अजीब बात

मैं सुना रहा हूँ
तुम्हारे कान बन्द हैं!

मैं दिखा रहा हूँ
तुम किये जा रहे अनदेखी!

मैं हाँफ रहा हूँ
तुम्हें आ रही हँसी!

मैं पिस रहा हूँ
तुम पीसने वालों के साथ हो!

कितनी अजीब बात है
फिर भी कह रहे तुम-
'मैं तुम्हारे साथ हूँ।'


फिर से अकेले

हम रोज जिनसे मिलते, दुनिया भर की बतियाते
फिर भी किसी के अन्दर कभी नहीं झाँकते।

हम घंटों आपस में देश-दुनिया की बात करते हैं
हम अपने अनुपस्थित दोस्तों की शिकायतें करते हैं
हम फिल्म, क्रिकेट और विश्वसुन्दरियों की बात करते हैं
हम राजनीति में ऊँचे कद के बेईमान चेहरों की शिनाख्त करते हैं
हम हर सामयिक घटनाओं पर टिप्पणियों करते हैं और
इन सारी चर्चाओं के दरम्यान
कभी हँसते, मुस्कुराते और ठहाके लगाते
तो कभी गुस्से और खीझ से उत्तेजित होते और
कभी गमगीन, उदास और हताश भी हो जाते हैं
और फिर बगैर किसी निष्कर्ष पहुँचे रोज की तरह
हम अपने गंतव्यों की ओर विदा होते हैं
विदा होते हैं हम अपने अंधेरों की ओर
हम में से कोई नहीं पूछता किसी से भी कभी
सिवाय कुछ औपचारिक जुमलों के, उसका आन्तरित हाल!

एक क्षणिक तोष के बाद
अपने अंधेरों से संघर्ष के लिए होते हम
फिर से अकेले!


ये कैसी चली है हवा

दिख रहा जो दृश्य सामने
नहीं है वह ठीक वैसा ही
जैसा कि पड़ रहा दिखाई

प्रायोजित है यह दृश्य
सजाया गया है आकर्षक अंदाज में ऐसा कि
लगता सबको मोहक-मनभावन

जमा हो रही भीड़
बेतहाशा दौड़ रहे
उधर ही लोग-

इस चकाचौंध के पीछे
छिप रही वे तमाम चीजें
जिनसे रिश्ता था हमारा
बहुत गहरा

ये कैसी चली है हवा इन दिनों कि
जिनकी जड़े नहीं, पनप रहे
और
जिनकी धँसी थी बहुत गहरी,
उखड़ रहे!


बदल दिये हमने

अब भी है कायम
धरती, आकाश, समुद्र,
सूर्य, चाँद, सितारे
ग्रह और नक्षत्र भी हैं ज्यों के त्यों

अब भी खिलते हैं फूल
तितलियों का आवागमन
भौरों का कलियों से मिलन
चहचहाते पंछियों का गुंजन
जारी है पूर्ववत्

उगती-कटती फसलें
अब भी समय पर
नहीं बदले
नमक और चीनी के स्वाद

बावजूद इसके हमारे ही सामने
बदल गईं बहुत सारी चीजें आज
मसलन
बदले गाँवों के चौपाल
संबंधों के अर्थ
रस्म और रीति-रिवाज
बदल गई धर्मों की व्याख्यायें!

खुदगर्जी का ये कैसा आ गया हाहाकार भरा समय
कि अपनी सुविधा के लिए
बदल दिये हमने
शब्दों के भी अर्थ!


ख़बरों की दुनिया में

ख़बरों की दुनिया में
कोई भी ख़बर
महज एक ख़बर होती है
चाहे जैसी भी हो
वह ख़बर

ख़बरों की दुनियां में
हर ख़बर एक जिंस है
बाज़ार की मांग के अनुसार
सजाई जाती है यहाँ
हर ख़बर

ख़बरों की दुनियां में
कोई मोल नहीं संवेदना का
तुम्हारी पीड़ाओं-यातनाओं की कथा
बना दी जाती है सनसनीखेज
जिसे ले-ले कर चटखारे
सुनते-सुनाते हैं लोग
और भूल जाते हैं फिर

ख़बरों की दुनियां में
छाये रहते भेड़िये
छायी रहती हैं
खूबसूरत जिस्मों की मलिकाएँ
छाये रहते हैं
सपनों की दुनिया के नकली राजकुमार
ताकि उन्हें दखो
और भूल जाओ अपनी पीड़ा
और भूल जाओ उस इरादे को भी
जो बनता जा रहा था खतरनाक-
उनके तिलस्म के लिए!


देवता कहलाता है

समुद्र मंथन के बाद
आया
सिर्फ देवताओं के हिस्से
अमृत-कलश
जबकि मथा मिलकर समुद्र
देव-दानव दोनों ने

दानवों
अर्थात् नादानों ने
सहे कष्ट सबसे अधिक
फिर भी गये छले
रहे वंचित वे ही
अमृत-बूंद से!

षडयंत्रकर्ता
विश्वासहंता
तबसे ही
राज करता
सुख भोगता
और पूजित होता है
देवता कहलाता है!


वही बोलता होगा सच

सच नहीं होता वह
जो बोलता हूँ मैं
और वह भी नहीं होता सच
जो बोलते हो तुम

जानता हूँ
आसान नहीं है बोल पाना
या कि सुन पाना
सच

हमारी फेहरिस्तों में
जबकि गले-गले तक शामिल हो
आयातित कम्पनियों के लुभावने विज्ञापन
आराम तलबी के नये-नये आविष्कृत
साधनों की जुगाड़ की चिंता
होना ही पड़ेगा निर्वासित
सच को

हाँ, इस नाजुक समय में
वही बोलता होगा सच
जिसके पास होगा
अपना जमीर
या नहीं तो होगा वह
सचमुच कोई फकीर!


चिंता

जब मैं
जागता
सोते
लोग निश्चिंत
जब मैं
सोता
जाग रहा होता
तब भी नींद में!


ऐसे ही फैलता है

तुम्हारी दिनचर्या में
तुम्हारे अनचाहे ही एक दिन अचनाक
हो जातीं शामिल वे ही चीजें
जिन्हें नहीं चाहा फटकनें देना कभी अपने पास!

किन गलियों-पगडंडियों-रास्तों से हो कर
पहुँचती वे तुम्हारे करीब
हो जाते देख कर यह हैरान

तुम जान रहे होते मोहकता के पीछे छुपे
उनके खूंखार इरादों की असलियत

तुम ढूंढते जब तक उनसे पीछा छुड़ाने के उपाय-
तुम्हारे अपनों पर करके सम्मोहन का वार
हो चुके होते उनके कंधो पर सवार

उनके रग-रेशों से बनाते रास्ते
हो जाते दाखिल तुम्हारे घर के अंदर!

घिरे हो जिस तंत्र से तुम
उसमें रखना ही पड़ता है
अपनों की इच्छाओं का ख्याल

तुम हो जाते ध्वस्त
ऐसे ही फैलता है उनका सम्राज्य!


बच्चा

बहुत शैतान है
बहुत हठी है
जिसके लिए करो मना
उसी के लिए
अड़ता है बच्चा!

उसे नहीं मालूम
कि टॉफियाँ
उसके लिए नहीं है
कि खिलौने
अय्याशी की चीज है
कि रेशम-सा मुलायम-गुदगुदा
नहीं है वह

रात पाली में खटता उसका बाप
महीने का पूरा
राशन नहीं जुटा सकता
कपड़े
नहीं जुटा सकता
किताब-कॉपी
नहीं जुटा सकता

फिर भी मचले वह
मिठाई को
टॉफी को
खिलौने को
बेपर्दा
बेपानी करने करने को
कितना शैतान
कितना हठी है बच्चा!


सोच का रंग

तुम्हारे चेहरे के
पीलेपन को देख कर
मेरी सोच का रंग
लाल हो गया है

मैं जानता हूँ
तुम्हारे खोये
हरेपन की वापसी के लिए
अब श्वेत की नहीं
लाल की ही जरूरत है।


जीने के लिए

कितना कुछ है यहाँ
जीने के लिए

कुछ सपने
जिसके पूरे होने के
सुखद इंतजार में
कटे एक-एक पल
भले ही हो वह
एक लम्बा इन्तजार

कुछ वायदे
जिनको निभाने में
गुजर जाये वक्त की नदी का
चाहे जितना पानी
लेकिन बनी रहे चाहत
उनके पूरे होने की

सुख का एक क्षण
जिसे रखा जा सके सहेज कर
मन के किसी सुरक्षित कोने में
ताकि आये वह काम
बुरे दिनों में
किसी मरहम की तरह

कोई करे इन्तजार
दिल की धड़कन की तरह
दिलाये एहसास
अपने जीवित होने का
भटक-भटक कर
जहाँ वापस जाने का करे मन
किसी बावरे की तरह

हाँ, बहुत है इतना भी
जिन्दा रहने के लिए!


चिंता तो होगी...

व्यक्ति के केन्द्र में
जब जमाने लगे जड़
स्वार्थपरता
सत्ता के केन्द्र में
जब आने लगे
अवसरवादिता
बहसों के केन्द्र से
जब छिटक कर आदमी की चिन्ताएं
काबिज होने लगे बाजार-
चिन्ता तो होगी ही

जन जब छूटने लगे
अहं जब जुटने लगे
विध्वंस की गूंज
जब करने लगे भंग सन्नाटा
और नहीं रेंगे उनके कानों पर जरा भी जूँ
चिन्ता तो होगी ही

सभ्यता और संस्कृति
धर्म और दर्शन
जब लगने लगे बेमानी
नैतिकता और मूल्य
जब होने लगे बेमानी
भाषा और विचार
करने लगे मनमानी'
चिंता तो होगी ही

दरअसल
इस जटिल दौर की चिंता के केन्द्र में
होना चाहिए जिसे शामिल
भोगने को निर्वासन की यंत्रणा
हो वहीं अभिशप्त-
चिंता तो होगी ही!


सोचना जरूर

अगर मिले कभी वक्त
तो सोचना जरूर

सोचना
कि क्यों होता जा रहा पृथ्वी का रंग
बदरंग नित
कि कौन सोखता जा रहा है
उसका हरापन

सोचना
कि क्यों होने लगे हैं निष्काषित
आसमान से परिन्दे
कि क्यों उनकी जगह घेरने लगे है
बमवर्षक विध्वंसक युद्धपोतीयान

सोचना
कि क्यों घुलने लगा है
हवा में ऐसा जहर
कि मरती जा रही है धीरे-धीरे
आदमी के भीतर की संवेदना

मिले अगर वक्त कभी
तो सोचना जरूर


जरूरत की कड़ी

नहीं करता किसी के लिए कोई कुछ
करते सभी खुद के लिए
जरूरत कड़ी है एक ऐसी
जो जोड़ देती है
एक दूसरे को।


मैं खुश हूँ

मेरे साथ
न चल सके कोई दूसरा
मेरा जमीर रहे मेरे साथ-
मैं खुश हूँ

मेरे साथ
हो अगर नाइंसाफी
खिलाफ उसके
उठे एक भी आवाज
मैं खुश हूँ

मेरे साथ
आज है सिर्फ एक
कल को होंगे कई
पुख्ता हो यह विश्वास
मैं खुश हूँ।


ज़रूरत भर

अच्छा लगता है
रोटी पर नमक
ज़रूरत भर

अच्छा लगता है
बोल में मिठास
ज़रूरत भर

अच्छा लगता है
संग-साथ
ज़रूरत भर

अच्छा लगा है
हर कुछ
ज़रूरत भर

किसी के हिस्से
नहीं आएगा दुख
ले अगर सब
सिर्फ ज़रूरत भर!


मेरे लिए कविता

कोई शगल, कोई शौक नहीं
चाहत भी नहीं नाम-यश की
हृदय की संवेदना को
चुभता है जब कोई शूल
और होने लगती है व्यथा-
मर्म को भेद
शब्दों में फूटती है तब कविता

जीवन-यात्रा के कठिन पथ पर
चलते जब पथिक
रोकने को राह
खड़े होते जो बन बाधा
खिलाफ उनके
छेड़ने की जंग-
सेनापति की तरह
साथ होती है तब कविता

व्यथा और घुटन
शोषण और उत्पीड़न
लेते जिन कारणों से जन्म
कारक तत्वों के विरूद्ध-
विद्रोह का परचम उठाये
तन कर खड़ी होती है तब कविता!


निशाने पर अब

उनकी जेब में है दुनिया
हम दुनिया में हैं,

उनको है अधिकार, करे चाहे जो
हमपर लगी है पाबंदियाँ!

उनके ठेंगे पर है हर कायदा
हम घूम रहे लेकर कायदे की किताब!

उनके कदमों में है हर ऊँचाई
हमारी झुक गई है गर्दन!

उनको है फ़ख्र खुद पर
हमारे निशाने पर है अब उनका फ़ख्र!


रच रहा हूँ मैं कविता

आज
जबकि होने लगी हैं प्रदूषित
बहुत सारी चीजें,
बचाना चाहता हूँ मैं
आगामी नस्लों के लिए
सारी अच्छी चीजें

मसलन
बचाना चाहता हूँ मैं
मिट्टी की ऊर्वरता
हवा की स्वच्छता
जल की शुद्धता
आकाश की नीलिमा

बचाना चाहता हूँ मैं
सभ्यता के चमकीले पृष्ठ
धर्मों के मूलार्थ
संगीत के सातों स्वर
भाषा की सहजता

बचाना चाहता हूँ मैं
रिश्तों की मधुरता
चिड़ियों की चहचहाहट
जुड़ों में खुँसे फूल
चेहरों की मुस्कान

प्रदूषणों से भरे ऐसे समय में
जबकि दिख रहा हर ओर
एक भयानक सघन अंधेरा-
हारा नहीं हूँ अभी
रच रहा हूँ मैं कविता।

- सदानंद सुमन


सदानंद सुमन

कुशल कवि एवं संपादक। रानीगंज, अररिया (बिहार) में निवास। जन्म : 29 जून 1949
हिंदी की विभिन्न स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कविताकोश पर कुछ प्रतिनिधि कविताएँ उपलब्ध हैं। फणीश्वरनाथ रेणु सम्मान से सम्मानित।
सदानंद सुमन को मुख्यतः 'सरोकार' पत्रिका के संपादक के तौर पर जाना जाता है। वे बिहार के एक छोटे-से कस्बे रानीगंज से सरोकार नामक पत्रिका निकालते थे। इस पत्रिका के संपादक, प्रकाशक, प्रबंधक सब कुछ वे ख़ुद थे। अर्थाभाव की वजह से कुछ अंक ही निकाल पाए मगर जितने ही अंक निकले, वे साहित्य की दृष्टि में स्तरीय एवं उच्च कोटि की रचनाओं से पूर्ण थे।
मोबाइल नंबर - +9174884 95573