रंडी


ईश्वर ने तुम्हें

प्रकृति की नज़र से

बचाने के लिए

दिया ठोड़ी पर काले

तिल का डिठौना,

और दो काली आँखें

तुम्हारे प्रेमी ने

समाज की नज़र से

तुम्हें बचाने के लिए

दी काली गाली -

रंडी थी साली


रंडी

चौराहे पर लगी

कोई साफ़ सुथरी मूरत नहीं

और न ही

किसी कोठे पर लेटी

तुम्हारे फ़ारिग़ होने के इंतज़ार में,


रंडी कोई भी हो सकती है

रंडी तुम्हारी माँ भी हो सकती है

तुम्हारे बाप की गाली में

तुम्हारी बहन भी रंडी हो सकती है

प्रेमी के साथ बिस्तर में होने के बाद

जैसे तुम्हारी प्रेमिका हो गयी थी

तुम्हारे साथ के बाद

रंडी तुम्हारी पत्नी भी हो सकती है

एक दिन खाने में नमक ज्यादा होने पर

रंडी तुम्हारी बेटी भी हो सकती है?

जैसे सारी रंडिया होती आयी है।



मॉब लिंचिंग में मारी गयी पहली औरत


वो तो बस यूँ ही खड़ी थी 

वो न हिन्दू थी न मुसलमान 

और न ही किसी और समाज से 

वो बस एक औरत थी 

जो खड़ी थी 

वो न तो कुछ चुरा कर भाग रही थी 

न ही कुछ छिपा कर 

वो बस अपने सपनों को 

जगा कर भाग रही थी

वो न तो अपने पसंद के 

मर्द के साथ भाग रही थी 

न ही उसके पास कोई गौ माँस था 

या उसके जैसा कुछ और 

उसके जिस्म पर भी

आम बोल चाल वाली 

औरतों की तरह ही कपड़े थे 

न तो वो सबरीमाला में 

घुसने की कोशिश कर रही थी 

न ही बुर्क़ा पहनने से इंकार

वो बस यूँ ही खड़ी थी

फिर भी भीड़ ने 

उसे मार दिया


एक भीड़ का झुण्ड 

रैली बना आ रहा था 

जिसमें टोपी और

चोटी वाले दोनों थे 

और चीख कर बोल रहे थे 

ऐसा नहीं होने देंगे 

वहाँ कई सारे लोग 

खड़े होकर देख रहे थे 

कुछ ने अपनी आत्माएं

अपनी जेब में रख ली

कुछ ने सुनार को गिरवी रख दी


प्रशासन ने पूछा 

तुम अपनी आत्मा के साथ 

खुले में घूम रहे थे 

साहब मेरी आत्मा 

तो मेरी जेब में ही थी 

पर भीड़ ने बताया 

उस वक़्त तुम्हारी आत्मा 

तुम्हारी जेब से झाँक रही थी 

क्या तुम उस औरत को जानते थे 

नहीं साहब 

तुमने किसी को कुछ बोलते 

देखा या सुना 

नहीं साहब 

बस महसूस किया 

पर पता नहीं क्यों साहब 

जब उस औरत को याद करता हूँ 

तो वो कभी माँ जैसी दिखती है 

तो कभी पत्नी जैसी

कभी बहन तो कभी बेटी जैसी 

पर मैं उसे नहीं जानता 

वो तो बस यूँ ही खड़ी थी 


वो महसूस करा रहे थे 

ऐसा नहीं होने देंगे 

ऐसा नहीं होने देंगे 

और मैं उस भीड़ के झुण्ड 

में शामिल हो गया

अच्छा ठीक है 

हम लोकतंत्र में रहते हैं

सख्त कार्यवाही होगी 

उस खड़ी औरत के खिलाफ़

क्या कोई बता सकता है

क्या वो किसी कानून या हिंसा 

के ख़िलाफ खड़ी थी 

नहीं साहब 

पता नहीं 

ठीक है तो रिपोर्ट में लिखो 

वो औरत खड़ी थी 

अपने पसंद के मुसलमान मर्द 

के इंतज़ार में गौ मांस लिए 

और भाग जाना चाहती थी 

निकाह करने के लिए 

किसी अदृश्य शक्ति ने 

आकर उसे मार दिया


नहीं साहब 

ऐसा नहीं था 

वो भीड़ थी 

सभी के चेहरों पर मुखोटे थे 

सभी के मुखौटों से खून टपक रह था 

और बोल रहे थे 

ऐसा नहीं होने देंगे 

क्या किसी ने उनके हाथों में 

तेज धारदार हथियार देखा 

नहीं साहब 

लेकिन सभी की जुबान 

किसी तेज धारदार हथियार से कम न थी 

और वो बोल रहे थे 

ऐसा नहीं होने देंगे


नहीं, नहीं ऐसा कुछ नहीं था 

तुम्हारी आत्मा तो 

उस वक़्त तुम्हारी जेब में थी 

कहीं ऐसा तो नहीं साहब 

वो मॉब लिंचिंग में मारी गयी 

पहली औरत हो!



मतदान


चुनाव आते हैं

नौकरशाही से लबरेज़ 

वो डीएम हर बार आता है 

और 

जरुरी सूचना बता कर चला जाता है 

मतदान देना आपका अधिकार है 

इस बार अधिक से अधिक मतदान करें

और इस उत्सव में शामिल हों

पर मतदान के बाद उसे

अपने प्रमोशन की चिंता सताती है

वो भूल जाता है 

कभी बताने नहीं आता 

कि मतदान से अधिक जरुरी है 

बच्चों को स्कूल भेजना!



डॉक्टर और साहित्यकार


सब बीमारियां

अलसा कर बूढ़ी हो गयी हैं

सब दवाइयाँ स्वर्ग चली गयी हैं

और 

कुछ डॉक्टर 

साहित्यकार बन गए हैं

वे बीमारियों की किताब से चुराते हैं

अलंकारिक शब्द 

और 

मरी हुई कविता का करते हैं

पोस्टमार्टम 

और अपने शब्दों का भूसा 

भर कर के रिपोर्ट बना देते हैं


और 

कुछ साहित्यकार 

डॉक्टर बन गए है 

जो अपनी प्रेम कविताओं से करते हैं

मौत का इलाज

ज़रुरत के हिसाब से शरीर के कुछ अंग 

सहेज कर रख लेते हैं

अपनी कविताओं में


कुछ शब्द घबराते हैं

प्रेम और हिंसा 

के एक साथ इंजेक्शन से 

पर बेरहम 

डॉक्टर और साहित्यकार 

ठोक देते हैं

किसी भी जगह 

अपने हिसाब से!



मानव सभ्यताएं 


उसकी आँखे खुली थी या बंद

ये कह पाना मुश्किल-सा ही था

क्योंकि उसकी आँखों के बाहर

बड़ी-बड़ी तख्तियां लटक रही थी

जिस पर लिखा था मानव सभ्यताएं

उसकी नाक के नथुने इतने बड़े थे

कि पूरी पृथ्वी समा जाए

उसका मुँह ऐसा था

जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सभ्यताओं को

यहीं से निगला गया हो

आप उसकी गर्दन को लम्बा कहेंगे

तो आपको नर्क भेजा जायेगा

और छोटा कहेंगे तो भी

आप उसके कंधे देख

चढ़ कर कुलांचे भरना चाहेंगे

पर वो जगह

मानव सभ्यता के अनुकूल नहीं

आप उसकी छाती देखकर

खेत बनाना चाहेंगे

पर वहाँ पर्वतों के अलावा कुछ नहीं,


आप उसके पेट पर बनी

नाभि को देखकर उसे

ब्रह्माण्ड का केंद्र मान लेंगे

आप उसकी कमर देखकर

उसके चारों ओर

पक्की सड़क बनाना चाहेंगे

उसकी जाँघे आपको

सभी नदियों का

उद्गम स्थल लगेगी

उसकी पिंडलिया आपको

हवा से बातें करती झरनों सी लगेंगी

उसके पैर आपको गाँधी की

अहिंसा से भी ज्यादा

मुलायम महसूस होंगे

जिसके नीचे दफ़्न है

न जाने कितनी सारी

मरी और सड़ी मानव सभ्यताएं!



काली औरतें 


काली औरतें 

जब बात करती हैं

तो आसमान भी 

काला हो जाता है

बहुत तेज चमकने वाला सूरज

छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट कर 

बिखर जाता है!


काली औरतें 

सोचती हैं

नये-नये मनसूबे

और काट देती हैं अपने ही तर्कों से!


काली औरतें

बातें करती हैं

अपने गोरे प्रेमियों की

जो च-रस की जगह

शृंगार रस का सेवन उचित समझते हैं!


काली औरतौं के लिए

आभूषण कोई सुन्दरता नहीं 

वो मन और तन का संवाद है!


काली औरतें 

लगाती हैं काज़ल, नाख़ूनी और महावर 

अपने गोरे प्रेमियों के पसंद की

क्योंकि

काली औरतौं की मासंल भुजाएँ

और सुडौल पिड़लियाँ 

खूब भाती हैं उनके 

गोरे प्रेमियों को!


काली औरतें

नज़रें झुकाए

लेट जाती हैं

समर्पण में अपने 

गोरे प्रेमियों के लिए 

वो लिपटकर 

काली औरतौं के सपाट पेट पर 

बने गहरे कुएँ से 

पानी पी लेता है

और क्यों कहता है 

निर्दयी नरनाशी

काली औरतें?



कलाइयों पर ज़ोर देकर


लोग

इतने सारे लोग

जैसे लगा हो 

लोगों का बाज़ार

जहां ख़रीदे और बेचे जाते हैं लोग

कुछ बेबस कुछ लाचार

लेकिन सब हैं हिंसक


जो चीखना चाहते हैं ज़ोर से

लेकिन भींच लेते हैं अपनी मुट्ठियां

कलाइयों पर ज़ोर देकर

ताकि कोई देख न सके

बस महसूस कर सके हिंसा को

जो चल रही है 

लोगों की

लोगों के बीच

लोगों से


एक हिंसा तय है

लोगों के बीच

जो ख़त्म कर रही है

किसी तंत्र को

जो इन्हीं हिंसक लोगों ने बनाया था

हिंसा रोकने के लिए


लेकिन सब ने सीख लिया है

कलाइयों पर ज़ोर देकर मुट्ठियां भींचना

इन्होंने भी सीख लिया 

सभ्य लोगों की तरह

कड़वा बोलना, गन्दा देखना और असभ्य सुनना!


यह समझते हैं ख़ुद को सभ्य

कलाइयों पर घड़ी, गले में टाई, पैरों में मोज़े

और हाथ में ज़हरीली तलवार रखने से


मैं भी रोज़ जाता हूँ

लोगों के बाज़ार

तुम भी जाया करो

ऐसे ही सभ्य बनने

ताकि तुम भी 

भींच सको अपनी मुट्ठी

कलाइयों पर ज़ोर देकर?


- मंजुल सिंह


मंजुल सिंह

युवा रचनाकार. जन्म: ९ मई १९९४. शिक्षा: सिविल इंजीनियरिंग, एम.ए. (हिंदी), यू.जी.सी (नेट/जे.आर.एफ-हिंदी), वर्तमान में अध्यनरत. अमर उजाला काव्य, पोषम पा, प्रतिलिपि आदि पर कुछ कविताएँ प्रकाशित. ग़ाज़ियाबाद, उत्तरप्रदेश में निवास.

मंजुल सिंह से उनके मोबाइल नंबर +919990114968 पर बात की जा सकती है.