सड़क की प्रतीक्षा
वह हर दिन प्रतीक्षा करती है
सुबह से लेकर घुप्प अंधेरा होने तक
अपने सबसे आख़िरी मुसाफ़िर का
उस आख़िरी मुसाफ़िर से ही
जुड़ी होती हैं उसकी सारी उम्मीदें
जिसे हर हाल में वह बचाना चाहती है
और चले जाना चाहती है
उसके साथ हमेशा के लिए
किन्तु, जा नहीं पाती है
क्योंकि वह सड़क है
और सड़क की कोई मंजिल नहीं होती
कभी-कभी मैं सोचता हूँ
कितना मुश्किल होता होगा
किसी स्त्री के लिए सड़क बनकर जीना।
रंगमंच और पिता
रंगमंच पर सबसे मुश्किल किरदार
होता है एक पिता का
पिता बनने के लिए चुना जाता है
सबसे अनुभवी रंगकर्मी को
जिनके सारे सपने मर चुके हों
और जिनके कंधे काफी मजबूत हो
रंगमंच की तरह ही
पिता का किरदार भी दरअसल
उस रंगमंच की तरह ही होता है
जिसके लड़खड़ाने के बाद
कोई रंगकर्मी उसे सहारा देने नहीं आता है
और एक दिन वह अचानक गिर जाता है भरभराकर
हर नाटक की समाप्ति के बाद
कई-कई रात तक अकेले रोता है रंगमंच
अपने रंगकर्मियों की याद में
विडम्बना
कि हमें कभी किसी रंगमंच
के आँसू दिखाई नहीं देते हैं।
बूढ़े बरगद का दुःख
उस बरगद की गोद में खेल चुके थे
गाँव के लगभग सारे बच्चे
उसकी झुकी हुई डाली को
टिक-टिक घोड़ा बनाकर
उन्होंने अपने बचपन का सफर पूरा किया था
बच्चे जब बड़े हुए
तो उन्होंने सबसे पहले
उस बरगद को कटवा डाला
और वहाँ छोटे-छोटे गमले में
लगा डाला ढेर सारे छोटे-छोटे और खूबसूरत पौधे
कभी-कभी मुझे लगता है
आजकल नये और खूबसूरत पौधों को बचाने के लिए
बरगद जैसे पुराने और कुरुप पेड़ों को
हटाना आवश्यक हो जाता है
क्योंकि वे छोटे-से गमले में
एडजस्ट करना नहीं जानते
ठीक उसी तरह जैसे रोहन के दादाजी
एडजस्ट नहीं कर पाए थे
उसके घर के छोटे से बरामदे पर
और इसलिए उन्हें भेज दिया गया था
वृद्धाश्रम हमेशा के लिए।
सपने चुनने वाले बच्चे
एक बच्चे को चांद की चाहत थी
उसने घंटों आसमान को निहारा
तरह-तरह के सपने देखे
और पिता से ज़िद की उसे पूरा करने की
एक बच्चे को रोटी चाहिए थी
वह सुबह-सुबह जगा
और पीठ पर एक बड़ा-सा बोरा लेकर
निकल गया अपने सपनों को चुनने
बिखरे हुए सपनों से रोज
बोरा भरकर लौटना आसान नहीं होता है
बल्कि, उसके लिए घूमना पड़ता है
शहर-शहर, गली-गली
और कभी-कभी रेल की पटरी-पटरी भी
तुम बताओ, महाकवि!
सपने देखने वाले और सपने चुनने वाले बच्चे
एक जैसे कैसे हो सकते हैं?
आखिर चांद और रोटी में फर्क तो होता है, न?
कैक्टस का फूल
शहर की सबसे बदनाम गली में
गुलमोहर के पौधे कभी नहीं उगते
ना ही उसके अंतिम छोर पर
होता है कोई झमटदार बरगद
बल्कि,
यहाँ केवल कैक्टस उगते हैं
जिनके फूलों में केवल रात भर की
खुश्बू होती है।
कब्जा
उसकी आँखों की झील में
बड़े जतन से मैंने खिलाया
कमल का एक प्यारा-सा फूल
फिर किसी देवता ने
स्वर्ग से आकर उस पर भी कब्जा कर लिया।
इंसान बनने की प्रक्रिया
हजारों साल तक जंगल में रहने वाले जीव
तब तक इंसान नहीं कहलाए
जबतक उन्हें कुत्ता पालना नहीं आया
पहली बार कुत्तों ने ही दुम हिलाकर
और भौंक कर उन्हें सर्वोच्च होने का एहसास कराया
इंसान बनने के बाद
उन्होंने बैलों को पालना शुरु कर दिया
जो चुपचाप सिर झुकाकर हल जोत सकते थे
और कोल्हू या गाड़ी भी खींच सकते थे
आज हजारों साल बाद
मशीन के इस युग में भी
उन्होंने कुत्तों और बैलों को पालना नहीं छोड़ा
क्योंकि इन्हें दुम हिलाने वाले और
चुपचाप सिर झुकाकर चलने वाले जीव
अब भी बहुत पसंद है।
कवि का चाक
स्त्री जब ज़मीन में समाकर मिट्टी बन जाती है
तब उस पर लिखी जाती है
दुनिया की सबसे सुंदर कविता
फूल मुरझा कर
दरख़्त सूख कर
नदी विलीन होकर
जब मिट्टी में समा जाते हैं
तब लिखी जाती है उस पर कविता
इसलिए,
तुम्हारे लाख छटपटाने पर
दाँत किटकिटाने पर
या घुटनों के बल चलने पर
नहीं लिखी जाएगी कोई कविता
कवि के चाक पर चढ़ने के लिए
तुम्हारा मिट्टी होना सबसे जरुरी है।
लोहार
उसका पूरा जीवन लोहे के साथ गुजरा था
उसने अपनी भट्ठी में हजारों अस्त्र-शस्त्र तैयार किए थे
यहाँ तक कि अपना हथौड़ा भी
उसने खुद से ही बनाया था
लोहे के साथ रहते-रहते
वह खुद भी लोहे जैसा हो गया था
ऐसा लोहा जो आसानी से पिघल सकता था
अपने पेट की भट्ठी में
लोगों ने इस लोहे को अपने मुताबिक इस्तेमाल किया
किसी ने हथौड़ा बनाकर
तो किसी ने तलवार बनाकर
मुझे उस दिन बहुत आश्चर्य हुआ
जिस दिन एक डॉक्टर ने
उसे मरता हुआ छोड़ दिया
यह कहकर कि
उसके खून में लोहे की कमी है।
मुहब्बत के मौसम में
मुहब्बत के गुलाबी मौसम में
जब लोग गुलाबों के साथ खेलने में लगे होते हैं
मैं निपट अकेला दिन भर
समेटता रहता हूँ
उनकी बिखरी पंखुड़ियों को
जिन्हें केवल एक दिन की मुहब्बत नसीब होती है।
मुहब्बत करने वालों का क्या है
वे तो रोज हजारों गुलाबों को
रौंद देते हैं अपने बिस्तरों पर
जिनकी हरेक पंखुड़ी से तब तक चीख निकलती है
जब तक वह सूख कर मिट्टी न बन जाए।
लेकिन, मैं बचाना चाहता हूँ
इन गुलाबों को
मुहब्बत करने वालों की नजरों से
और बसाना चाहता हूँ
एक ऐसी दुनिया
जहाँ की फ़िज़ाओं में केवल गुलाबी खुश्बू हो
कोई चीख नहीं।
- पंकज कुमार सिंह



3 टिप्पणियाँ
बहुत अच्छी 💜💜
जवाब देंहटाएंबहुत खूब लिखा है कवि महोदय ने।
जवाब देंहटाएंपूरी कविताएं पढ़ने के बाद , समझ नही आता कि क्या लिखूं । निःशब्द हूं....।
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