एक


मुझ पर है असर ख़ास बहुत ख़ास ग़ज़ल का

मैं बन के रहूँगा ख़ुशी से दास ग़ज़ल का


ये फ़ेर-बदल और ज़बानों की लड़ाई

है कौन जिसे रङ्ग नहीं रास ग़ज़ल का


मुमकिन है लहू से भी मिरे नक़्श बने तो

उस नक़्श में चेहरा दिखे हस्सास ग़ज़ल का


कम जानते हैं आप भी लफ़्ज़ों के मआनी

मुझको भी कोई इल्म नहीं ख़ास ग़ज़ल का 


करता फिरे वो शख़्स मिरे जॉन, मियाँ जॉन!

हो जाए जिसे भूले से एहसास ग़ज़ल का



दो


मेरे ग़मों पे कोई भी मातम न कीजिए

मैं रक़्स कर रहा हूँ सो बाहम न कीजिए


कोई मलाल वस्ल के वादे का अब नहीं

बस दूरी इख़्तियार यूँ हमदम न कीजिए


आवाज़ आपको न लगा पाएँगे हम और

आ जाइए कि और भी बे-दम न कीजिए


मेरी तरह ही इश्क़ मुसलसल निभाइए 

ग़ुस्से में भी ख़याल, वफ़ा कम न कीजिए


ये तयशुदा नहीं कि सफ़र कब तलक है दोस्त

हमसे कोई भी रब्त मुक़द्दम न कीजिए



तीन


मुझको न समझ यूँ ही तू आसान मिरे दोस्त

मुश्किल हूँ मुझे और ज़रा जान मिरे दोस्त


दुनिया से तिरी मेरा तअल्लुक़ ही नहीं है

फ़िरदौस मिरा घर है, हैं रिज़वान मिरे दोस्त


मुझको ये ख़बर है कि तू है दुश्मनों के साथ

बनता फिरे है किसलिए अंजान मिरे दोस्त


सज्दे भी करूँगा नए अशआर कहूँगा

दाइम तू मुझे बोल मुसलमान मिरे दोस्त


तुझसे मैं बड़ा हूँ प' तुझे साथ बिठाया

तू देख मिरा इल्म, मिरा मान मिरे दोस्त


ये दुनिया मोहब्बत के लिए ही बनी है ख़ास

मत इस को बना वहशी बयाबान मिरे दोस्त


ये अहल-ए-सुख़न, अहल-ए-मोहब्बत हैं समझ ले

इनको किसी भी तरह से पहचान मिरे दोस्त


चार


इसी    तलवार      पर    जाकर   खुलेंगे

कि  हम  बस  प्यार  पर  जाकर   खुलेंगे


ख़मोशी   ओढ़    कर   बैठे    हुए    लब

तेरे    रुख़्सार     पर     जाकर    खुलेंगे


ये    मेरे    शे'र    फीके    तो   नहीं    हैं

ये    इक   मेयार   पर    जाकर   खुलेंगे


किसी भी शख़्स पर खुलकर न अब हम

किसी   दीवार     पर     जाकर    खुलेंगे


बहुत      ख़ुद्दार      हैं     'आलोक शर्मा'

किसी    ख़ुद्दार    पर    जाकर    खुलेंगे


पांच


ये कोई जुमला नहीं सियासी मैं राज़ तुमसे ये कह रहा हूँ

तलाशो जाकर ये उस अहद में के मैं भी दुनिया का शह रहा हूँ


तो क्या हुआ की मैं ज़ुर्म करके भी नेक इंसा सा घूमता हूँ

मैं पहले-पहले तो क़ैद-ख़ाने में ख़ूब अच्छा सिपह रहा हूँ


तुम्हारे माथे के बिंदी जितनी ही मेरी दुनिया सिमट गयी है

मैं एक कमरे में एक मुद्दत से तन्हा-तन्हा सा रह रहा हूँ


मुझे शिक़ायत नहीं किसी से न कोई शिक़वा है ज़िन्दगी से

ये दोस्तों का है मस'अला के मैं खोया-खोया सा रह रहा हूँ


छे आठ मिसरों के बा'द जाकर मुझे भी था ये ख़याल आया

के आज फिर मैं ग़ज़ल नयी-सी फ़ुज़ूल बातों पे कह रहा हूँ


मुझे किनारा मिलेगा इक दिन यक़ीन मेरा ये बोलता है

सो बनके तिनका मैं मौज में एक कबसे 'आलोक' बह रहा हूँ


छह


इस से उदासी जाए तो फिर ये भी मन सहीह

इस कर्ब के आगे  मिरा तर्क-ए-सुख़न सहीह


इक लड़की मुसलमाँ है जो मुझको रखेगी याद

उर्दू   में   बोलता  था  कोई  बरहमन  सहीह


कुछ   फ़र्क़  तो  पड़ेगा  मिरे  बा'द  बज़्म  में

मैं  रोशनी  नहीं  था  मगर  इक किरन सहीह


तनक़ीद  कीजिए  इसे  फ़न  मानिए  ही मत

कहते नहीं हैं ख़ुद को कभी अहल-ए-फ़न सहीह


लगता नहीं है दुनिया में 'आलोक' कुछ ग़लत

ले  जाए  अब  तो  लूट  मुझे राहज़न सहीह



सात


वो  निशान-ची  है  और  मैं  निशान   पर  नहीं

ध्यान  इसलिए  मिरा  किसी  कमान  पर नहीं


रोक  टोक   कीजिए  मिरी  उड़ान   पर   नहीं

आपका  कोई  भी  हक़  है आसमान पर नहीं


शाइरी  बिरहमनों   के   घर  कहाँ  से आएगी

मैं  उदासी  पर   गया   हूँ   दूदमान   पर  नहीं


ऐन  शीन  काफ़  हर्फ़  जान  लीजिए  फ़क़त

कीजिए  ज़ियादा  काम  इस  ज़बान पर नहीं


जो  कहें  उदास  लोग  मान   लूँगा   यार   मैं

पर मुझे यक़ीं किसी भी ख़ुश-ज़बान पर नहीं


आठ


तमाम रातें, तमाम बातें, तमाम चीज़ें सहेजता हूँ

तू जैसे मुझको सहेजती है मैं वैसे यादें सहेजता हूँ


सहेजने से बुरे दिनों में तुम्हें कमी कुछ नहीं खलेगी

किसी को कहते सुना था ऐसा सो मैं वफ़ाएँ सहेजता हूँ


मैं दुनिया भर की रवायतों से ख़फ़ा हूँ लेकिन ऐ दोस्त सुन ले

मुहब्बतों के लिए अगर हो तो सारी रस्में सहेजता हूँ


क़लम जो सफ़्हे पे रिस भी जाए तो लफ़्ज़ कितने हैं गुम हो जाते

यही सबब है कि बारहा मैं भरी दवातें सहेजता हूँ


मिरा तआरुफ़ तो कुछ नहीं है मगर अदब से ही पेश आओ

नयी ग़ज़ल मैं बना रहा हूँ पुरानी ग़ज़लें सहेजता हूँ


नौ 


नज़्ज़ारा    देखिए    न    शिकारे   पे   बैठकर

सूरज  निकल  रहा   है   सितारे   पे   बैठकर


कैसे  ख़याल   बचपने   के  आ   रहे   हैं  फिर

उड़   जाएँ   जैसे   यार   ग़ुबारे   पे  बैठ  कर


दरियाओं की ख़मोशी में हैं चीख़ें कितनी दफ़्न

इक  दिन  सुना  है  मैंने  किनारे  पे  बैठ  कर


हम  लोग  बदमिज़ाज  हैं  सचमुच  में  ए ख़ुदा

सज्दे   न   हम  करेंगे   इशारे   पे   बैठ   कर


'हमसे'   अना    परस्त   तिरे   दर   न  आएँगे

रोएँ   भले   ही  लाख   ख़सारे    पे    बैठकर


दस


अब  आधी  रात  में  कैसे किसी के पास जाएँ,

मुनासिब है कि हम भी ख़ुदकुशी के पास जाएँ...


कि हम इस शोर-ए-दुनिया से बहुत ऊबे हुए हैं,

हमारे  जी  में  है  अब  ख़ामुशी  के  पास जाएँ...


हमारा  बस  नहीं चलता कि ऐसे वक़्त पर हम,

किसी  से  बात कर लें या किसी के पास जाएँ


अगर  'पटना'  में  होते हम  तो कोई बात होती,

नए  इस  शह्र  में किस अजनबी के पास जाएँ...


हमें  अफ़सोस  है  हम  इस  तरह से मर रहे हैं,

हमारा  ख़्वाब  ये  था  ज़िन्दगी  के  पास जाएँ...


ग्यारह


अगर इजाज़त मिले तुम्हारी तो अपनी ख़्वाहिश बताऊँ तुमको

तुम्हारे माथे को चूम लूँ मैं गले से अपने लगाऊँ तुमको


मैं जब भी तुमको यूँ शब-गज़ीदा या कुछ परेशाँ-सा देखता हूँ

तो मेरे जी में यही है आता थपक-थपक के सुलाऊँ तुमको


मेरे लिए तो ये मसअला ही जहान भर में बड़ा है सबसे

के किस बहाने से कॉल करके मैं गीत ग़ज़लें सुनाऊँ तुमको


फ़रेबी दुनिया से तंग आकर तुम्हारे बारे में सोचता हूँ

कहाँ हिफ़ाज़त तुम्हारी होगी कहाँ पे आख़िर छुपाऊँ तुमको


सुनो ये मिसरे ग़ज़ल वग़ैरा मेरे तो बस में नहीं है कहना

तुम्हारे होने से है ये मुमकिन ज़ियादा क्या मैं बताऊँ तुमको


बारह


ख़ुदकुशी   छोड़िए   जिया  जाए

ये  पहल  कीजिए   जिया  जाए


सोचता हूँ कि छोड़ कर सबकुछ

बस  तुम्हारे  लिए   जिया  जाए


तुम  नहीं  थे  तो  सोचता  था मैं

बे-वजह  किसलिए  जिया जाए


उस  तरफ़  रक़्स  में  उदासी  है

इस   तरफ़  आइए  जिया जाए


ज़ब्त  को  उसकी हद बता दीजे

ज़ोर   से   बोलिए   जिया  जाए


तेरह


बारहा  इस  ज़ब्त  में   मुस्कान  करके

थक  गया हूँ ख़ुद को मैं आसान करके


देखना  है  कौन   पीछे   आ   रहा  है

जा  रहा  हूँ  मौत   का  ऐलान  करके


मुझ से होकर कोई जाता ही नहीं अब

ख़ुद को मैंने रख दिया सुनसान करके


ख़ुदकुशी तक जा के वापस लौटता हूँ

देखता   हूँ   मौत   को   हैरान  करके


मौत  का  रस्ता  लुभाने   लग  गया है

ज़िन्दगी को  अस्ल  में पहचान करके


चौदह


नवादा की सड़क तेरी गली की याद आएगी

न होंगे शह्र में हम तो सभी की याद आएगी


हमारी याद से इस्कूल बचपन का नहीं जाता

हमें कॉलेज जाकर भी छड़ी की याद आएगी


कभी घर याद आएगा हमें ये तो नहीं लगता

मगर दीवार कहती है घड़ी की याद आएगी


हमारे शह्र से होते हुए इक बार तो गुज़रो

तुम्हें हनुमान के दर पर अली की याद आएगी


ग़ज़ल से दूर होते जा रहे हैं इन दिनों लेकिन

हमें मालूम है फिर शाइरी की याद आएगी


पंद्रह


तू  जो  हमारे  साथ  चले   अम्न   के  लिए

बीहड़  में  एक  राह  बने   अम्न   के  लिए


कितने  बसर  हैं बुझ गए रोशन मिज़ाज के

अब  तो  कोई  चराग़  जले  अम्न  के लिए


क़ुरआन  से  मसीह  से औ' राम  नाम   से

मज़हब  निकालना  है  मुझे  अम्न के लिए


ये  फ़र्ज़ आपका  है  कि इनआम  दीजिए

शाइर अगरचे कुछ भी लिखे अम्न के लिए


इकदिन  तो  फ़ारसी  में ये सबसे कहूँगा मैं

सबको 'अलिफ़' का इल्म रहे 'अम्न के लिए'


- सृष्टि अलोक



सृष्टि अलोक

युवा रचनाकार। उम्र: 20 वर्ष। कुशाभाऊ ठाकरे विश्विद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़) में पत्रकारिता के छात्र। कुछ अन्य डिजिटल पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। स्थायी पता: नवादा, बिहार।