विरुद्ध खड़े होना
देश की युगों पुरानी सभ्यता, संस्कृति के
विरूद्ध हो जाना है
माँ-पिता को लगता है
आदमी को धरातल पर रहना चाहिए
और जबकि बहुसंख्य लोग इस हम्माम में नँगे हैं
सामूहिकता के साथ रहने में भला कैसी परेशानी
बेवज़ह नायक बनने की क्या जरूरत
पत्नी-बच्चों को लगता है
मैं अकेला हूँ, अल्पमत में हूँ, कमजोर हूँ
मुझे चुप रहने की आदत डालने के साथ ही
अपने स्वास्थ्य की ज्यादा फ़िक्र करनी चाहिए
उम्र को नजरअंदाज करना ठीक नहीं
बहुत कठिन नहीं है
जो मैं अपने शुभेच्छुओं की बातें मान लूँ
विशेष अड़चन नहीं है
जो मैं उनकी चिंताओं को समझूँ
दिये गये सुझावों पर अमल करने लगूँ
जटिल मामला नहीं है
जो मैं ठीक वही हो जाऊँ
जो वे चाहते हैं
जिसमें उन्हें संतुष्टि मिले
दिक्कत यही है
तब मुझे अपने भीतर के मनुष्य को
देनी होगी आजीवन कालेपानी की सजा
बोध, विवेक, आत्मा को रख देना होगा बंधक
या फिर उन्हें बेच देना होगा कौड़ियों के भाव
अब तक जो पढ़ा, गुना, सोचा, समझा, विचारा
उसे अपने भीतर से नोचकर खींच लाना होगा बाहर
फेंक देना होगा सात समुंदर पार
तब फिर मेरा होना, न होना बराबर होगा
तब फिर मुझे अंधा, गूँगा, बहरा बनकर जीना होगा
तब फिर अपने हृदय और मस्तिष्क को कर देना होगा सुन्न
और चुन लेना होगा एक अभिशप्त जीवन
प्रियजनों को खुश करने की इतनी बड़ी कीमत चुकाना
क्या दुनिया का सबसे महँगा सौदा नहीं होगा?
मुश्किल बड़ी है
क्योंकि भेड़ों की भीड़ के बीच जीकर
अपने भीतर के अर्जित मनुष्य की
ऐसी बर्बर हत्या
मैं हरगिज़ नहीं झेल सकता
- कुंदन सिद्धार्थ



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