सुकून

घर लौटने पर 
स्वागत में मेरे
खुलते हैं
दरवाजे के दोनों पल्ले

और
घर में प्रविष्ट होते ही 
बन्द हो जाते हैं
फिर से
दरवाजे के दोनों पल्ले

खुलते-बंद होते 
ये दरवाजे के पल्ले लगते हैं 
माँ की खुली और सिमटी बाँहों-से

वो जितने उत्साहित हैं 
भर लेने को
मुझे बांहों में

उतना ही उत्साहित होता हूँ 
मैं भी आने को
अपने घर
और 
माँ की बाँहों में

वाकई! 
माँ के आँचल
और 
घर की छत का अपना सुकून है।


सृजन

अंतस - भावों को 
कागज पर
न उतार पाने का दुःख
उतना ही है

जितना कि
गर्भवती स्त्री के 
शिशु की असमय मृत्यु के निमित्त
उसके अंक की रिक्तता

सच!
सृजन का असामयिक अंत 
सदैव विषादपूर्ण होता है।


कुलदीप सिंह भाटी

युवा रचनाकार। जोधपुर में निवास।
मोबाइल नम्बर: 9413461694