एक
इन ग़रीबों के लिए घर कब बनेंगे
तोड़ दें शीशे, वो पत्थर कब बनेंगे

कब बनेंगे ख़्वाब जो के हो सकें सच
और चिड़ियों के लिए पर कब बनेंगे

बन गए सुंदर हमारे शहर तो सब
पर हमारे गाँव सुंदर कब बनेंगे

शर्म से झुकते हुए सर हैं हज़ारों 
गर्व से उठते हुए सर कब बनेंगे

योजनाओं को चलाने को तुम्हारे 
वो बड़े बंगले वो दफ़्तर कब बनेंगे

आज तो संजीदगी से बात की है 
अब ये सारे लोग जोकर कब बनेंगे

कब तलक कचरा रहेंगे बीनते यूं 
तुम कहो बच्चे ये अफ़सर कब बनेंगे


दो

कोई पानी नहीं रखता, कोई दाना नहीं रखता
मैं तेरी भूख के आगे, कोई खाना नहीं रखता

तुम्हारे कोसते रहने से दीवारें नहीं हिलतीं
तभी मैं भीड़ में लोगों का चिल्लाना नहीं रखता

मेरे भीतर की सारी आग बाहर से भी दिखती है
मैं अपने ख़ूब अंदर तक भी तहख़ाना नहीं रखता

मेरी ऊँची इमारत से नहीं है दोस्ती कोई
मैं इन कच्चे मकानों से भी याराना नहीं रखता

मुझे हारे हुए किरदार अब अच्छे नहीं लगते
तभी नाटक में उनका घाव सहलाना नहीं रखता

कहीं सूरज, कहीं बादल, कहीं चंदा, कहीं तारे
वो धरती के किसी कोने को वीराना नहीं रखता

तेरी-मेरी कहानी में जो फिर से लिख रहा हूँ मैं
तेरा आना तो रखता हूँ, तेरा जाना नहीं रखता

तुम्हें अब तो उदासी की ही धुन पर नाचना होगा
वो खुशियों से भरा कोई भी अब गाना नहीं रखता


तीन

ख़ज़ाने की हमें दौलत भले सारी दिखा देगा
अगर हक़ माँग लें तुझसे तो लाचारी दिखा देगा

छुपाकर तू हमेशा ही रखेगा ख़ुद की बेशर्मी
ज़माने को मगर हर रोज़ ख़ुद्दारी दिखा देगा

तेरा कोई बहाना जब नहीं चल पाएगा तो फिर
तेरा क्या है, तू माँ की फिर से बीमारी दिखा देगा

कहीं भी घूमने का मन अगर तेरा कभी होगा
तू अफ़सर है, वहाँ तू काम सरकारी दिखा देगा

अगर ये लोग पूछेंगे कि हिम्मत है कहाँ तेरी 
तू लड़ने की उन्हें हर बार तैयारी दिखा देगा

जो उसका काम है करना है उसको वो करेगा जब
तू उसका ख़ुद को विज्ञापन में आभारी दिखा देगा

तेरे इन आँकड़ों में है जो खुशहाली वो झूठी है 
कहूंगा मैं तो क्या तू भूख-बेकारी दिखा देगा


चार

फिर से हाथों में तुम्हारे हल तो हो 
रास्ते में फिर कोई जंगल तो हो

फिर से नदियों में रहे पानी ज़रा
और तालाबों में कुछ दलदल तो हो

सर छुपाने के लिए धरती है गर
भाग जाने के लिए मंगल तो हो

जंग हो तो देर तक जारी रहे 
पहलवानों में कभी दंगल तो हो

आज को जीने का कुछ मक़सद मिले 
सामने कोई सुहाना कल तो हो

जेब में अपनी क़लम रखता हूँ मैं 
जिससे मन में हौसला-सम्बल तो हो

सर्द रातों में न बाँटो आग पर 
बाँटने को हाथ में कंबल तो हो

बंद हों चाहे यहां सब खिड़कियाँ 
पर गली में एक सूखा नल तो हो

फिर से चिड़ियों को ज़रा डर तो लगे 
आसमां में फिर कोई हलचल तो हो


पाँच

अगर अच्छा नहीं है 
सफ़र अच्छा नहीं है

बहुत सहमे हुए हो 
ये डर अच्छा नहीं है

वहाँ रहते हो फिर क्यों 
जो घर अच्छा नहीं है

भले हैं लोग सारे 
शहर अच्छा नहीं है

नसीहत का तुम्हारी 
असर अच्छा नहीं है

वो अच्छा तो बहुत है 
मगर अच्छा नहीं है

झुका रहता है हरदम 
ये सर अच्छा नहीं है

फ़सल फिर से उगाओ 
ज़हर अच्छा नहीं है

डराता है तुम्हारा 
शहर अच्छा नहीं है

- राकेश जोशी

डॉ. राकेश जोशी

जन्म: 9 सितंबर 1970
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कुछ रचनाएँ आकाशवाणी से प्रसारित। एक काव्य-पुस्तिका 'कुछ बातें कविताओं में', दो ग़ज़ल संग्रह 'पत्थरों के शहर में' तथा 'वो अभी हारा नहीं है' प्रकाशित।
संप्रति: राजकीय महाविद्यालय, गढ़वाल (उत्तराखंड) में अंग्रेज़ी साहित्य के एसोसिएट प्रोफेसर। विविध भारती, मुम्बई में कुछ समय के लिए आकस्मिक उद्घोषक के तौर पर कार्य कर चुके हैं।
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ई-मेल: joshirpg@gmail.com