एक

मैं कवि न होते हुए भी
लिख रहा हूँ कविता!

यह कवि बनने की चेष्टा नहीं
ख़ुदक़ुशी से बचने का उपाय है।


दो

मेरी कविताएं
लड़कियों को रिझाने का साधन नहीं
बल्कि उनको उनके हक़ों की प्राप्ति हेतु
आवश्यक सामर्थ्य प्रदान करने की चेष्टा है।


तीन

मैं भलीभाँति परिचित हूँ
छप सकने वाली कविताओं के विषयों से
लेकिन मैं नहीं चुनूंगा ऐसे विषय
जो समाज में फैली दुर्गंध को
हटाने का सामर्थ्य खो चुके हों।


चार

जो व्यक्ति को विचार करने हेतु
न कर सके विवश
जो हिम्मत न कर सके
सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करने की
जो सदैव दण्डवत् रहे
राजनीतिक पैरों के सम्मुख
मेरे लिए ऐसी कविताएं
महत्वहीन और त्याग देने योग्य हैं।


पाँच

भय में लिखी गई कविता
कविता नहीं,
अप्रत्यक्ष चाटुकारिता है।


छह

"जैसा चलता है.. चलने दो!"
यह कहने वाला व्यक्ति
या तो बहुत अधिक संपन्न है
या मरी हुई आत्मा को ढोती
एक सड़ी हुई लाश।


सात

कविता के बोल
यदि न कर सके आसमान में गर्जन,
भूमि को हिलाकर
यदि न कर सके समतल,
जल धारा को
यदि न पहुँचा सके प्यासे कंठ तक,
रोशनी तक
यदि न पहुँचा सके अंधेरे कमरे का पता
तो ऐसे बोल उगलने के नहीं
निगलने के योग्य है।


आठ

मैंने कविताओं को
अमीरों की घड़ी नहीं
मजदूरों का हथोड़ा लिखा।
जो समय आने पर
अपनी मजबूरियों पर भीषण प्रहार करके
उन्हें आकार दे सके घातक हथियार का।


नौ

मैं किसी के पैरों की जूती नहीं
और न ही ताज किसी के सर का;
किसान का बेटा हूँ
जानता हूँ 'फसल बोने' और 'काटने' का सही समय।


दस

हे कवि!
तुमने कविताओं की शक्ति का
नहीं किया सही आंकलन
यह छपने योग्य सामग्री नहीं,
प्रेमिका को भेंट में देने योग्य उपहार नहीं,
राजनेताओं के पैरों को धोने का जल नहीं,
और मनोरंजन का साधन तो क़तई नहीं;
यह तो वह शक्ति है
जो निगल सकती है सूर्य को
और पहुँचा सकती है उसे पाताल में
ताकि मिटाया जा सके
उस निःसहाय के हृदय में घर कर चुके
शताब्दियों पुराने अंधेरे को।


पवन सैन 'मासूम'

युवा रचनाकार। राजस्थान के प्रतिष्ठित समाचार-पत्र 'राजस्थान पत्रिका' में कविता और लघुकथाएं प्रकाशित। इतिहास विषय में परास्नातक (एम.ए. इतिहास), वर्तमान में शिक्षा में स्नातक (बी.एड.) द्वितीय वर्ष का विद्यार्थी।
पता- गाँव एवं डाकघर- महियाँवाली,
जिला- श्रीगंगानगर, राजस्थान।
पिन कोड- 335002
 ईमेल- writerpsmasoom@gmail.com