१.
कहीं से और ही लाया गया हूँ
मैं हर इक बार ठुकराया गया हूँ

हुआ है कत्ल मेरा ही यहाँ पर
मगर कातिल भी मैं पाया गया हूँ

मैं अपने शौक पूरे कर न पाया  
मुझे लगता है मैं ज़ाया गया हूँ

तड़प ने भी सभी हद पार कर दी
मैं उस हद तक भी तड़पाया गया हूँ

हवाओं ने जलाया जिस्म मेरा
चराग़ों से मैं सहलाया गया हूँ

मेरा सच, झूठ अब कहने लगा है
मैं इतनी बार झुठलाया गया हूँ

मुझे मालूम है अपनी हक़ीक़त
उसे लगने दो मैं आया-गया हूँ


२.
तुमसे पहले भी यार था कोई
मेरा   परवरदिगार   था  कोई

मेरे हिस्से में उसकी उल्फ़त थी
उसके हिस्से  का प्यार था कोई

दिल का इक टुकड़ा ही दिया उसने
उसमें   भी    हिस्सेदार   था  कोई

उसने दी थी घड़ी जो, लौटा दी
वक्त  मुझपर  उधार   था  कोई

उससे कहता ये कौन, उसके लिए
उम्र   भर   बेकरार   था    कोई

अक्स अपना कभी न देख सका 
उसकी  आँखों  के  पार था कोई

तीर चलता था औरों की जानिब
और   होता   शिकार   था  कोई

कोई तो खुश था उसको हासिल कर
साथ   ही   सोगवार   था   कोई

कम जो होता, निकाल देता, पर
जह्न    में   बेशुमार    था    कोई

दिल के टुकड़े कई हुए, फिर भी
इश्क़  पर   बरकरार   था   कोई।


३.
फफोले जब बहुत तकलीफ़ दें, तो फोड़ देता हूँ
तुम्हारी याद के हर तोहफ़े को तोड़ देता हूँ

ये जी तो चाहता है डायरी मैं फाड़ दूँ लेकिन
है तेरा ज़िक्र पन्नों में, सो इसको छोड़ देता हूँ

गणित अपनी मुहब्बत का सम्हाले रक्खा है कुछ यूँ
घटाये रब्त वो जितना, मैं उतना जोड़ देता हूँ

है मेरी और उसकी शख़्सियत में फर्क़ बस इतना
वो रुख़ को मोड़ लेता है, मैं रस्ता मोड़ देता हूँ

मैं जब भी ऊब जाता हूँ बदन की कैद से या रब
तो इक तितली पकड़ता हूँ, पकड़कर छोड़ देता हूँ।


४.
चट्टानों से टकरा-टकराकर पत्थर मर जायेंगे
जलने वाले जो भी हैं वो खुद जलकर मर जायेंगे

जिस्म का सौदा करते-करते सौदागर मर जायेंगे
जुल्मी अपने साये से ही डर-डरकर मर जायेंगे

राह दिखाने वाला कोई भी न रहेगा दुनिया में
धीरे-धीरे सारे के सारे रहबर मर जायेंगे

मलबा होगा कूचे-कूचे में बस खून पसीने का
महलों के नीचे दब-दबकर छोटे घर मर जायेंगे

खुद की हत्या कर के शख़्स अकेला सिर्फ़ मरेगा नइ
ख़्वाब दिखाने वाले सब तकिया बिस्तर मर जायेंगे

रह जायेगा नाम ख़ुदा का धरती के हर कण-कण में
लड़ते-लड़ते मंदिर मस्जिद गिरिजाघर मर जायेंगे

खेल सियासी और घिनौना बदतर होता जायेगा
दिल में ईमाँ रखने वाले जब अफसर मर जायेंगे

धीरे-धीरे सबका कर्ज़ उतारा करिये आप यहाँ 
कब आयेगी मौत न जाने आप किधर मर जायेंगे

मय के प्याले औ मयखाने खत्म नहीं होने वाले
पीने वाले लाख भले ही पी पीकर मर जायेंगे

कत्ल अदाओं से करने का क्या नायाब तरीका है
देख के इसको खुद ही कातिल पेशेवर मर जायेंगे

खून दिलावर वाला जिनके रग-रग में बहता है, वो, 
मुल्क की खातिर तलवारों पर सर रखकर मर जायेंगे

आखिर लम्हों में भी 'कश्यप' लब पर होगी सुर्ख हँसी
मारेंगे जो खंजर मुझको खुद थककर मर जायेंगे।


५.
कभी तो ग़म रहे हिस्से कभी खुशी मेरे
यूँ जंग जारी रही जीस्त़ मौत की मेरे

है जिद मुझे तो समंदर से जंग मैं ठानूँ
मगर है रास्ते रोके हुए नदी मेरे

सितारे रोज़ ही महफ़िल सजा के रखते हैं
बस एक चाँद ही आता नहीं गली मेरे

हवा ने सारे चराग़ों को ही बुझा डाला
उसे पसंद न थी घर की रौशनी मेरे

ये कौन मेरा तलबगार हुआ दुनिया में
जो छोड़ कर है गया दर पे इक कली मेरे

न दुश्मनों की ज़माने में है कमी कोई
मगर है शुक्र बने चार दोस्त भी मेरे

तलाश है उसे अब तो नये खिलौने की
वो कितनी देर तलक दिल से खेलती मेरे।



६.
कुछ उसूल औरों से भी हटकर ज़रा रक्खा करें
ज़िन्दगी जीने का अपना कायदा रक्खा करें

ये तरक्की के हैं दुश्मन जो मिलाते हाँ में हाँ
जी हुज़ूरों से बनाकर फासला रक्खा करें

एक ही तो चीज़ दिखलाती हमें है असलियत
चार कपड़े कम हों लेकिन आइना रक्खा करें

चार कंधे भी जनाज़े में न आये, कम से कम
चार लोगों से मुसलसल वास्ता रक्खा करें

भूख से मरते परिन्दे दाग़ हैं इंसान पर
छत-मुँडेरों पर ज़रा जौ बाजरा रक्खा करें

तीरगी हर सिम्त है फैली जहां में आजकल
दिल में अपने इल्म का दीपक जला रक्खा करें

कुछ हवा का शोर हो कुछ खिड़कियों से बात हो
बीच दो घर के ज़रूर इक रास्ता रक्खा करें

जख़्म देने वाले 'कश्यप' हैं यहाँ पर चारसू
हर मरज़ की साथ में अपने द़वा रक्खा करें।


७.
कफ़न से पहले जफ़ा का अज़ाब आयेगा
हरेक ज़ुर्म का इक दिन हिसाब आयेगा

बढ़ेगी ज़ुल्म की जब हद जविलफ़राइज़ पर
तो बस्तियों से भी उठ इंक़लाब आयेगा

अलग-अलग सभी किरदार ले के घूमेंगे
तमाम चेहरे पे इक दिन नक़ाब आयेगा

जगह मिलेगी नहीं मुर्दे दफ्न करने को
फक़त अना का नतीज़ा ख़राब आयेगा

रिवाज़ इश्क़ में इंकार का तो लाज़िम है
उमीद रख कि किसी दिन  गुलाब आयेगा

सितारों ने जो ये महफ़िल सजा के रक्खी है
ज़रूर आज मेरा माहताब आयेगा

बुझी जो तिश्नगी उसकी नहीं मुहब्बत से
ये तय है शख़्स वो लेकर शराब आयेगा।


८.
पिलाकर जाम आँखों के मुझे मदहोश करती है
बिना आहट, बिना दस्तक दिये दिल में उतरती है

मेरी आँखों में है तस्वीर उसकी छप गयी ऐसी
भले हो भीड़ लाखों की नज़र उस पर ठहरती है

अगर देखे पिया का रूप तो हूरें भी जल जायें
मेरे आगोश में आकर वो कुछ ऐसे निखरती है

जुदा इक दूसरे से एक पल भी रह नहीं पाते,
न मैं इज़हार करता हूँ, ज़रा कुछ वो भी डरती है

घना काजल झुकी नज़रें, लरज़ते लब, लटें उलझीं
मैं साँसें थाम लेता हूँ वो जब ऐसे सँवरती है

बरसता हूँ मुहब्बत की फुहारें बन के मैं उस पर 
मैं उसका आसमाँ बेसब्र सा वो मेरी धरती है

पलक भीगी, बदन सहमा लिये मुझसे लिपटती वो
मुझे ख़्वाबों में भी खोने के डर से यूँ सिहरती है

हमारे दिल के तारों को ख़बर है एक दूजे की
हवा लब चूमकर उसके मेरे तन से गुज़रती है

ग़ज़ब सा है नशा उसका उतरता ही नहीं 'कश्यप'
वो बनकर इश्क़ की खुशबू फ़िज़ाओं में बिखरती है।


९.
हालात के हवाले शिकारा नहीं किया
लहरों के डर से कश्ती किनारा नहीं किया

जब भी मुसीबतों से घिरा ख़ुद लड़ा हूँ मैं
मैंने ख़ुदा का नाम पुकारा नहीं किया

कुछ वक्त जो मिली खुशी मुझको उधार में
वो कर्ज़ जिन्दगी का उतारा नहीं किया

तारीफ़ एक रोज़ खुले बाल की जो की
ताउम्र जुल्फ़ उसने सँवारा नहीं किया

किस्से वो इश्क़ के तो सरेआम ही हुए
छुप छुप के मैंने तुमको इशारा नहीं किया

करवट बदल बदल के गुज़ारी फक़त ये शब 
किस रात तेरी याद ने मारा नहीं किया

झेली हैं जिल्लतें जो हक़ीक़त बयान कर
लग्ज़िश कभी वो मैंने दुबारा नहीं किया

मुहताज़  हो गये भले ही पाई-पाई को
लेकिन ज़मीर बेच गुज़ारा नहीं किया

'कश्यप' थी चाह सिर्फ़ हमें जिसकी उम्र भर
तक़दीर ने उसे भी हमारा नहीं किया।


१०.
गिन रहे तुझको भी सब बीमार में
वज़्न कुछ तो रख तेरे किरदार में

हैसियत मुझको बताने जो चला
भाव कौड़ी के बिका बाज़ार में

सुब्ह अच्छी गुज़रे आख़िर किस तरह
झूठ बिकता देख कर अख़बार में

नैन तीखे हुस्न तौबा अलहदा
और काला तिल तेरे रुख़सार में

आँखें हैं या है समंदर जाम के
डूबता ही जा रहा अब्सार में

खार, गुलशन, अश्क़, खूँ औ जंग भी
सब है जायज़ इश्क़ के व्यापार में

चीख मज़लूमों की अब सुनते नहीं
सिर्फ़ बहरे भर गये सरकार में

धीरे-धीरे हो रहा जर्जर वतन
कील ठोकी जा रही दीवार में

जाति मज़हब में बहा बस खून है
कुछ नहीं रक्खा है ऐसे रार में

माँ पे लिखने को किसी ने जब कहा
मैंने बस लिक्खा ख़ुदा अशआर में

दूर तक 'कश्यप' न साहिल दिख रहा
बस शिकारा चल रहा मझधार में।


११.
तसल्ली झूठी बस दी जा रही है
सियासत रंग अब दिखला रही है

परिन्दे फड़फड़ा इतना रहे क्यों
यहाँ शायद कयामत आ रही है

ज़माने ने कब उसको बख़्शी इज्ज़त
वो बस औलाद का ज़रिया रही है

बहुत गंभीर  है ये  मसअला जो
समंदर  से  नदी  घबरा  रही  है

वो माली हो  गया है जब से बूढ़ा
कली भी  बाग में  मुरझा  रही है

वो क्या खायेगा दाना रिज़्क का इक
गरीबी रोज़  जिसको खा  रही है

नहीं सोने को है दो गज़ वहाँ अब
कभी सोने की जो चिड़िया रही है

ये  उसके  रोकने  का  है  बहाना
मुझे फिर बात में उलझा रही है

मुहब्बत की जो 'कश्यप' बात की तो,
हिदायत  अब  हमें  दी  जा रही है। 


- आयुष कश्यप

आयुष 'कश्यप'

जन्म - 16 नवंबर 2000, फारबिसगंज, अररिया, बिहार ।
सम्प्रति बी०एच०यू०, बनारस, उत्तरप्रदेश में गणित से स्नातक में अध्ययनरत। पाँच साझा काव्य संग्रह प्रकाशित व विभिन्न पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। मुख्यतः ग़ज़ल, गीत, मुक्तक एवं छंद में रुचि । विगत दो वर्षों से लेखन में सक्रिय। संपर्क - 9162784324