एक
हमें लगा,
कविताओं में वें
गरीबी को कोस रहें हैं
पता नहीं था
हर्फ़ के पीछे
मोटी रॉयल्टी खोंस रहें हैं।
कविताओं में वें
गरीबी को कोस रहें हैं
पता नहीं था
हर्फ़ के पीछे
मोटी रॉयल्टी खोंस रहें हैं।
दो
मेरी चुप में
दफन है
सदियों से सियराया
मेरा क्रोध।
तीन
तुम्हारी
चिल्लाहट
हृदय में दुबके
तुम्हारे खौफ़ को
ला देती है भाषा के तट पर।
चार
पेट की आग
सुखा सकती है
धरती के
सारे सागर
जला सकती है
हर वह घर
जो चिनावाया गया है
मजबूर हाथों से।
पाँच
मत छेड़ो भूखा मानव;
भूखी चीखें दुनिया की
सबसे मारक
तोपें हैं।
छह
चूल्हे ने बस आँच दी
तवे ने दिया ताप
माँ का स्नेह
रोटी में
स्वाद बन उतरा।
सात
गैस ने
रसोईघर को
बना दिया है होटल;
कि रोटी अब
भावना नहीं भाषण है।
आठ
माटी ने
लेकर बीज
मानव को स्नेह लौटाया
खेतों में
दाना हर्षाया।
नौ
उदास धरती पर
अजगर बन
पसरी नीरवता
पंखी तुम
स्वर दे तोड़ दो
मधुकर प्राणों को जोड़ दो।
दस
आओ
मिलकर चलें
वक्त की पगडंडी को
करें पार
दें जीवन को
आकार।
ग्यारह
आओ
दीप बन जलें
अर्पित करें विश्रांति
उम्मीद के लड़खड़ाते
सूर्य को।
दिनेश सूत्रधार
सहित्यिकी, प्रभात केसरी, हस्तक्षार मासिक, संजीवनी, तेजपत्रिका, मरुसंवाद आदि पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। रेडियो मधुबन (माउंट आबू) से कविता-वार्ता का प्रसारण। बाली, राजस्थान (306706) में निवास।
मोबाइल- 9649056716
ईमेल- dineshsootradhar@gmail.com



2 टिप्पणियाँ
बढ़िया... वाह
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुन्दर
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