१.


मैं गौर से देख रहा हूँ 

अनगिनत चेहरों को ऐसे

आशंका, भय, सन्त्रास और यातना के

मिले-जुले भाव के बीच रत्ती भर उम्मीद

यही उम्मीद इन्हें आहों-कराहों के बीच

जीवन-राग की सुनाती है लोरियां


टूटे दिलों को ढांढस दे लेते हैं ये

कि सब कुछ खत्म नहीं होता 

बचा रह जाता है 

बहुत कुछ फिर भी।



२.


एक साथ बहुत दिनों तक

एक ही छत के नीचे 

रहने का अभ्यास नहीं था 

सबकी अपनी चिंताएं हैं

सबके हैं संघर्ष अलग 

सबकी इच्छाएं अलहदा

अलग-अलग हैं सबके मत


इस कोरोना-काल ने जैसे 

कर दिया सबको एक साथ 

जिसके हम अभ्यस्त नहीं हैं

अलग-अलग जीने की आदत 

बार-बार आड़े आती है


फोन पर घण्टों बतिया लेते थे 

लेकिन अब जब साथ-साथ हैं 

घुसपैठी सा चुप का वायरस 

मनहूसियत फैला जाता है


जीवन की आपा-धापी ने जैसे 

तोड़ के रख दी  विश्वास की डोर 

आह! एक साथ रहने का उल्लास 

कितनी जल्दी खत्म हो गया।



३.


तुमने पूछा तो यूँ पाँव थम से गए 

हम तो चलते रहे मगर अब थक गए 


पहले भी  करते थे कितना सफ़र

राह में मुश्किलें आ ही जाती थीं 

पांव ज़ख्मी हुए, धूप भी लग रही

प्यास भी लग रही, भूख भी लग रही

हाँफते-हाँफते, फिर भी चलते रहे


ये सफ़र खत्म हो या कि हम न रहें

हम जिन्हें अब किसी की ज़रूरत नहीं

कितना बेकार सा है हमारा वजूद 

ज़िन्दगी की है चाहत मगर क्या करें

कोई है जो हमारी भी रह तक रहा

और हम भी पहुंचने की कोशिश में हैं 

कितना मुश्किल सफ़र, अंतहीन राह है

मंज़िलों तक पहुंचने की बस चाह है


कोई हमदर्द नहीं कोई रहबर नहीं 

सिर्फ़ हिम्मत है जो तोड़ देती थकन

एक उम्मीद है, एक अरमान है

किसी तरह पहुंच जाएं अपने वतन।



४.


काश! मैं अकादमिक आलोचक होता

या कोई बेहतरीन प्रवक्ता 

तुम्हारे दुखों के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं दोस्त

सिर्फ एक महसूस करने वाला दिल है 

और एक बेआवाज़ दुआ।



५.


ईदगाह का तिलस्म


ईद की नमाज़ ईदगाह में पढ़ी जाए 

उसकी एक अलग लज़्ज़त है

हर समय उजाड़ सा दीखता ईदगाह

किसी मीना-बाज़ार सा बन जाता है 

एक छोटा सा कुन फयकुन जैसा कुछ 

घटित होता है और गतिमान होता है कुतूहल


सिद्धबाबा पहाड़ी के पाँव तले

छोटे से मैदानी इलाके में

सफेद चूने से पुती चारदीवारी के 

पश्चिमी कोनों, काशी समोसे वाला

दीनू जलेबी वाला, भूखन गुब्बारे वाला

खिलौने वाले बहुत से और भिखारी भी

गरीबों के बच्चे जूते-चप्पल की निगरानी कर

बना लेते हैं चालीस-पचास रुपये

साल में दो ही दिन तो 


अमूमन इबादती कपड़ों से सज्जित लोग

और नए कपड़ों की गमक से लैस बच्चे

जिनकी जेब में है ईदी के उछाल मारते पैसे

ईदगाह से लगा हुआ कब्रिस्तान

कितना आबाद हो जाता है 

ईदगाह भले कई हों कब्रिस्तान सबका एक है

सुन्नी-वहाबी, देवबन्दी-बरेलवी अलग-अलग

मान्यताएं लेकिन मरकर सब एक साथ

अगरबत्ती, लोभान की खुशबुओं से 

कब्रिस्तान का विस्तार मुअत्तर हो जाता

ईद की नमाज़ के बाद नमाज़ी

सीधे पहुंचते कब्रिस्तान जहां सोये हुए

वह अपने जो कभी इसी ईदगाह में

अदा करने नमाज़ आया करते होंगे


वहीं दफ़न हैं अब्बा, अम्मी, दादा, दादी

आज यह कैसी ईद आई है

जब उनकी क़ब्रों पर फ़ातेहा नहीं पढ़ी गई

वे ज़रूर राह देखते होंगे 

वे ज़रूर राह ताक रहे होंगे।



६.


आँखें नहीं देख पातीं दूर की चीजें

बेशक दूर में रौशनी भी है और जीवन भी

आँखों से दीखता है सिर्फ अगला पग

उसके बाद फिर अगला पग 

इससे ज्यादा देखने से दुखती हैं आँखें

जिस्म से ज्यादा दुखने वाली आँखों का सच

पथराई पिंडलियाँ और लहूलुहान तलवों को पता है


हर बार लगता है हिम्मत देगी जवाब 

हर बार कम होती है एक पग दूरी


मत देखो हमें अचरज से 

हम कोई बाज़ीगर या जादूगर नहीं हैं 

न कोई तमाशा दिखाने वाले हैं 

मत देखो हमदर्दी से हमें 

अपनी हमदर्दी बांट लो अपने बीवी-बच्चों में

कम से कम वह तो ख़ुश रह सकें 

वैसे भी एक अंतहीन ऊब ने फांस रखा है तुम्हें

और तुम खुद पर दया दिखलाओ

कि हमारा दुख हमारा नसीब है

यह कहीं पहुंचकर भी खत्म नहीं होगा।


- अनवर सुहैल


अनवर सुहैल

जन्म: 09 अक्टूबर 1964. दो उपन्यास, चार कथा संग्रह, चार कविता संग्रह प्रकाशित. अनियतकालीन लघुपत्रिका 'संकेत' के 17 अंकों का संपादन. 'गहरी जड़ें' कथा संग्रह को वागीश्वरी सम्मान. सम्प्रति कोल इंडिया में वरिष्ठ प्रबन्धक. अनवर सुहैल से उनके मोबाइल नंबर 07000628806 अथवा sanketpatrika@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.