एक

तुमने सुनी नहीं वो, सबको सुना रहा हूँ  
तुम पर लिखी ग़ज़ल थी, जो रोज़ गा रहा हूँ

उसकी रदीफ़ भी थी, ये ध्यान ही नहीं था
वो इक ग़ज़ल कि जिसका, मैं क़ाफिया रहा हूँ

जब से कटी है मेरी, जड़ प्रेम की ओ जानम  
मैं वो शजर जो तब से, अब तक हरा रहा हूँ

पाकर जिसे ज़माना, इतरा रहा है ख़ुद पर  
मैं उस ख़ुशी का अब तक, मातम मना रहा हूँ

दुनिया से हूँ ख़फ़ा तो, हैरत करो हो क्यूँकर  
मैं एक वक़्त तक तो, ख़ुद से ख़फ़ा रहा हूँ

कितनों को ख़्वाब तक भी, मेरा नहीं मयस्सर  
ख़ुशियाँ मनाओ तेरे, ख़्वाबों में आ रहा हूँ

मुद्दत से कह रहे हैं, सब जिसको ख़ूबसूरत  
मुद्दत से उस बला से, पीछा छुड़ा रहा हूँ


दो
  
नशा अगर न रहा उस पे उम्रभर साकी  
तो फिर फ़ुज़ूल है उस पर तेरी नज़र साकी

वही है आज भी मुझको अज़ीज़तर साकी  
जिसे ज़रा सी भी मेरी नहीं ख़बर साकी

कोई लगाए गले मुझ को इस क़दर साकी  
कि कर दे सारे ज़माने से बेख़बर साकी

ये कैसे लोग बुलाये हैं तुम ने महफ़िल में  
जिन्हें बहकने का बिल्कुल नहीं हुनर साकी

न उंगलियों का मेरी सिह्र रह सका क़ायम  
किसी की जुल्फों का क़ायम रहा असर साकी

न जाने मौत की आग़ोश होगी कब हासिल  
न जाने होगी कब इस जीस्त की सहर साकी

किसी के होने लगे हैं कमाल के अशआर  
किसी को आया है रोने का अब हुनर साकी

हमारी नींद का हमको ज़रा मलाल नहीं  
मलाल ये हैं हुए ख़्वाब दर-ब-दर साकी

हमारी आँखों में अब जो बचा है, वहशत है  
ख़ुमार-ए-इश्क़ तो कब का गया उतर साकी


तीन

खिलते हुए गुलाब से आगे की चीज़ है  
वो हुस्न, माहताब से आगे की चीज़ है

अब भी उसे हम अपनी ग़ज़ल में न ला सके  
अब भी वो इंतिख़ाब से आगे की चीज़ है

कोई भी इसमें आज तलक हो सका न पास  
ये इश्क़! हर निसाब से आगे की चीज़ है

जाता नहीं ख़ुमार फिर इसका तमाम उम्र  
बोसा-ए-लब, शराब से आगे की चीज़ है

शाइर नया है तो इसे कमतर न जानिए  
ये जुगनू, आफ़ताब से आगे की चीज़ है

नज़रों में आज सबकी अगर हूँ मैं लाजवाब  
तो फिर वो लाजवाब से आगे की चीज़ है


चार

सिवाय इसके जहान भर में, मेरा बुरा कुछ हुआ नहीं है  
बस एक दुःख है कि अब तू मेरा, किसी भी सूरत बचा नहीं है

मुझे पता है कि मेरी ख़ातिर, ये छोटा-सा मसअला नहीं है  
कि कुछ दिनों से किसी भी तौर अब, कोई भी मुझ से ख़फ़ा नहीं है

मेरी ग़ज़ल में है हुस्न किसका, या कौन जान-ए-ग़ज़ल है मेरी  
ज़माने भर को ख़बर है सबकुछ, बस एक उसको पता नहीं है

गुजर रही है मियाँ तुम्हारी, विसाल जैसी ये हिज्र भी गर  
तो इससे बढ़कर कोई भी मुमकिन, मुहब्बतों में सज़ा नहीं है

कोई करे चाहे जितनी नफ़रत, तुम आख़िरी दम तक इश्क़ करना  
मैं जानता हूँ ख़ुदा का मुझ पर, ये हुक़्म है मशवरा नहीं है

ख़िज़ाँ का मौसम ही है मुसलसल, हमारे हिस्से तो इक सदी से  
वो चाँद-चेहरा दिखा नहीं है, ये फूल अब तक खिला नहीं है

हज़ार रातें तबाह करके, सुख़न के फ़न को किया हूँ हासिल  
यहाँ मैं पंहुचा हूँ अपने दम पर, कि इसमें कुछ मोजज़ा नहीं है

कभी 'दिवाकर' ये मत समझना, कि याँ से राहत चले गए हैं  
हुई है थोड़ी-सी रोशनी कम, चराग़ लेकिन बुझा नहीं है।


दिवाकर दिव्यंक

युवा शाइर। समस्तीपुर, बिहार में निवास।