किताबी औरतें

किताबी औरतें पर्स में लिए घूमती हैं कुछ किताबें 
वह खोजतीं हैं किनारा
सबके आँखों के बीच का

वह एकांत 
जहाँ वह सूँघ सके एक-आध पन्नों को
माकूल जगह ठहर कर सूँघती हैं दो-चार पन्ने 
बाद पन्नों पर छोड़ती हैं निशान

जैसे 
छूटा रह जाता है प्रेम-पत्र 
प्रेम के बाद भी।



पतझड़

जाते हुए, अचानक एक दिन रुक जाओगे 
आसपास की चीजें टटोलते हुए 
पहचानना चाहोगे गर्द चेहरा
जीवन में बचा मर्म 
भावनाओं में नमी 

जानते हो 
यह पतझड़ का मौसम है 
हर चीज़ से नमी सोख लेता है।



मेरे और तुम्हारे बीच

मेरे और तुम्हारे बीच 
एक बारीक-सी झीनी चादर टंगी है कील से 
उस पार तुम हो 
इस पार मैं हूँ
हम बाध्य नहीं इस पार या उस पार के 

बावजूद इसके
मैंने मीरा होना ज्यादा पसंद किया।



ख़ालिस प्रेम में कहो यह कहाँ तक जायज़ है?

जाते हुए
मैं छोड़ जाना चाहती हूँ 
कुछ चिट्ठियाँ 
कुछ लिफ़ाफ़े 
चॉकलेट के रैपर 
चादर की सिलवटें 
गिलास भर खारा पानी
स्याही बची क़लम 
और एक सफ़ेद काग़ज़ भी 
ताकि तुम उकेर सको
कुछ और रेखाएं याकि पाबंदियाँ
ताकि दायरों में सिमट जाएं हम और हमारी ख्वाहिशें

ख़ालिस प्रेम में कहो यह कहाँ तक जायज़ है?


मैं पस्त हूँ

क्या तुम्हारे देश में प्रेम के बदले प्रेम देने का रिवाज़ नहीं         
क्या परंपरा है तुम्हारे देश की
प्रेम पारितोषिक में पाषाण हृदय हाथों में रख 
कहा 
मैं पस्त हूँ

कई परतों से ढँका हूँ 
पदवी-पद्धति से जकड़ा हूँ 
हाथ-पैर सही हैं परंतु 
सामाजिक पंगु हूँ

निष्ठा है 
पर निष्ठुर हूँ 
निस्संदेह कह सकता था बहुत कुछ मगर 
मैं सामाजिक शस्त्रों के सामने नितांत निहत्था खड़ा हूँ 
मैं पस्त हूँ।

- ज्योति रीता

ज्योति रीता

युवा कवयित्री। पेशे से हिंदी प्राध्यापिका। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।
रानीगंज, अररिया (बिहार) में निवास। 
मोबाइल नंबर : +918252613779
ईमेल : jyotimam2012@gmail.com