मुझे नहीं सुनना
तुम्हारे पैरों में लगी पायलों की रुनुक झुनक
चूड़ियों की खनक से उत्पन्न कोई मधुर संगीत
मुझे नहीं देखना
तुम्हारे पैरों को परंपरा के दायरे में घूमते
रिवाज़ के चलते चेहरे पर लिहाज़ का घुंघट
मुझे सुनना है
तुम्हारे पैरों की थपथपाहट से गूंजती धरती को
बंदिशों के विरुद्ध उठती तुम्हारी गाढ़ी आवाज़ को
मुझे देखना है
तुम्हारे पैरों को कुप्रथाओं की चौखट लांघते हुए
रिवाज़ के गहनें को हाथों से मरोड़ कर फेंकते हुए।
नदियाँ
ऊंचे पहाड़ों से ही नहीं
निकालती नदियां
कुछ नदियां ऑंखों से भी
निकलती है
सारी नदियां चलकर
मैदानों पर ही नहीं आती
कुछ नदियां
दाएं-बाएं स्तनों पर भी आती है
सिर्फ़ अस्थियां ही
नदियों में नहीं बहाई जाती
कुछ नदियों में
स्वप्न भी बहाए जाते हैं
सारी नदियों के किनारे
फसलें नहीं उपजाई जाती
कुछ नदियों के किनारे
उर्वरता दुःख के लिए होती है
नदियॉं खुद कितनी दुःख में हैं
एक को कहा जाता है तुमने सभ्यता को
जन्म दिया और एक को कहा जाता है
कि तुममें ज़रा तहज़ीब है ही नहीं।
स्मृतियों का दर्पण
जब भी खड़ा होता हूॅं
स्मृतियों के दर्पण के सामने
मेरी आंखें देखती है
चांदनी छिड़कते मेरे नन्हें जीवन को
मेरा मन खेलता है
साथियों संग छुपन-छुपाई का खेल
मेरे हाथ बनाते हैं
बारिश से गीली हुई मिट्टी के घरौंदे
मेरे कान सुनते हैं
मिट्टी से लथपथ हो घर लौटने पर मॉं की हल्की डांट
मेरे पैर भागते हैं
कां-कां-कां कर उड़ते कौओं के पीछे
काश! स्मृतियों के दर्पण के सामने खड़े होते ही
बचपन की स्मृतियां नहीं वैसा ही बचपन ही लौटा आता।
जीवन
उम्रभर
जीवन को
पूर्णतः पोषण देना
जैसे देती हैं जड़ें
एक वृक्ष को,
चाहे अंत में
जड़ों-सा
सड़ना ही
क्यों ना पड़े
उम्रभर
जीवन को
पूर्णतः पकाना
जैसे पकाती है प्रकृति
गेहूं की बालियों को,
चाहे अंत में
बालियों सा
बिखरना ही
क्यों ना पड़े
आख़िर!
एक ही जीवन है
मत छोड़ना
कोई कसर
पकने, लड़ने में
सच्चाई और
स्वतंत्रता से
जीने में।
प्रेम
१.
तुम्हारे घर को
ना मुझसे प्रेम है
और ना...
मेरे घर को तुमसे
उस अनजान जगह को...
न जाने कैसे हमसे प्रेम हो गया
'कम से कम उसने तो हमें मिलने दिया।'
२.
दोनों ही घर
हमेशा प्रेम को
परिभाषित करते रहते हैं
लेकिन...
'ना तुम्हें मुझसे प्रेम करने दिया जा रहा है
और ना ही मुझे तुमसे।'
३.
दो घरों के बीच प्रेम रहता है
'अटूट प्रेम'
दो प्रेमियों का पता चलने पर-
घरों के बीच का प्रेम
वहीं बेरहमी से मार दिया जाता है।
४.
प्रेम का घूंट पिलाने वाली माॅं
लड़की के गले से प्रेम शब्द को
उखाड़ देना चाहती है,
उसके हृदय में बैठे प्रेमी को मार देना चाहती है...
प्रेम सीखाने वालों की नजरों में
प्रेम करने वाला बहुत बुरा हो चुका है।
५.
कितना बचा है पृथ्वी पर प्रेम
अब तो 'कठोर संरक्षण अधिनियम' की जरूरत है...
प्रेम के सारे 'गर्भाशय' ख़त्म किए जा रहे हैं।
- रमेश धोरावत
रमेश धोरावत
युवा रचनाकार. शिक्षा: इंटरमीडिएट. सम्प्रति: पब्लिशिंग कंसलटेंट, काव्यम पब्लिकेशन, पटना.
पता: गांव- कारोला, तहसील- सांचौर, जिला- जालोर - 343041 (राजस्थान)
रमेश धोरावत से उनके ईमेल rameshdhorawat780@gmail.com अथवा मोबाइल नंबर +918290440512 पर संपर्क किया जा सकता है।



2 टिप्पणियाँ
उत्तम लेखन 💐💐✍️✍️
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