ग़नीमत इतनी रही कि मैं बचा रह गया
बस मेरा घर खो गया है मेरे ही शहर में
अपने खो चुके घर को चाँद पर खोजने गया
यह सोचकर कि चाँद भी तो अपने जन्म से
किसी बेघर की तरह चक्कर लगाता रहा है
मगर चाँद अब भी दुःख गाता हुआ मिला
ठीक मेरी तरह जिसका कि घर खो चुका है
आदमी का खो जाना आम बात रही है
साइकिल का खो जाना आम बात रही है
नाव का खो जाना आम बात रही है
बटुए का खो जाना आम बात रही है
मगर किसी के घर खो जाने की बात आप भी कहाँ मानेंगे
एक ऐसे वक़्त में जब भारत का नागरिक होने की पहचान
बार-बार माँगी जा रही है मुझसे मेरे ही राजा के द्वारा
क्या मेरा राजा किसी बेघर को अपना नागरिक मानेगा
यह जानते हुए कि ख़ानाबदोश का घर कहाँ हुआ है कभी।
इस तरह रहना चाहूँगा
इस तरह रहना चाहूँगा भाषा में
जिस तरह शहद मुँह में रहता है
रहूँगा किताब में मोरपंख की तरह
रहूँगा पेड़ में पानी में धूप में धान में
हालत ख़राब है जिस आदमी की बेहद
उसी के घर रहूँगा उसके चूल्हे को सुलगाता
जिस तरह रहता हूँ डगमग चल रही
बच्ची के नज़दीक हमेशा उसको संभालता
इस तरह रहूँगा तुम्हारे निकट
जिस तरह पिता रहते आए हैं
हर कठिन दिनों में मेरे साथ
हाथ में अपना पुराना छाता लिए।
गवैया
गवैया अपनी पीड़ा को पूरी लय के साथ गाता है
आज वह न दुःख को बाँधता है न उदासी को
न धूप को न बादल को न अपनी आत्मा को
गवैया सेतु को गाता है उसके नीचे के जल को गाता है
रंग को गाता है शहद को गाता है नमक को गाता है
महुआ को गाता है जामुन को गाता है नीम को गाता है
गवैया अपनी धुन की गति और उतार-चढ़ाव में
गायन की शैली में बस अपने समय को गाता है
समय का यह रूपक किसका है जो दुःख से भरा है।
बारिश की भाषा
उसकी देह कितनी बातूनी लग रही है
जो बारिश से बचने की ख़ातिर खड़ी है
जामुन पेड़ के नीचे जामुनी रंग के कपड़े में
‘जामुन ख़रीदकर घर लाए कितने दिन हुए’
हज़ारों मील तक बरस रही बारिश के बीच
वह लड़की क्या ऐसा सोच रही होगी
या यह कि इस शून्यता में जामुन का पेड़
बारिश से उसको कितनी देर बचा पाएगा
बारिश किसी नाव की तरह बाँधी नहीं जा सकती
जामुन का पककर गिरना भी बाँधा नहीं जाता सकता
बारिश को रुकना होता है तो ख़ुद रुक जाती है
बरसना होता है तो ख़ुद बरसने लगती है घनघोर
तभी बारिश है लड़की है और जामुन का पेड़ है
तभी बारिश की भाषा है मेरे कानों तक सुनाई देती।
रेनकोट
तब बारिश अच्छी नहीं लगती जब रेनकोट को पहने
कोई इठलाता निकल जाता है भीग रहे लोगों के सामने से
तेज़ बारिश में छाता भी कहाँ काम आता है
न पिता का दिया धूप से बचने वाला गमछा
न दरख़्त के पत्ते काम आते हैं न कोई खंडहर
और यह बात बारिश का महीना आने से पहले
हर रेनकोट पहने हुए आदमी को मालूम होती है
जाहिर है, प्रेम पहले आया होगा रेनकोट बनने से भी पहले
बारिश में मगर अब कहाँ कोई दिखाई देता है
किसी को मुहब्बत करते हुए या चूमते हुए
वह शहर दिल्ली हो अमृतसर हो या कोलकाता हो
अब छतों पर लड़कियाँ भी कहाँ आती हैं भीगने
मगर मैं तुमसे प्यार करता हूँ और बारिश में भीगता हूँ
तुम्हारे दिए बीज को अपनी हथेलियों में सजाए
तुम्हीं का बताया हुआ है बीज रहेंगे तो हमारा प्रेम रहेगा
तुम्हीं का बताया हुआ है कि बीज से ज़रूरी नहीं है
तुम्हारे लिए सस्ता वाला या महँगा वाला कोई रेनकोट।
सायकिल
पिता ने अपने जीवन की जमापूँजी
एक अदद बचाकर रखी सायकिल
सौंप दी है मुझे
समुद्रों घाटियों जंगलों को
लाँघ आने के लिए
आज दिया नहीं जा रहा किसी को कुछ
बस छीन लिया जा रहा है झपट्टा मारकर
दूसरे की चीज़ें दूसरे की इज़्ज़तें माल-असबाब
ऐसे में पिता की दी हुई सायकिल
चोरी चले जाने या छीन लिए जाने से
कैसे बचा पाऊँगा सहजता से
मैं जो एक बेहद डरा हुआ व्यक्ति हूँ
मैं जो कमज़ोर व्यक्ति हूँ धोखा दिए जाने
झपट लिए जाने वाले इस समय में
जिनसे कुछ भी नहीं लिया विपत्तियों में
वह भी धमकी देकर जा रहा है रोज़
पिता की सायकिल उठा ले जाने की
साथ में मुझे भी किसी अँधेरे घर में
यह जो डर है भीतर मुहब्बत से बैठा
इसके बारे में पिता को कैसे बताऊँ
पिता ने मेरे भीतर बैठे डर को भगाने के लिए
क्या-क्या जतन नहीं किए
डर को भगाने के कथा-प्रसंगों को सुनाकर
कई-कई दफ़ा अँधेरी जगहों को दिखाकर
पिता कहते-समझाते रहे हैं बारंबार
कि कोई व्यक्ति डरकर जी नहीं पाया है
कोई व्यक्ति डरकर अपना हक़ नहीं ले पाया है
मैं वर्षों-वर्षों बाद निकला हूँ
पिता की सायकिल पर
बैठकर-सवार होकर
उनके छीनने के सारे अपराध को
विफल करने के लिए पिता-सी शक्ति को समेटे।
घुँघनी
किचन में कितना सारा सामान हुआ करता था खाने के लिए
अब किचन है कि मुँह चिढ़ाती है ढनमनाए बरतनों को दिखाकर
यह मंदी का दौर है और मेरा मन घुँघनी खाने को कर रहा है
पत्नी ने कहा घुँघनी चने से बनती है या उबाले हुए मटर से
और इन दोनों चीज़ों को रखे जाने वाले डब्बे एक अरसे से ख़ाली हैं
और कोई रास्ता दिखाई नहीं देता है इनको किचन तक लाने का
चने की क़ीमत और मटर की क़ीमत इतनी महँगी नहीं है बाज़ार में
कि हम घुँघनी खा न सकें या घुँघनी की दावत पर आपको बुला न सकें
लेकिन मसाले की तेल की प्याज़ की क़ीमत इतनी बढ़ी हुई है
कि इच्छाएँ मारी जा रही हैं दुःख के साथ बेरहमी के साथ
जिस तरह कोई बच्चाचोर के नाम पर मार दिया जा रहा है राह चलते
या पशुचोर के नाम पर मार दिया जाता है दिन दहाड़े भरे बाज़ार में
मल्लाहों का गीत भी तो दर्द से भर रहा है मछली मारने वालों का भी
भोंपू बजाने वालों का भी हारमोनियम बजाने वालों का भी इन दिनों
आपसे अगर हमारे घर नहीं आने के लिए कहेंगे तो आप हँसेंगे
कि अब भला घुँघनी खिलाने का भय इतना भी ठीक नहीं है मियाँ
भय इस बात का है कि मैं आपको घुँघनी की शानदार दावत दूँ
और घर से मेरे लिए निकलते ही मालूम पड़े कि युद्ध छिड़ गया है
और यह सरकार ऐसी है घुँघनी तक उठा ले गई है ख़ुद के लिए।
छिद्र
अब रास्ते में भेंट होती है तो सबके छिद्र से होती है
एक कथा यह भी है कि आदमी अब कोई
चौपाई नहीं गाता अपने छिद्र को ही गाता है
छिद्र को ही छूता है हाथ बढ़ाकर भयमुक्त
तभी एक हाकिमे वक़्त छिद्र को अपने जीवन की
सबसे पुरानी और संभवतः सबसे दीर्घ कथा मानते हुए
कइयों को मारता-मरवाता है कइयों से थूक चटवाता है
उसके ऐसा करने से लोगबाग की पैनी नज़र में
उसकी इज़्ज़त पहले से कुछ ज़्यादा बढ़ी दिखाई देती है
हम छिद्र को गढ़ने में निपुण जो होते हैं चतुर भी दक्ष भी
इसका प्रमाण भी है कि आज उसने मेरे भीतर के छिद्र
बाहर निकालकर दिखाए पूरे मजमे पूरी भीड़ के सामने
किसी गामा पहलवान के माफ़िक जाँघों पर हाथ मारते
मैं उस गामा पहलवान का कुछ बिगाड़ नहीं सकता था
अपने छिद्र के भय से घर में छिपकर बैठ ज़रूर सकता था
युद्ध भी तो अपने छेदों को छुपाने के लिए ही किए जाते रहे हैं
छायाओं को बिगाड़ने का प्रयास भी इसी वजह से किया जाता रहा है
बंधु लोग, सच है, अब छिद्र ही गढ़ रहा है हमको भी तुमको भी
पंचतत्व के मिथक को अपने दस्ताने वाले हाथ से परे हटाता
तभी मैं एकदम बेआवाज़ बत्तियाँ बुझा देता हूँ कमरे की
तब भी छिद्र ही छटपटाता दिखाई देता है रोशनी के बदले।
पोचारा
मैं चाँद के घर जाकर पोचारा करता हूँ
तुम बारिश वाले मौसम के संगीतकार ठहरे
तुम्हारा वर्षों पुराना स्पष्ट ख़्याल था कि
अब आदमी के विचारों की पुताई ज़रूरी है
वही आदमी, जो दूसरे आदमी को मार डालता है
चाँद का क्या चाँद तो हमेशा से अद्वितीय रहा है
उसके घर को पुताई की ज़रूरत कहाँ पड़ती होगी
मेरे संगीतकार, वही आदमी रोज़ जा रहा है चाँद के घर
पानी की तलाश में हवा की तलाश में जीवन की तलाश में
जो हत्यारा है और युद्ध चाहता है मुझसे भी तुमसे भी
और जो छोड़ आता है अपने ख़ूनसने हाथों की छाप हर बार
तभी मैं सबसे पहले चाँद के घर का पोचारा करता हूँ तुम्हारे लिए
जिस चाँद को तुम निहारते हो रोज़ मेरे कंधे पर अपना सिर रखकर।
बेसुरा
सुर जो नहीं रहा पहले जैसा
मेरा भी और मेरे समय का भी
सुर से हटने की इस क्रिया-प्रक्रिया पर
न मेरी न मेरे समय की चाहत है
इस बेसुरेपन से मेरा समर्पण इतना भर है
कि जब-जब ठीक करना चाहा अपने स्वर को
बादल के साथ दरिया के साथ हाथ मिलाते हुए
ठीक उसी वक़्त ख़बर भेज दी जाती है
किसी पेड़ के काटने की
किसी आदमी को मारने की
किसी भेड़िए के चिल्लाने की
हद यह भी है कि मैं जब दोहराना चाहता हूँ प्रेम
चिड़ियाँ की भीड़ में तब मेरी आवाज़ खो जाती है
सोचो, अगर यह समय ऐसा ही चलता रहा
मंदी वाला मार-काट वाला छीन-झपट वाला
दुष्ट व्यक्तियों से भरा अश्लील शब्दों से भरा
आप घास खोजें कोई अंगार बिछा जाए
तब दोष किसके सिर डालेंगे आप
सुर के भागने का सच सभी जानते हैं
लेकिन व्यर्थ जाता है इस सच का सच
गोपन कुछ भी नहीं है न मेरा भय न मेरी घबड़ाहट
न मेरे लिए उसकी भर्त्सना निंदा और लांछन
तब भी दोष मुझे ही दिया जा रहा है
मेरे बिगड़े हुए सुर को लेकर।
शहंशाह आलम
भाप
समुद्र की भाप होकर गया पानी वापस लौट आता है
या जो रेत की भाप गई लौट आई बारिश बनकर
शब्द की भाप गई वह भी दिमाग़ को भेदती लौट आई
पछतावे की भाप गई फिर जूते के तल्ले के आगे दबी आकर
भाप बनकर गया लड़की का ख़्वाब अब नहीं लौटता चाहकर
दबे पाँव ख़्वाब जैसे लौट आता था घोड़ी पर सवार लड़का बनकर
असर कम हो गया है माँ की दुआओं का
तभी हत्यारा अपनी भीड़ में पाकर मार डालता है
आग की भाप के बीच राँगे का लेप चढ़ाते क़लईगर को
फिर भीड़ किसी तफ़तीश से पहले सारे सबूत मिटा चुकी होती है
कई बार मैं जीना चाहता था जिस तरह पेड़ जीते हैं
ऑक्सीजन की भाप पूरी पृथ्वी पर फैलाते हुए मगर
जीने कहाँ दिया जाता है बूँदाबाँदी के बीच गाना गाते
भाप तक कहाँ थी औरत की देह पर एक जोड़ी के सिवा
जिसको नोचा-खसोटा गया अपनी मिल्कियत समझकर
क्या चाँद पर भी पानी पत्थर से टकराकर भाप बनाता होगा
जैसे बना लेते हैं प्रेमी जोड़े एक-दूसरे की साँसों से भाप
जहाँ पर युद्ध होता होगा लंबा
वहाँ पर शर्तिया भाप बनती होगी
टैंक से छोड़े गए गोला-बारूद में से
गोला-बारूद से निकली हुई भाप बर्बर होती होगी मेरे राजा की तरह
और यह सच है जैसेकि भाप का बनना सच है इन दरियाओं के बीच।
मून वॉक
तुमने कहा चाँद पर चलना चाहती हो मेरी भाषा पकड़कर
वहाँ पर जानमाज़ बिछाकर नमाज़ पढ़ना चाहती हो
और दुआएँ करना चाहती हो नया छंद गढ़ते हुए
जैसेकि गायक गढ़ लेता है गाने का कोई नया तरीक़ा
या रुई धुनने की धुनकी से बादलों को जिस तरह
मैं नया करता रहता हूँ बारिश के साफ़ पानी के लिए
तुम मैल साफ़ करना चाहती हो चाँद की देह का
तुमको मालूम तो है न हमारे घर का रास्ता वही है
जो किसी कुम्हार का है या बढ़ई का है या लोहार का है
चाँद पर शाहरुख़ ख़ान जा सकते हैं काजोल जा सकती हैं
मैं और तुम मुंबई के समुद्रतट जा सकते हैं संगीत सुनते हुए
सुना है, वहाँ का समुद्र दिन में थोड़ा दूर चला जाता है
रात को फिर से किनारे के क़रीब आ जाता है शहर देखने
हमारे लिए तो लोकल ट्रेन की तरह सुख होते हैं
कभी ज़्यादा तेज़ चलते हुए और कभी एकदम धीमे
और कोई लोकल ट्रेन चाँद तक नहीं जाता आदमी की बाँह पकड़े
तुम कहो तो मैं लोहे की पटरियों पर मून वॉक करके दिखा सकता हूँ
जिस तरह माइकल जैक्सन अपने डांस में मून वॉक किया करते थे।
मैं क्या-क्या चुरा सकता हूँ
तुम मिट्टी चुरा लाओगे
हाँ, मैं चुरा लाऊँगा
तुम पानी चुरा लाओगे
हाँ, मैं चुरा लाऊँगा
तुम रोटी चुरा लाओगे
हाँ, मैं चुरा लाऊँगा
तुम क्या-क्या चुरा ला सकते हो
मैं तुम्हारे लिए नमक चुरा सकता हूँ
बीज शहद कपड़ा बर्तन चुरा सकता हूँ
उसकी नींद चुरा ला सकते हो मेरे लिए
जिसने मेरी रातों की नींद हराम कर रक्खी है
हाँ, मैं उसके दिल की धड़कनें तक चुरा सकता हूँ
मिट्टी तुम किस वास्ते चुरा लाओगे
तुम्हारे लिए एक महफ़ूज़ घर बनाने की ख़ातिर
पानी तुम किस वास्ते चुरा लाओगे
तुम्हारे होंठों की प्यास बुझाने की ख़ातिर
रोटी तुम किस वास्ते चुरा लाओगे
तुम्हारे पेट की भूख मिटाने की ख़ातिर
तुम नमक क्यों चुरा लाओगे
उन शैतानी आँखों में भर देने के लिए
जो तुम्हें तुम्हारे बचपन से डराती रही हैं
और बीज शहद कपड़ा बर्तन तुम क्यों चुराओगे
बीज डालकर तुम मरी हुई ज़मीन को ज़िंदा करोगी
शहद डालकर दरख़्त में आने वाले फल को मीठा
कपड़ों से तुम अपनी देह की हिफ़ाज़त करोगी
और बर्तन में मेरे लिए खाना डालोगी
आईना तो तुम भूल ही गए चिराग़ भी
चाँद तारे अंतरिक्ष भी चिड़ियाँ भी
नहीं जानेमन, जैसे आईना तुम मेरे लिए हो
वैसे ही मैं तुम्हारे लिए भी तो होऊँगा
चिराग़ तो फ़रिश्ते हमें लाकर ख़ुद देंगे
चाँद तारे सबके लिए रहने देंगे अंतरिक्ष में
जब घर बन जाएगा तुम्हारे लिए
जब दरख़्त उग आएँगे तुम्हारे गिर्दो-पेश
चिड़ियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद तुम्हारे कंधे आ बैठेंगी
अच्छा बताओ, तुम ये सबकुछ चुराकर ही क्यों लाओगे
जानेमन, मुल्क के बादशाह ने हमारे हिस्से की सारी चीज़ें
अपने हिस्से की कर रक्खी हैं ढिठाई से ज़ोर-ज़बरदस्ती से
बादशाह से लड़ने के लिए तुम्हारे पास
न घोड़े के न हाथी के चार पाँव हैं
न दरिया में कश्ती है तेज़ भागने वाली
जानेमन, बादशाह से डरकर भागना कौन चाहता है
मैंने आग बादशाह को हराने के लिए ही तो
छिपा रक्खी है उसकी नज़रों से बचाकर
आग तुमने कहाँ छिपाकर रक्खी है मुद्दतों से
आग मैंने बादशाह के खलिहान में छिपाकर रखी है
और खलिहान में मैंने नौकरी कर ली है तुम्हारे वास्ते।
हावड़ा ब्रिज
एक :
आसमान हमको बारिश देता है झमाझम
यह पुल हमको इस पार से उस पार होने का
रास्ता देता रहता है अपनापे से भरकर-भरकर
इस पुल से न जाने कितने कवि आए-गए होंगे
कॉमरेड भी कलाकार भी संगीतज्ञ भी मज़दूर भी
काम पर जाते हुए लोगबाग भी और ओहदेदार भी
कुछ अरसे बाद पहुँचा हूँ हावड़ा के इस पुल पर
यहाँ से अब भी गुज़रती हैं बसें और टैक्सियाँ
गुज़रता है पुल के नीचे से पानी वाला जहाज़
यहाँ से अब भी गुज़र रहे हैं कवि कलाकार मज़दूर
बस कॉमरेड साथी नहीं गुज़रते अब इस पुल से
यह पुल खड़ा है जस-का-तस मेरे अंतस् में तब भी।
दो :
पुल की रेलिंग को थामे मैं देखता हूँ हुगली नदी का पानी
वह बंगालन जो नहाकर फूल की तरह कोमल हुई जा रही है
उसको निहारता बढ़ जाता हूँ नारियल पानी बेचने वाले की तरफ़
मुझे लगा यह हावड़ा चौंसठ ख़ानों की बिसात पर बैठा हुआ है
पिलख़ाना वाली ख़ाला ने बताया कि कुछेक कॉमरेड बचे होंगे
बाक़ी सब शतरंज के अच्छे खिलाड़ी बनने के काम में लगे हुए हैं
और ये अच्छे खिलाड़ी किसी के लिए रोटी-पानी नहीं चाहते
हावड़ा को वियतनाम ज़रूर बनाना चाहते हैं युद्ध के दिनों वाला।
भाप
समुद्र की भाप होकर गया पानी वापस लौट आता है
या जो रेत की भाप गई लौट आई बारिश बनकर
शब्द की भाप गई वह भी दिमाग़ को भेदती लौट आई
पछतावे की भाप गई फिर जूते के तल्ले के आगे दबी आकर
भाप बनकर गया लड़की का ख़्वाब अब नहीं लौटता चाहकर
दबे पाँव ख़्वाब जैसे लौट आता था घोड़ी पर सवार लड़का बनकर
असर कम हो गया है माँ की दुआओं का
तभी हत्यारा अपनी भीड़ में पाकर मार डालता है
आग की भाप के बीच राँगे का लेप चढ़ाते क़लईगर को
फिर भीड़ किसी तफ़तीश से पहले सारे सबूत मिटा चुकी होती है
कई बार मैं जीना चाहता था जिस तरह पेड़ जीते हैं
ऑक्सीजन की भाप पूरी पृथ्वी पर फैलाते हुए मगर
जीने कहाँ दिया जाता है बूँदाबाँदी के बीच गाना गाते
भाप तक कहाँ थी औरत की देह पर एक जोड़ी के सिवा
जिसको नोचा-खसोटा गया अपनी मिल्कियत समझकर
क्या चाँद पर भी पानी पत्थर से टकराकर भाप बनाता होगा
जैसे बना लेते हैं प्रेमी जोड़े एक-दूसरे की साँसों से भाप
जहाँ पर युद्ध होता होगा लंबा
वहाँ पर शर्तिया भाप बनती होगी
टैंक से छोड़े गए गोला-बारूद में से
गोला-बारूद से निकली हुई भाप बर्बर होती होगी मेरे राजा की तरह
और यह सच है जैसेकि भाप का बनना सच है इन दरियाओं के बीच।
मून वॉक
तुमने कहा चाँद पर चलना चाहती हो मेरी भाषा पकड़कर
वहाँ पर जानमाज़ बिछाकर नमाज़ पढ़ना चाहती हो
और दुआएँ करना चाहती हो नया छंद गढ़ते हुए
जैसेकि गायक गढ़ लेता है गाने का कोई नया तरीक़ा
या रुई धुनने की धुनकी से बादलों को जिस तरह
मैं नया करता रहता हूँ बारिश के साफ़ पानी के लिए
तुम मैल साफ़ करना चाहती हो चाँद की देह का
तुमको मालूम तो है न हमारे घर का रास्ता वही है
जो किसी कुम्हार का है या बढ़ई का है या लोहार का है
चाँद पर शाहरुख़ ख़ान जा सकते हैं काजोल जा सकती हैं
मैं और तुम मुंबई के समुद्रतट जा सकते हैं संगीत सुनते हुए
सुना है, वहाँ का समुद्र दिन में थोड़ा दूर चला जाता है
रात को फिर से किनारे के क़रीब आ जाता है शहर देखने
हमारे लिए तो लोकल ट्रेन की तरह सुख होते हैं
कभी ज़्यादा तेज़ चलते हुए और कभी एकदम धीमे
और कोई लोकल ट्रेन चाँद तक नहीं जाता आदमी की बाँह पकड़े
तुम कहो तो मैं लोहे की पटरियों पर मून वॉक करके दिखा सकता हूँ
जिस तरह माइकल जैक्सन अपने डांस में मून वॉक किया करते थे।
मैं क्या-क्या चुरा सकता हूँ
तुम मिट्टी चुरा लाओगे
हाँ, मैं चुरा लाऊँगा
तुम पानी चुरा लाओगे
हाँ, मैं चुरा लाऊँगा
तुम रोटी चुरा लाओगे
हाँ, मैं चुरा लाऊँगा
तुम क्या-क्या चुरा ला सकते हो
मैं तुम्हारे लिए नमक चुरा सकता हूँ
बीज शहद कपड़ा बर्तन चुरा सकता हूँ
उसकी नींद चुरा ला सकते हो मेरे लिए
जिसने मेरी रातों की नींद हराम कर रक्खी है
हाँ, मैं उसके दिल की धड़कनें तक चुरा सकता हूँ
मिट्टी तुम किस वास्ते चुरा लाओगे
तुम्हारे लिए एक महफ़ूज़ घर बनाने की ख़ातिर
पानी तुम किस वास्ते चुरा लाओगे
तुम्हारे होंठों की प्यास बुझाने की ख़ातिर
रोटी तुम किस वास्ते चुरा लाओगे
तुम्हारे पेट की भूख मिटाने की ख़ातिर
तुम नमक क्यों चुरा लाओगे
उन शैतानी आँखों में भर देने के लिए
जो तुम्हें तुम्हारे बचपन से डराती रही हैं
और बीज शहद कपड़ा बर्तन तुम क्यों चुराओगे
बीज डालकर तुम मरी हुई ज़मीन को ज़िंदा करोगी
शहद डालकर दरख़्त में आने वाले फल को मीठा
कपड़ों से तुम अपनी देह की हिफ़ाज़त करोगी
और बर्तन में मेरे लिए खाना डालोगी
आईना तो तुम भूल ही गए चिराग़ भी
चाँद तारे अंतरिक्ष भी चिड़ियाँ भी
नहीं जानेमन, जैसे आईना तुम मेरे लिए हो
वैसे ही मैं तुम्हारे लिए भी तो होऊँगा
चिराग़ तो फ़रिश्ते हमें लाकर ख़ुद देंगे
चाँद तारे सबके लिए रहने देंगे अंतरिक्ष में
जब घर बन जाएगा तुम्हारे लिए
जब दरख़्त उग आएँगे तुम्हारे गिर्दो-पेश
चिड़ियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद तुम्हारे कंधे आ बैठेंगी
अच्छा बताओ, तुम ये सबकुछ चुराकर ही क्यों लाओगे
जानेमन, मुल्क के बादशाह ने हमारे हिस्से की सारी चीज़ें
अपने हिस्से की कर रक्खी हैं ढिठाई से ज़ोर-ज़बरदस्ती से
बादशाह से लड़ने के लिए तुम्हारे पास
न घोड़े के न हाथी के चार पाँव हैं
न दरिया में कश्ती है तेज़ भागने वाली
जानेमन, बादशाह से डरकर भागना कौन चाहता है
मैंने आग बादशाह को हराने के लिए ही तो
छिपा रक्खी है उसकी नज़रों से बचाकर
आग तुमने कहाँ छिपाकर रक्खी है मुद्दतों से
आग मैंने बादशाह के खलिहान में छिपाकर रखी है
और खलिहान में मैंने नौकरी कर ली है तुम्हारे वास्ते।
हावड़ा ब्रिज
एक :
आसमान हमको बारिश देता है झमाझम
यह पुल हमको इस पार से उस पार होने का
रास्ता देता रहता है अपनापे से भरकर-भरकर
इस पुल से न जाने कितने कवि आए-गए होंगे
कॉमरेड भी कलाकार भी संगीतज्ञ भी मज़दूर भी
काम पर जाते हुए लोगबाग भी और ओहदेदार भी
कुछ अरसे बाद पहुँचा हूँ हावड़ा के इस पुल पर
यहाँ से अब भी गुज़रती हैं बसें और टैक्सियाँ
गुज़रता है पुल के नीचे से पानी वाला जहाज़
यहाँ से अब भी गुज़र रहे हैं कवि कलाकार मज़दूर
बस कॉमरेड साथी नहीं गुज़रते अब इस पुल से
यह पुल खड़ा है जस-का-तस मेरे अंतस् में तब भी।
दो :
पुल की रेलिंग को थामे मैं देखता हूँ हुगली नदी का पानी
वह बंगालन जो नहाकर फूल की तरह कोमल हुई जा रही है
उसको निहारता बढ़ जाता हूँ नारियल पानी बेचने वाले की तरफ़
मुझे लगा यह हावड़ा चौंसठ ख़ानों की बिसात पर बैठा हुआ है
पिलख़ाना वाली ख़ाला ने बताया कि कुछेक कॉमरेड बचे होंगे
बाक़ी सब शतरंज के अच्छे खिलाड़ी बनने के काम में लगे हुए हैं
और ये अच्छे खिलाड़ी किसी के लिए रोटी-पानी नहीं चाहते
हावड़ा को वियतनाम ज़रूर बनाना चाहते हैं युद्ध के दिनों वाला।
- शहंशाह आलम
शहंशाह आलम
जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार। शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी)
प्रकाशन : 'गर दादी की कोई ख़बर आए', 'अभी शेष है पृथ्वी-राग', 'अच्छे दिनों में ऊँटनियों का कोरस', 'वितान', 'इस समय की पटकथा', 'थिरक रहा देह का पानी', ‘आग मुझमें कहाँ नहीं पाई जाती’ सात कविता-संग्रह तथा आलोचना की पहली किताब 'कवि का आलोचक' प्रकाशित। ‘ख़ानाबदोशी’ ( कविता-संग्रह ) तथा ‘कविता का धागा’ ( आलोचना ) शीघ्र प्रकाश्य। 'गर दादी की कोई ख़बर आए' कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। 'स्वर-एकादश' कविता-संकलन में कविताएँ संकलित। 'वितान' (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य। दूरदर्शन और आकाशवाणी से कविताओं का नियमित प्रसारण। हिंदी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। बातचीत, आलेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित। पटना दूरदर्शन के लिए आलोचक खगेंद्र ठाकुर, उपन्यासकार अब्दुस्समद, कथाकार शौकत हयात, साहित्यकार उद्भ्रांत, कवि प्रभात सरसिज, कवि मुकेश प्रत्यूष, कवि विमलेश त्रिपाठी आदि से बातचीत। पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार का राजभाषा विभाग, राष्ट्रभाषा परिषद पुरस्कार के अतिरिक्त 'कवि कन्हैया स्मृति सम्मान', ‘सव्यसाची सम्मान’, ‘हिंदी सेवी सम्मान’ सहित दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।
संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में कार्यरत।
संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पूरब वाले पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।
मोबाइल : 09835417537
ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com
प्रकाशन : 'गर दादी की कोई ख़बर आए', 'अभी शेष है पृथ्वी-राग', 'अच्छे दिनों में ऊँटनियों का कोरस', 'वितान', 'इस समय की पटकथा', 'थिरक रहा देह का पानी', ‘आग मुझमें कहाँ नहीं पाई जाती’ सात कविता-संग्रह तथा आलोचना की पहली किताब 'कवि का आलोचक' प्रकाशित। ‘ख़ानाबदोशी’ ( कविता-संग्रह ) तथा ‘कविता का धागा’ ( आलोचना ) शीघ्र प्रकाश्य। 'गर दादी की कोई ख़बर आए' कविता-संग्रह बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत। 'स्वर-एकादश' कविता-संकलन में कविताएँ संकलित। 'वितान' (कविता-संग्रह) पर पंजाबी विश्वविद्यालय की छात्रा जसलीन कौर द्वारा शोध-कार्य। दूरदर्शन और आकाशवाणी से कविताओं का नियमित प्रसारण। हिंदी की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। बातचीत, आलेख, अनुवाद, लघुकथा, चित्रांकन, समीक्षा भी प्रकाशित। पटना दूरदर्शन के लिए आलोचक खगेंद्र ठाकुर, उपन्यासकार अब्दुस्समद, कथाकार शौकत हयात, साहित्यकार उद्भ्रांत, कवि प्रभात सरसिज, कवि मुकेश प्रत्यूष, कवि विमलेश त्रिपाठी आदि से बातचीत। पुरस्कार/सम्मान : बिहार सरकार का राजभाषा विभाग, राष्ट्रभाषा परिषद पुरस्कार के अतिरिक्त 'कवि कन्हैया स्मृति सम्मान', ‘सव्यसाची सम्मान’, ‘हिंदी सेवी सम्मान’ सहित दर्जन भर से अधिक महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान मिले हैं।
संप्रति, बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में कार्यरत।
संपर्क : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पूरब वाले पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार।
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