मेरे हिस्से की दुनिया हो तुम
मैं तुम्हारे हिस्से की
किस्मत का दाग
तुम मुझसे महल की अपेक्षा
करती हो
मगर मेरी वसीयत में इतनी रकम है
कि मैं बस
तुम्हारे लिए
एक जोड़ी
बिंदी का पत्ता खरीद सकता हूँ
मैं मेरी वसीयत में भी
चेखव की कविताओं-कहानियों से अलग
शायद ना जोड़ पाऊँ
एक सौ सत्तर रुपये भी
तुम दुनिया भर की यात्रा करना
चाहती हो
मैं किसी दूसरे देश की यात्रा
पर नहीं गया
मुझे ये भी नहीं पता अश्गाबात
और टोक्यो समान दिशाओं में हैं या
अलग-अलग में
मेरे घर में एक कमरा है
जिसके दराज में
किताब
कलम
खाली कागज
और मेरी रद्दी-सी कविताएँ हैं
इन्हें बेचकर तुम अपने लिए बिंदी से ज्यादा
कुछ खरीद सको तो ले लो
मगर इन्हें बेचने के साथ
मेरा ये दावा खारिज हो जागा कि
मैं चारों दिशाएँ
आठो पहर
तुम्हारी उन हथेलियों के बीचोंबीच
रख सकता हूँ
जिनका स्पर्श किसी
महंगे शहर
उँचे महल
से कहीं ज्यादा है।
इतना बचाए रखूँगा
विश्वास है मुझे
मैं तुम्हें इतना तो
बचाए रखूँगा अपने भीतर
जितना एक
छोटा बच्चा बचाए रखता है
गुल्लक में चिल्लर
बिना ये जाने कि
वो इनसे क्या काम लेगा!
विश्वास है मुझे
मैं तुम्हें इतना तो
बचाए रखूँगा अपने भीतर
जितना एक
छोटा बच्चा बचाए रखता है
गुल्लक में चिल्लर
बिना ये जाने कि
वो इनसे क्या काम लेगा!
आजतक प्रेम से ईर्ष्या नहीं हो पायी
प्रेम दोबारा नहीं हो सकता
यह दुनिया में फैलाया गया सबसे
वाहियात झूठ है
एक प्रेम हारने के बाद
एक लड़की से मिला मैं
मैंने नहीं देखा उसे कभी
ना उसने
शुरुआत में महीने भर हमने एक दूसरे को
बिना देखे बात की और दुःख बांटे
हिज़्र के बुरे दिन काटने में
वो साथ रही
वो बिना जान-पहचान की लड़की थी
लेकिन जब मैं गुस्से में होता तो
उसे भी भला-बुरा कहता
वो बदले में हौले से मुस्काती और बोलती
तुम बहुत अच्छे हो
अपने बारे में पूछने पर बताती थी
मुझमें बताने लायक कुछ भी नहीं है
जबकि बताने लायक उसमें समंदर रहता था
उसने मुझे जगह दी
अपने आसपास कहीं पर
शरणार्थी की तरह
जिसे देश निकाला दिया गया हो
उसने बताया मुझे
जो प्रेम करता है वो दुनिया का सबसे
पवित्र मनुष्य है
वो लड़की मुझसे तू कहकर बोलने में
हिचकिचाती है
मेरे साथ उतनी ही उदास हो जाती है
जितना मैं होता हूँ
मेरे रोने पे साथ नहीं रोती
खामोशी से रोना सुनती है और कहती है
जब तक ऐसे ही रोते रहोगे तो
मेरा कंधा हमेशा तुम्हारे लिए तैयार रहेगा
तुम्हारा माथा मेरे कंधे पर बोझ नहीं बन सकता
लेकिन उसे उम्मीद है कि
एक दिन मैं रोना बंद कर दूँगा हमेशा के लिए
उसने कहा है वो कभी भी चली जाएगी
वो दिन शायद दुनिया का सबसे बुरा दिन हो
लेकिन उसी ने समझाया
जब तक साथ हो तब तक खूब प्रेम करो
विदा लो तो ऐसे कि
सब कहें किसी ने दूसरे के साथ छल नहीं किया
बस ना मिल पाने की असमर्थताओं के कारण
एक दूसरे से विदा ले ली
दोबारा प्रेम होना
सबसे बड़ा वाहियात झूठ नहीं है
दुनिया की उन सुंदरतम घटनाओं में से एक है
जिनके कारण आज तक प्रेम से
ईर्ष्या नहीं हो पाई।
मैं इतना ऊँचा कभी नहीं बन पाऊँगा
वह नौवीं में थी
मैं दसवीं में
हमारी कक्षा साथ
लगती थी
वह उद्दंड थी
सारी चीख-पुकार
सर पर उठाए रखती थी
मुझे नहीं पता
मैं जवान था या नहीं
मैं यह भी भूल जाता था
मुझे सत्रह का पहाड़ा सत्रह बार में भी याद नहीं हुआ
मगर इतना याद रहा
उसका रोल नम्बर छह था
और मेरा आठ
हमारे बीच एक लड़के
का फासला था
जो आज भी बरकरार है
वह अक्सर पूछा करती
छोड़कर तो नहीं चले जाओगे
लेकिन फिर भी बक-बक करती रहती
मैं कहता
इस मोहब्बत के हकदार बस हम हैं
वह निश्चिंत हो जाती
और बोलती तुम इतने उंचे बनो
दुनिया की सब बाधाओं को हटा दो
एक दिन वह रुआंसी थी
मैंने पूछा छोड़कर तो नहीं जाओगी
कक्षा की सबसे उद्दंड लड़की
आज मौन थी
उसने मेरे हाथ में पायल रखी
और बोली -
'मैं बस तुम्हारी हूं
लेकिन अपना ख्याल रखना
और
तुम इतने उंचे बनो कि तुम्हारे आड़े आने वाली दुनिया की सब बाधाओं को हटा दो'
हम दोनों मौन थे
हम दोनों जानते थे
मैं इतना उंचा कभी नहीं बन पाऊंगा
कि
छह और आठ के बीच से
सात को हटा दूं!
तुन्हें जाने में बरसों लगेंगे
उस दिन जब तुमने कहा -
'मेरी शादी है'
मुझमें गुस्सा भर आया
फिर तुमने कहा हमारे पास
इतना समय बाकी है
इस बात ने मुझमें प्रेम का
भाव भर दिया
मैं तुमसे ज्यादा प्रेम करने लगा
मुझे अहसास हुआ कहने भर से
नहीं जा पाओगी
तुम्हें जाने में बरसों लगेंगे!
एक दिन मिलेंगे हम दोनों
देखना
एक दिन मिलेंगे हम दोनों
ज़रुर मिलेंगे..
इतना बोलकर हम
अलग हो गए!
एक-दूसरे को याद करके
बिछड़ते वक्त
हमने वादा किया कि
एक-दूसरे को याद कर के रोएंगे
विडंबना यह रही कि
हालात पर रोना आया
एक-दूसरे को याद कर के बस
हम प्रेम कर पाए।
मैंने उस लड़की से इश्क़ किया
मैंने इश्क किया
उस लड़की से
जिसे प्रेम की बिल्कुल तहजीब नहीं थी
रो पड़ती थी बस इतनी-सी बात पर
कि उसके गांव में मेरे नाम के किसी
लड़के की शादी हो गयी
हंँस पड़ती थी बस इतनी-सी बात पर
कि आज उसकी बाली कल वाली से ज़्यादा खूबसूरत है
और माँ की बिंदी उसके माथे पर बड़ी नहीं लगती
खुश हो जाती थी बस इतनी-सी बात पर
कि उसने मुझे तीन बार फोन किया और
मैंने तीनों बार उठाया
और चहक कर बताती थी
आज उसका दुपट्टा सर से एक बार भी
नहीं सरका
मैंने इश्क़ किया
उस लड़की से जिसे तमीज़ नहीं थी
तहज़ीब नहीं थी
जो रात को सोते वक्त भी
कपड़े उघड़ने का ख्याल रखती थी
जो मंदिर में प्रेमी की तरफ देखना भी
भगवान का अनादर समझती थी
कहती -
'मंदीर में ये शोभा नहीं देता'
मैंने इश्क़ किया उस लड़की से
जिसे पसंद था
फिल्मों से ज़्यादा मुझे देखना
और एक बार देखकर हफ्तों तक
खुशी से इंतज़ार करना अगली बार देखने का
जो उतावली रहती थी
यह बताने को कि
आज उसने कल से एक रोटी ज़्यादा खाई
इसलिए आज उसका पेट फूल कर ऐसा हो गया
जैसे पाँचवाँ महीना हो
मैंने इश्क़ किया
उस अल्हड़ लड़की से
जो किसी के पैरों की आवाज सुनकर
फोन काट देती थी
वो अल्हड़ लड़की जिसने
माँ की मार खाई और पिता का तिरस्कार
फिर भी निभाती रही मुहब्बत
करती रही इश्क़ बेहद, बेहिसाब, बेबाक
बिना तहज़ीब के
फिर अचानक बदल गई
और रुआंसी होकर एक दिन बोली
'जी सको तो जी लो
मर जाओ तो बेहतर होगा
ये दुनिया प्रेम के लायक बिल्कुल नहीं है'
चली गयी बिना हाल बताए
बिना हाल सुने
एक सजी कार में बैठकर
अपना घर बर्बाद करके
एक घर आबाद करने
और हम..
हम रोते रहे बेहद
होते रहे बर्बाद बिना बात
देते रहे किस्मत को गालियाँ बेबाक
पीते रहे शराब बेहिसाब!
• यह कविता गौरव सोलंकी की एक कविता से प्रेरित है।
जीने का तरीका
दादी दुछत्ती में खाने के
गेहूँ डालती थी
माँ ने उसे चप्पलें रखने के लिए बरता
माँ ने गेहूँ कनस्तर में डाले
हमने उस दुछत्ती को ताला लगा दिया
उसमें घर का सबसे बेकार सामान डालकर
हमने गेहूँ को कनस्तर से निकालकर
बाजार में रख दिया
दादी के पैरों में बिवाई थी
जो खेत की मेढों पर चलने से आई थी
माँ की हथेलियों में लकीरों से ज़्यादा दरारें थीं
जो बाजरे और बाड़ी में कसौला चलाने से आई थी
समान मात्रा में थी पैरों में दरारें
हम ऐड़ियों पे मलहम लगा के सोते हैं
जबकी हमारे पैरों में दरारें भी नहीं हैं
दादी अनाज को सर से ऊपर रखती थी
माँ अपने कद के बराबर में
और हम पैरों में
सच कहूँ
हमने जीवन जीने का सलीका सीखने की जद्दोजहद में
जीने का तरीका भी गंवा दिया।
वे वृक्ष जिनपर से
वे वृक्ष जिन पर से
तुमने बैठी चिड़ियों को उड़ा दिया
कभी मुसाफिरों को छांव नहीं दे पाएंगे
वे स्त्रियां जिन्हें
प्रेम में धोखा मिला है
मान-अपमान से ऊपर उठ जाएंगी
बुद्ध से मुंह फेर लेंगी
वे बच्चे जिनके
खिलौने तोड़ दिए गए
वे बड़ों को दिए जाने वाले सम्मान की हत्या कर देंगे
कच्ची उम्र में किया गया प्रेम
ताउम्र सिखाता रहेगा
प्रेम बस ईर्ष्या करने योग्य है।
कुछ चीजों का अधूरा रहना अनिवार्य है
मेरे पूर्वजों में किसी ने प्रेम नहीं किया
ना दादा ने
ना मेरे पिता ने
हमारे पुराने घर की
किसी दीवार पर दो जनों के
नाम अंकित नहीं मिले मुझे
कभी भी
दादा के पास बैठता तो
व्यवहार सिखाते
लेकिन प्रेम को वे व्यवहार में
नहीं बरतते थे
जब कहीं बात उठती फलां की लड़की
फलां के साथ पकड़ी गयी
तो वे जमकर गालियाँ देते
दादी बताती रही हमेशा
उनके हिस्से कभी आराम नहीं आया
चुल्हा-चौका और आंगन लीपने से फुर्सत मिलती
तो आंगन में गेंहूँ फटकारती थी
प्रेम के लिए उन्हें फुर्सत नहीं थी
पिता कहते
वो बस खेती करना जानते हैं
उन्हें पता था आलू कितने गहरे गाड़ना चाहिए
या धान को कितना पानी चाहिए
उन्हें गर्व रहता कि उन्होंने उनके भाइयों के मुकाबले
ज्यादा पैदावार ली
और एक गर्व इस बात का भी
कि उन्होंने कभी किसी युवती के चक्कर में पड़कर
खानदान की इज़्ज़त खराब नहीं की
माँ कहती हैं
वो इसलिए ब्याही गयी थीं कि
हमें पैदा कर सकें ताकि एक परिवार का वंश चल सके
दादी उनको गालियाँ देती थी क्योंकि
मैं उनकी शादी के ग्यारह साल बाद पैदा हुआ था
जबकी मुझे एक साल बाद ही पैदा हो जाना चाहिए था
अठारह साल तक मैं
कक्षा में अव्वल आता
खेलों में अच्छा खेलता
मैं हर साल स्टील का टिफिन जीतकर लाता
माँ और पिता की छाती चौड़ी हो जाती
और वो टिफिन शीशे की एक आलमारी में संजोकर रखे जाते
फिर मुझे प्रेम हुआ
मैं एक लड़की के साथ पकड़ा गया
अब मुझे पिता अपना बेटा नहीं समझते
दादा देखते हैं तो
मुँह फेरकर खड़े हो जाते हैं
दादी बस गेंहूँ फटकारती हैं
माँ रोटियाँ बनाती हैं सुबह-शाम
अब घर में कोई टिफिन आता है तो
वो बाकी बर्तनों के साथ रख दिया जाता है
जो माँ और दादी ने अपने झड़ते बालों की
एवज में खरीदे थे
और वो लड़की ब्याहकर चली गयी दूसरा घर
अब वह किसी घर के आँगन में बैठकर गेंहूँ फटकारती है
और मुझे हर दिन घर में ये सिखाया जा रहा है
अपने बच्चों को प्यार करने से
कैसे बचाया जाए!
प्रेम में कुछ आख़िरी नहीं होता
चार साल के रिश्ते में
मैं बमुश्किल उससे सात या आठ बार
मिला
पहली कुछ मुलाकातें बस इतनी देर की थी
जितने में गैस पर दूध भी नहीं निकलता
ना इतने वक़्त में
माँ पड़ोस की काकी से बात करके वापिस आ सकती है
उसकी आँखें कितनी गहरी हैं
यह मैंने छठवें महीने में जाना
जब मैंने उसको इतने करीब से देखा
कि उसके होठों पर खींची लकीरें दिखने लगीं
यह आठवें महीने में जाना कि
आत्मा का गले मिलना
बहुत से दुःखों को कम कर देता है
जब उसने मुझे गले लगाया
सफेद गात पर पसीने की बूंदें
चमका करती हैं
और जब पहली बार लड़की के कोई
इतना करीब आता है कि हवा को पार जाने के लिए इंतजार करना पड़े
तो लड़की की सांसें चढ जाती हैं
उपरोक्त बात जानने में मुझे एक बरस लगा
जब मैंने उसका पहला चूंबन लिया
पहले चूंबन में मुझे एक बरस लगा
दूसरे में महज अठारह दिन
उसके लिए मुझे डर लगने लगा
डेढ बरस बाद
जब वह बात करते-करते सो गई
मुझे भरोसा था वह बात करते नहीं पकड़ी जाएगी
लेकिन फोन छुपाती पकड़ी जाएगी
क्योंकि बात हो या फोन
छुपाने की कला में
वह हमेशा असफल होगी
मैंने अनुभव किया मैं उसके बिना
वैसा ही हूँ
जैसे कोई कविता सटीक अंत ना पाने के कारण
अधुरी छोड़ दी जाए
ये मैंने दूसरे बरस जाना
जब प्रेम ढाई बरस का हुआ
मैंने उसकी देह सेंकी, उसका कुंवारापन फूंका
मैंने जाना
दो देहों के बीच आत्माओं की अदला बदली संभव है
प्रेम आत्माओं के बीच का पुल है
तीन बरस के प्रेम में मैंने जाना
एक हथेली पर लगे ज़ख्म
दूसरे की छाती पर महसूस किये जाते हैं
जब मैंने शराब पीकर उससे बात की
और उसका दिल तोड़ दिया
उसने कहा था -
'प्रेम इतना भी घटिया नहीं कि
दिल तले दबी बात कहने के लिए तुम्हें शराब पीनी पड़े'
सुनो! तीसरे बरस के लिए माफी चाहूंगा
मुझे साढ़े तीन बरस का प्रेम बहोत कचोटता है
जब उसकी शादी तय हुई
उस वक़्त मुझे
जातिवाद से उतनी ही जलन हुई
जितनी उसे मंगलसूत्र पहनते देखकर हुई
चौथा बरस मनहूस था
मैं उसे जी भर कर देख लेना चाहता था
मगर आख़िरी बार ना हम गले मिले ना चूंबन लिए
ना हंसे ना रोए
आख़िरी मुलाकात भी बिल्कुल साधारण जैसी थी
कहीं न कहीं उसे भी पता था
प्रेम में कुछ आख़िरी नहीं होता
हर चीज का दोहराव होता है।
- राकेश मलिक



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