१.
बावन पत्ते ताश के
और दो जोकर - कुल होते है चौपन मतलब
बीत ही गए दांव लगाते हुए
हार हर पल इतनी मिली कि गौरव बन गई
सुनो बाबू उम्र चौपन की होगी अब
पचपन शुरू होगा, और चौपन कम नहीं होती
अब तो हो जाओ बड़े, कृतज्ञ और विनयी
गरियाते हुए बीता जीवन
बावन की उम्र में गुजर गए थे पिता तुम्हारे
और तुम दो बरस ज्यादा ही जी लिए हो
कब तक निपटोगे और मोह रखोगे
बेफिक्री और मज़ाक में खत्म हो गई सांसें
उखड़ी और हाँफती हुई सांसों का हिसाब तो दो
सुनो क्या पाया इतना जीकर, क्या कर लिया
बेइज्जती और ख़ौफ़ के अलावा कुछ पाया
एक अदृश्य धार थी जिसपर चलते रहें
शेष है नहीं कुछ खाते में जीवन हो या बैंक
लूटे पीटे हो और कंगाल
इतने कि सुबह जीमते हो तो शाम की फ़िक्र में
छोड़ देते हो थाली
अँधेरों में जीते हुए रस्सियां
आकर्षित करती है जो झटके में खत्म करती है बंधन
याद करो उन बीजों को जो वटवृक्ष बने है
आज इठलाते हुए झूम रहे हैं
और तुम जड़ों को देखते बेबस हो
सूखे पत्ते शाखों से बिछड़कर कहाँ गए
कोई हिसाब नहीं
इतना तो निर्मम नहीं होगा ईश्वर भी
सुना कि हरेक का कुछ प्रयोजन होता है जीने का
किस प्रयोजन से भेजा होगा तुम्हें
या फिर एक विदूषक की ज़रूरत हो संसार को
एक बार फिर पूछना गर मिल पाओ
नाचिकेता की तरह उससे तो
सुनो बाबू चौपन पूरे, शेष बचे है चंद क्षण
कब तक जियोगे और क्यों, कोई ध्येय शेष नही जब।
२.
सब कुछ फिर लौट आएगा
हर बसंत, पतझड़ के बाद भी मौसम आएंगे
कहने - सुनने की स्मृतियों के बीच
धुंध छायेगी
विलुप्त होगा नशा जीवन जीने का
पर फिर लौटना ही होगा
वर्ष - दर - वर्ष उम्र खिसकती रहती है
उत्सव अंततोगत्वा एक सर्ग ही है
अंतिम मुहाने पर नदी का प्रचण्ड शोर
एक भभकी के सिवा कुछ नहीं
खत्म होता ही है हर बहाव
प्रज्ञा स्थिर नही तो बहाव का क्या
सुनो बाबू, चौपन में इस मौसम का
गुलमोहर का पहला फूल देखो
जो अभी खिला है, खट्टी-सी खुशबू है इसमें
चंद दिनों में लद जाएगा डालों पर
शाखाएँ इठलायेंगी लालपन से
फिर खाली होगा - पेड़ रीतेगा
सूखेगा और क्रम बना रहेगा
पूरे पचपन किसने देखे
आगे की आगे देखेंगे
इस फूल को सिरज लूँ माथे पर अपने
प्यार करूँ जी भरकर और कहूँ
कितने तो सुख से जी लिए बाबू
चौपन बसंत कम नही होते।
३.
भीतर ही जीता रहा
अकेला गुपचुप-सा
छवि कभी बाहर नहीं आई
घुट जाती है साँसे भीतर
दम तोड़ देता है जिस्म
कितने मुखौटों में छुपता रहा
कभी जीवित पिता का
कभी माँ का पिता
फिर भाई का
कभी अपना भी पिता बना
बेताल उतरा नहीं कांधे से
मरने के बाद सपने में बहुत कम आये पिता
माँ आई कई बार पूछने हिसाब जीवन का
भाई अभी भी आ धमकता है अक्सर
इस सब में सिर्फ यह हुआ कि
भीतर के भीतर
बैठे अपने को मारना ही पड़ा
सुनो बाबू चौपन बीत गए भेष में
निकला नहीं जो मथ रहा है कोनों में
सपने बुनना है उसे
कहानियां भोगना है
मुखौटों की शक्ल में
देने है पद चिन्ह यही
नदी, समुंदर, हवाओं या
पहाड़ी पर लिखना है नाम
आसमान शांत है, नदियाँ ख़ामोश
जंगल में हलचल है
एक बाज आतुर है,
चींटियां बेचैन
सूखा है पेड़ और शाखाएँ
जड़ें झीनी हो गई हैं
सुर मद्धम है आरोह का
भैरवी के अंदाज़ में
तन का इकतारा बज रहा है
चूक गई है हिम्मत
कभी गाता था निर्भय निर्गुण गुण
गुण रे गाऊँगा
चौपन में अपने भीतर धुआँ देखता हूँ।
४.
जब तक माँ थी तब तक मोह था
होड़, दौड़, खोड़ में आगे रहकर साबित करना था
खूब दौड़ा, हर बार जीता
जब भी हारा कहीं तो रोने नहीं दिया उसने
जीत की ख़ुशी अपने चेहरे पर कम
माँ की आँखों में ज्यादा दिखती थी
पर अब जान गया हूँ कि
तस्वीरों में कोई भाव नहीं होते
तस्वीर पर धूल भी नही झड़ती अब
मातृभूमि का बिछोह दुर्दैव योग था
जनक का जल्दी बिछड़ना दुखद
जिस उदर से जन्म लिया, वो छूट गया
सहोदर को अपने हाथों से विदा किया
चौपन में कितना दुःख और झेलते बाबू
फिर भी सुखी रहे औरों से तो
हाथ पसारकर माँगना ना पड़ी
इकन्नी कभी
नज़रे ऊंची रही हमेशा
जब भी शर्मसार हुआ
अपनी ही नजरों में गिरा
उठकर संघर्ष किया कि
लड़े बिना जीना नहीं
अब जीना ही नहीं तो
लड़े किससे - यक्ष प्रश्न है
सुनो बाबू, सब तो छूट गया है
निर्मोही हो ही गए हो
आसक्ति छूट ही गई है
क्यों बेचैन होते हो
कह गया था ना वो जुलाहा
जैसे पाँख गिरे तरुवर के।
५.
कुएँ, बावड़ी, तालाब से बेहतर लगें जँगली नाले
नालों से बेहतर नदियाँ
नदियों से बेहतर झरने और जल प्रपात
ऊँचे से गिरकर समतल हो गए जो
और झरनों से भी बेहतर लगे समंदर
ठहरना शीतलता का प्रतीक हो सकता है
आव और झीर के लिए इंतज़ार की उम्र गई
बहना तेज गति से, दिशा बदलने और
छोड़ते जाने का मोह नहीं
कल कल के मद्धम स्वर लुभाते नहीं मुझे
यूँ भी मिलना किसी समंदर में ही पड़ता है
नदी कोई भी हो - पहाड़ी या मैदानी
गरजना और बार - बार किनारों को छोड़
फिर बवंडर में उलझना कितनों को आता है
सौगात में मिली चीजों को
लौटाने का हुनर सीख गया हूँ
भव्य विराट स्वरूप को देखकर अपना लेना
क्या अनंतिम सत्य नहीं बाबू
मैं समंदर बनना चाहता हूँ
चौपन पार की इस दहलीज़ पर
गरजना है, छूकर लौट जाना है
पूरे उद्दाम वेग से बगैर भावुक हुए
अब नहीं बना तो कब बनूँगा
शीतलता और वेग अब समाते नही मुझमें
निश्चित दिशाओं में नहीं बहना है
खारेपन को जीते संसार के निकृष्टम जीवों को
भीतर समेट कर गरजना चाहता हूँ एक बार
कि फिर ख़ामोश हो जाऊं ताकि भ्रम बने रहें
अब कोई रास्ता भी शेष नहीं मेरे लिए।
- संदीप नाईक



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