एक तुमने सुनी नहीं वो, सबको सुना रहा हूँ तुम पर लिखी ग़ज़ल थी, जो रोज़ गा रहा हूँ उसकी रदीफ़ भी थी, ये ध्यान ही नहीं था वो इक ग़ज़ल कि जिसका, मैं क़ाफिया …
पूरी रचना पढ़ें...एक इन ग़रीबों के लिए घर कब बनेंगे तोड़ दें शीशे, वो पत्थर कब बनेंगे कब बनेंगे ख़्वाब जो के हो सकें सच और चिड़ियों के लिए पर कब बनेंगे बन गए सुंदर हमारे …
पूरी रचना पढ़ें...एक मुझ पर है असर ख़ास बहुत ख़ास ग़ज़ल का मैं बन के रहूँगा ख़ुशी से दास ग़ज़ल का ये फ़ेर-बदल और ज़बानों की लड़ाई है कौन जिसे रङ्ग नहीं रास ग़ज़ल का मुमकिन है लहू …
पूरी रचना पढ़ें...१. कहीं से और ही लाया गया हूँ मैं हर इक बार ठुकराया गया हूँ हुआ है कत्ल मेरा ही यहाँ पर मगर कातिल भी मैं पाया गया हूँ मैं अपने शौक पूरे कर न पाया म…
पूरी रचना पढ़ें...1. उनको दुख के हमसे वो कहते ये कैसे हम ग़लत थे इसलिए पहले ही हमने कह दिया के हम ग़लत थे वो ख़फ़ा हैं जाने कब से, क्या पता किस बात पे हों फ़र्ज़ बनता …
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