मुसलमानों की गली

आज वह शहर की उस गली में गया 
जहाँ जाने से लोग अक्सर कतराते हैं 

पान की गुमटी में बैठी एक बुढ़िया 
पढ़ रही है उर्दू की कोई किताब
उसके मुँह से निकलने वाले हरफ़
दौड़े जा रहे हैं इबादत के घोड़े पर सवार होकर

मस्जिद के पास एक चबूतरा है
वहाँ बतिया रहे हैं बुज़ुर्ग लोग 
चुग रहे हैं पखेरू दाना
जैसे सभी मज़हब के ख़ुदा हुक्का पीते हुए 
धरती, गेहूँ और बाजरे के दानों से बतिया रहे हों 

बग़ीचे की ओर तनी तोप की नाल में 
चूजो ने खोली हैं चोंच 
छेड़े हैं तोप के विरुद्ध गीत

रहीम चाचा गाय दुहते वक़्त कह रहे 
कि दसेक दिन की बछड़ी
मर गई थी कल रात 
फिर भी बेचारी
लात नहीं मारती, दो बखत धार देती है 
अनबोल जीव किससे कहे अपना दु:ख

कुछेक औरतें बना रही हैं लाख की चूड़ियाँ
कछेक रंग रही हैं ओढ़ने 
कुछेक कर रही हैं कढ़ाई 
कुछेक गोबर थापती 
सुना रही हैं उपलों को जीवन की वर्णमाला 

जब माँएँ बच्चों की हथेलियों-पगथलियों पर 
बना रही होती हैं काजल का चाँद
तब दरगाहों से खड़े होकर 
पीर-फकीर धूल झाड़ते हुए 
आकर बैठ जाते हैं 
बच्चों की हथेलियों पर मारकर पालथी 
उस वक़्त ऐसा लगता है
कि बच्चों की हथेलियों में रचा-बसा हो समूचा गाँव 

सुनो,
अभी-अभी मुसलमानों की गली में 
छेड़ी है किसी भोप्पे नें रावणहत्थे पर 'तालरिया मगरिया' की धुन !


हलफ़नामा

मुझे मत खोजना देहातियों
आधार-कार्ड, राशन-कार्ड 
पहचान-पत्र या
दसवीं कक्षा की सप्लीमेंट्री मार्कशीट में

मेरे नाम का नहीं है 
सरकार की जेब में हलफ़नामा

खोजो तो खोजना 
मिलूँगा तुम्हें–
बंजारन की पोटली में नमक की तरह!


गाँव की खूँटी पर

धनाराम मेघवाल को जिस उम्र में स्कूल जाना चाहिए था 
करने चाहिए थे बाबा साहब के सपने पूरे
उस उम्र में उसने की थी सत्संग की संगत 

सारी रात जागकर सुना-गुना करता सत्संग 
दिन-भर भेड़ें चराता
चाय बनाता हुआ 
गाता था खेजड़ियों तले बैठकर वाणियाँ

इस बीच उसके मुँह से निकलने वाली टिचकारियाँ*
कब ढल गई थीं वाणियों में 
उसके हाथों को 
सिवाय रेवड़ घेरने के कुछ नहीं आता 
कब थाम लिया था तम्बूरा क्या मालूम 

बारह-सौ घरों के गाँव में ऐसा कोई घर नहीं छोड़ा
जहाँ धनाराम ने सत्संग न की हो

जब वह गला खँखारने के बाद 
छेड़ता तम्बूरे के तार 
उस वक़्त ऐसा लगता 
कि घर की छत पर 
औंधे मुँह रखी मटकी पर गिर रही हों बारिश की बूँदें 

उसकी मधुर वाणियाँ सुन-सुनकर 
हरा हो जाता था समूचा थार 
लोक-देवियाँ उसके कण्ठ में से
भरने आती थीं मिठास
और खाने आते थे लोक-देवता गणेश छाप तम्बाकू 

फिर भी गाँव के ऊँची बिरादरी के लोग
उसके हाथों का पानी तक नहीं पीते थे 
और बात-बात पर ढेड कहते हुए
मार देते थे मट्ठ

बरसों-बरस गुज़र गए तम्बूरे को गाँव की खूँटी पर टँगे
अब भी कभी-कभार 
छेड़ जाती है सावन-भादो की बयार 
तम्बूरे के तार !

टिचकारी– पशुओं को हाँकने के लिए निकाली जाने वाली आवाज़

 
गाँव में मनिहारिन का आना

बेमौसम की तरह सिर पर गठरी लिए 
चली आती है गाँव में मनिहारिन 
जैसे बेमौसम आती है आँधियां 
जैसे बेमौसम होती है बारिश 
जैसे बेमौसम शरमा जाती है औरतें 

गाँव की गली-गली, घर-घर के आगे 
घुम रही होती है जब मनिहारिन 
यह कहती हुई–
'चुड़ी, मिणियाँ, मेहंदी ले लो 
ले लो कांच-कांगसी बाई सा!'

तो उस वक़्त लड़कियाँ दौड़कर जाती हैं 
घर की बाड़, दीवार, खिड़की की ओर
और औरतें खड़ी होकर चौक पर 
घर के भीतर आने का करती हैं उसे हाथों से इशारा

मनिहारिन घर में आकर 
गठरी उतारती हुई 
बैठ जाती है चौक पर
फिर जल्दी-जल्दी खोलती है गठरी की गाँठें 
जैसे स्कूल से घर आईं लड़की खोलती है रिबन

आस-पड़ोस की औरतें व लड़कियाँ
दौड़ी आती है मनिहारिन के पास  
चारों ओर एक घेरा डालकर 
देखती है ध्यान से एक-एक चीज़
लड़कियाँ खरीदती हैं 
रबड़, बिंदिया और मेहंदी 
बहुएँ ख़रीदती हैं
अंतर्वस्त्र, कांच-कांगसी, क्रीम
और सबसे बुज़ुर्ग महिलाएँ
पोतों-पोतियों के लिए 
काजल की डिबिया ख़रीदती हुई हो जाती हैं हरी 

आख़िरकार वस्तुओं का होता है मूल्य 
मूल्य को लेकर खींचातानी
मुट्ठियों में भींचे पैसे निकाल कर 
सब की सब कर देती हैं
हँसती हुई मनिहारिन का हिसाब-किताब 

ओढ़ना सिर पर लेती हुई मनिहारिन 
बातों-बातों में जचाती है
गठरी में सलीक़े से वस्तुएँ 
और देती है गाँठें
जैसे रंगीन मौसम को गाँठों के साथ सिमटा जा रहा हो
और गठरी सिर पर रख दूसरी गली की ओर चल देती है 

ज़रा सोचो जिस गाँव में मनिहारिन नही आती हैं 
उस गाँव की खेजड़ियों के पत्तों पर 
कहाँ ठहरती है क्षणभर के लिए ओस की बूँदें!


चिलम में चिंगारी और चरखे पर सूत

मेरे बच्चों! अपना ख़याल रखना 
आधुनिकता की कुल्हाड़ी
काट न दे तुम्हारी जड़ें
जैसे मोबाइलों ने 
लोक-कथाओं और बातों के पीछे 
लगने वाले हँकारों* को काट दिया है जड़ों सहित

वर्तमान के ऊँट पर भविष्य का कजावा रख
भतूळियों* को छकाते
आँधियों से लड़ते हुए 
करना है तुम्हें रेगिस्तान का सफ़र 

किलकारियाँ मारते हुए दौड़ो बेतहाशा
लूटो पंतगें 
लेकिन कभी तितलियों के रंग
चिड़िया की उड़ान
और चरवाहा की बीड़ी मत छीनना
जब गीली मिट्टी से तुम
बना रहें होंगे घरौंदे
तो दादी के लिए चश्मा 
दादा के लिए लाठी बनाना मत भूलना

गिल्ली-डंडा खेलते बखत  
लोकतंत्र के डंडे से
ऐसे उछालनी हैं गिल्लियाँ
जैसे उछाला करते थे हमारे दादा-पड़दादा
कि तानाशाह के ठहाके रुलाई में बदल जाएँ

स्कूल से घर लौटते ही जिस तरह 
फेंकते हो तुम चप्पलें या जूते 
उस तरह फेंकते हैं वे वादे
उन वादों को
तर्कों या विचारों के गोफन* में डाल
फेंकना हैं तुम्हें ज़ोर-से ख़ूँख़ार जानवरों के पीछे 

क़लम और अहिंसा के पाठ छोड़ बच्चों
कभी मत थामना झंडे 
झंडे थमाकर वे
हथियार थमाने की साज़िश रच रहे हैं दिन-रात

जीवन की पाटी पर अनुभवों की खड़िया से 
बनानी हैं तुम्हें बुद्ध जैसी आँखें 
सुर्ख़ाब जैसी पाँखें 
बापू जैसी मुस्कान 
माँ जैसी गौर और बाबा जैसा ईसर

भले ही तुम्हें कंधों पर बेगारी ढोनी पड़े
भले ही तुम्हें भारतीय रेल की बोगी में
खाने पड़ें गाल पर थप्पड़ 
लेकिन बंजर ज़मीन पर
रोपते, सींचते रहना है प्रेम के बिरवे
अगली पीढ़ी के लिए
बचाए रखनी है चिलम में चिंगारी और चरखे पर सूत।

हँकारा– वार्तालाप के दौरान सुनने वाले की तरफ़ से 'हाँ' या वैसा ही कोई शब्द कहकर वक्ता को आश्वस्त करना कि वह उसकी बात ध्यान से सुन रहा है
भतूळिया– रेत का बवंडर
गोफन– जिसमें ढेले आदि भरकर शत्रुओं पर चलाते हैं

- संदीप निर्भय


संदीप निर्भय

जन्म- 01 जून 1996  
गाँव-पूनरासर, बीकानेर (राजस्थान)
प्रकाशन‐  सदानीरा, राजस्थान पत्रिका (हम लोग), दोआबा, कादम्बिनी, अनुगूँज, बहुमत, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, राष्ट्रीय मयूर, अमर उजाला, भारत मंथन, प्रभात केसरी, कथेसर, लीलटांस, राजस्थली, बीणजारो, दैनिक युगपक्ष आदि पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी व राजस्थानी कविताएँ प्रकाशित।
मोबाइल नम्बर - 8949898120