एक
हम उस पाखंड, अंधविश्वास से लिप्त
समाज में रहते हैं
जहाँ ईश्वर के दास को पूजा जाता है
ईश्वर की तरह
वहीं उसी समाज में जन्मा
तथाकथित जाति के 'दास' से
यह समाज अपने ईश्वर को
बचाता है अस्तित्वहीन, अछूत होने से
यह समाज किस सर्वशक्तिमान
ईश्वर को पूजता है
जो किसी दलित के छूते ही
शक्तिहीन हो जाता है
जो रजोधर्म में रहने वाली स्त्री
के छूते अछूत हो जाता है
अगर यह सच है
तो मैं जन्म से 'दास' को
और रजोधर्म में रहने वाली
उस स्त्री को उस ईश्वर से ऊँचा स्थान दूँगा
जिसके छूने मात्र से
वह ईश्वर अपनी शक्ति खो देता है
जिसे यह समाज पूजता है।
दो
मैं समानता को तब अर्थपूर्ण कहूँगा इस मुल्क़ में
जब तथाकथित अगरी जाति के लोग
दलितों को अपना
कुटुंब बनायेंगे
जब महिलाओं को सिर्फ़ संभोग की चीज़ न समझकर
उन्हें उनके अधिकार दिये जाएँगे
जब आदिवासियों को अजायबघर में रखी
अनोखी वस्तुओं की तरह संरक्षित न रखकर
उसे मुख्यधारा से जोड़ा जायेगा
जब देश का हर मासूम चिमनी पर ईंट ढोने के बजाय
ढोयेगा किताबों का बस्ता
जब किन्नरों का अभिवादन खुले दिल से
यह समाज ताली बजा कर करेगा
इससे पहले तक मैं समानता को
अर्थहीन शब्द कहता हूँ
जिसका इस्तेमाल सदियों से
इस मुल्क़ में मौजूद
असमानता की गहरी खाई को
ढकने के लिए किया जाता रहा है।
तीन
तुम जब अपने पोशाक पर
इत्र लगाकर
किसी किसान के
मैले, फटे कपड़े देख
अपनी नाक सिकोड़ते हो
शायद तुम उस वक्त
भूल जाते हो कि
तुम्हारे उस इत्र की
खुशबू में किसी किसान
के शरीर का गंध
शामिल है।
आनंद रॉय
राजनीति विज्ञान में एमए। गाँव- शिवकुण्ड, मुंगेर (बिहार) में निवास।



2 टिप्पणियाँ
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